Wednesday, December 18, 2019

895


माहिया
ज्योत्स्ना प्रदीप
 1
अब प्रेम बना सौदा
मोहक गमले में
ज्यों ज़हरीला पौधा ।
2
धन की सोपान बड़े 
मीत मिले पल में
मन में ना प्रीत जड़े !
3
हर नाता काला है
मन के कोने में
लोगों के जाला है।
4
पल ऐसा आता है
कल का भोला घन 
रुत को छल जाता हैं।
5
इक फूल मनोहर है
अपने  काँटों से
घायल वो अक्सर है।
6
ये कैसी है माया
पावन गंगा ही
धोती पापी-काया !

Tuesday, December 17, 2019

894


कृष्णा वर्मा
1
स्मरण नहीं
कैसे उलझा मन
तेरी छलनाओं में
भ्रमजाल  था
अनजाने बदली
शंकाएँ विश्वास में।
2
ओस-बूँद- सी
सरल औ निश्छल
तुम्हारी ये मुस्कान
ढही आस को
दे जीने की वजह
फूँके नूतन प्राण।
3
फूल पांखुरी
नाज़ुक लब तेरे
भोर रश्मि मुस्कान
नज़र मेरी
पलकें न झपके
प्रीत तेरे कुर्बान।
4
खनखनाएँ
ज्यों पात हवा-संग
ऐसी  हँसी तुम्हारी
प्रीत न मानी
कि लाख जतन
होने लगी तुम्हारी।
5
तुम क्या मिले
चाहतें हुईं शोख़
होंठ मंद मुस्काए
पग झांझर
बेबात झनकती
साँसें महकी जाएँ
6
बँधने लगे
हम बिन डोरी से
रिश्ता है कोई ख़ास
अक्स तुम्हारे
अक्सर रहते हैं
इन नैनों के द्वार।
7
मन आतुर
तुमसे मिलने को
लगीं फैलने बाहें
तुम्हीं बताओ
प्यासे मन को किस
विधि धीर बँधाएँ
8
चुग्गे को देख
चली मत जाइयो
चुगने को चिड़िया
तरस नहीं
ये छल है उसका
बिछा वहाँ है जाल्।
9
बरस रहा
अंबर से जो प्यार
लिया  पल्लू पसार
धरा का मन
पोर-पोर तन का
हुआ ख़ुशगवार।
10
बड़ा सुहाना
बारिशों का मौसम
भीगे था बचपन
बड़े क्या हुए
आए जब सावन
बस भीगता मन।
11
बदली रुत
सावन डाकिया ले
आया पुराने ख़त
भूली यादों की
भीगी-भीगी चिठ्ठियाँ
सुलगा रहीं मन।
12
बरसे घन
खारे समंदर के
हो गए वारे न्यारे
प्रीत की मारी
नदिया सुकुमारी
ढो रही जल धारे।
13
वृक्षों पे नूर
पुष्पों पर रवानी
ले आई  है बरखा
आए जवानी
धरती का आँचल
रंग डाला है धानी।
14
नदी-नालों में
मचा ऐसा बवाल
मेघ के इरादों ने
किया बेहाल
क़ुदरत के खेल
कौन डाले नकेल।
15
बदल गए
तेवर मौसम के
जुदा-जुदा -सी चाल
हुए उन्मादी
मेघ अचानक क्यूँ
रे रूप कराल।
16
बरसीं बूँदें
तन कुन्दन हुआ
डाल-पात आनंद
श्याम घटाएँ
घिर-घिर करतीं
बरखा का प्रबंध।
-0-


Monday, December 2, 2019

893-धूप का स्पर्श


रश्मि शर्मा
1
तुम हो संग
मानस में हमेशा
अकेली कहाँ।
2
नाप सको तो
अथाह प्रेम मेरा
नाप लो तुम ।
3
सुप्त स्मृतियो !
मत खोलना द्वार
आत्मा बंदी है ।
4
सुख-संदेश
लेकर नहीं आता
कोई डाकिया
5
निकल भागे
आत्मा की सुराख़ से
सारे अपने
6
स्मृति -भूमि को
बहुत कठिन है
मुड़के देखना
7
तुम बदन
परछाईं हूँ तेरी
कैसी जुदाई?
8
वादे नाकाम
दहका आसमान
आज की शाम ।
9
खिल उठे हैं
उजड़े दयार में
फूल फिर से
10
बंद नैनों में
जला लिए हमने
यादों के दीप
11
मैं नहीं अब
किसी के भी दिल में
वो अब भी है
12
उसकी याद
आँसू के साथ-साथ
लाए मुस्कान
13
धूप का स्पर्श
बेचैनियाँ सोखता
मन जोड़ता
14
उसे पता था -
मिलने से टूटेगा
सब्र का बाँध
15
ज़ख़्म ताज़ा हैं
सुनी होगी किसी से
वफ़ा की बातें
16
सब गवाँ के
अब इंतज़ार में
बैठा है कोई
17
प्रेम ने कहा
बने रहो हमेशा
जैसे हो वैसे
18
कपड़े नए
है वही दुःख और
वही उदासी
19
फैल ग हैं
मुट्ठी भर ख़ुशियाँ
कोई आया है
20
खिड़की खुली
झाँका लिया जीवन
पढ़ी किताब
21
चितकबरी
लगती है ज़िंदगी
तुम जो नहीं