Thursday, June 27, 2019

870

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'


1-बिना तुम्हारे

आँधी को रोका
फूत्कार भय त्यागा
नागों को नाथा
यह कैसे हो पाता
बिना तुम्हारे
हम जी पाते कैसे
बिना सहारे !
दंशित नस-नस
चूमके घाव
तुमने मन्त्र पढ़े
विष सदा उतारा
-0-
2-चन्दन-सा जीवन

घृणा थी रौंदी
किसी का दु:ख देखा
तो हिस्सा माँगा,
ज़हर सदा मिला-
खुद पी डाला
चन्दन-सा जीवन
बना कोयला
फिर राख हुआ था
ख़ाक़ हुआ था
सब कुछ देकर
मैंने क्या पाया-
आहें और कराहें
छलनी हुआ सीना।

Sunday, June 16, 2019

869-पितृ-दिवस



सेदोका
अनिता ललित  
1. 
दुर्गम राहें
ये जीवन कठिन
डर नहीं है मुझे!
है साथ सदा -
आपका एहसास
दुआओं -भरा हाथ!
 2. 
जहाँ हों आप
फ़लक के भी पार!
मैं करूँ महसूस
स्नेह अपार
जो था पाया आपसे
रहेगा साथ मेरे!
-0-

Saturday, June 15, 2019

868


1-कृष्णा वर्मा
1
कैसा सितम
किया आज वक़्त ने
फिरें ढूँढते
दिल की खुशियों की
हम सब वजह।
2
रोतीं चाहतें
दिलों के दरम्यान
कौन दे रहा
फासलों का पहरा
तड़पते किनारे।
3
कैसे  बुझाए
खुशियों के जुगनू
उदासियों की
घिर आईं घटाएँ
मरे  बाँसुरी सुर।
4
मन बंजारा
बेचैन भटकता
फिरे आवारा
खोजे तेरी प्रीत को
मिल जाए दोबारा।
5
जेठ की धूप
ठहरी जीवन में
देती आघात
ढूँढ रही ज़िंदगी
बरगद की छाँव।
6
लगी माँगने
मुसकानों का कर्ज़
क्यों ज़िंदगानी
छीन कर वसंत
क्यों दे गई वीरानी।
-0-

2-पिता
सत्या शर्मा ‘कीर्ति’

आशीष भरे
करुणा से निर्मित
हाथ आपके
थाम चलती रही
कभी रुकती
कभी दौड़ती रही
जीवन- पथ
कठिनाइयों भरा
पर! पथ के
सब बिखरे काँटे
आप हमेशा
चुन फेंकते रहे
हम निर्विघ्नं
सदा चलते रहे
वक्त ने दिए
ख़्म कभी गहरे
खुद ही दर्द
सारे झेलते रहे
हमें खुशियाँ
आप बाँटते रहे
हम तो सदा
खिलखिलाते रहे
मेरी आँखों से
लेकर सारे आसूँ
बन के शिव
आप बस पीते रहे
औ हम सभी
गुनगुनाते रहे
सर पे मेरे
न बरगद साया
बचाते रहे
हर धूप व छाया
झेलके गम
मुस्कुराते ही रहे
हमारे पिता
साथ हँसते रहे
साथ ही जीते रहे ।।
-0-

Saturday, June 8, 2019

867-जीवन पथ


डॉoजेन्नी शबनम

जीवन- पथ 
उबड़-खाबड़-से 
टेढ़े-मेढ़े-से 
गिरते-पड़ते भी 
होता चलना,
पथ टीले सही 
पथरीले भी 
पाँव ज़ख़्मी हो जाएँ   
लाखों बाधाएँ
अकेले हों मगर 
होता चलना,
नहीं कोई अपना 
न कोई साथी 
फैला घना अँधेरा
डर-डर के 
कदम हैं बढ़ते 
गिर जो पड़े 
खुद ही उठकर   
होता चलना,
खुद पोंछना आँसू
जग की रीत 
समझ में तो आती
पर रुलाती 
दर्द होता सहना   
चलना ही पड़ता !  
-0-


Wednesday, June 5, 2019

866


 सुदर्शन रत्नाकर
गौरैया
वसंत का आगमन हो रहा है।नई नई कोंपलों से पेड़-पौधों का शृंगार हो रहा है अर्थात प्रकृति नए परिधान पहन कर नई दुल्हन की तरह सजने लगी है। हमारे घर के आँगन में सफ़ेद ,नारंगी, लाल, पीले फूलों  से बोगनबेलिया लदा है तो केसर -दूध धुली सी मधुमालती इठला रही है।गुड़हल  के गहरे लाल रंग के फूल सिर उठाये वसंत का स्वागत करने को तैयार हैं। वहीं पहली बार  खिले लाल-नारंगी मिश्रित रंग के बॉटलग्रीन के फूल वंदनवार की तरह लटक कर पेड़ों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

              कभी समय था ,यह मौसम आते ही चिड़ियों की चहचहाट के मधुर संगीत से पूरा घर-आँगन गूँज उठता था और फिर इन्हीं दिनों घर के रोशनदान, खिड़कियों के ऊपर, तस्वीरों के पीछे  एरोकेरिया, पाम के पौधों टहनियों पर तिनका तिनका लाकर घोंसला बनाना शुरू हो जाता था और साथ ही गंदगी को लेकर माँ की शिकायतें शुरू हो जातीं।बिखरे तिनके रूई ,कपड़ों के टुकड़े फैले रहते और माँ सफ़ाई करती रहतीं।चिडिया के अंडे फूटकर जिस दिन गौरैया- शिशु बाहर आते, तो वह दिन  बच्चों के लिए उत्सव का दिन बन जाता जो कई दिन तक चलता रहता। घोंसलों में शिशुओं को देखने की जिज्ञासा तब तक बनी रहती जब तक वे थोड़ा उड़ना नहीं सीख जाते थे और फिर कई दिन की प्रक्रिया के बाद चिड़िया अपने बच्चों को साथ ले जाकर वहाँ से उड़ कर गुलमोहर और अमलतास के पेडों पर जा बैठती। इतने दिन तक गौरैया और पेड पौधों के साथ हमारा सानिध्य बना रहता।

            घर में पेड पौधे तो बने रहे पर गौरैया हमारे आँगन से विलुप्त हो गई। वह चहचहाना, मुँह में तिनके लेकर आना और फिर फुर्र से उड़ जाना कहीं पीछे छूट गया। पर आज बोगनबेलिया,मधुमालती, गुड़हल के खिले फूलों के साथ जब बॉटलग्रीन के झूमर लटक आए, तो उन फूलों के सौन्दर्य में भी चार चाँद लग गए।आज प्रात:काल प्रकृति की इस छटा को निहार कर आनन्द ले रही थी तो एक जानी- पहचानी पक्षी की मधुर क्षीण सी आवाज़ ने मेरा ध्यान आकर्षित किया । नजर उठाकर देखा तो गौरैया के एक जोड़े को  बॉटलग्रीन पेड के फूलों पर बैठ झूलते हुए देखा ,जो अपनी नन्ही सी चोंच से फूलों को तोड़कर खा रहे थे। एक अंतराल के बाद घर के आँगन में चहचहाती गौरैया को देख मेरा मन भी फूलों की तरह खिल गया। उनका स्वागत करने की इच्छा हुई। मैंने उन्हें अपने कैमरे में बंद करना चाहा।  मैं जैसे ही उठी वे फुर्र से उड़ गईं। पर मैंने भी अपनी कोशिश नहीं छोड़ी। उनके दुबारा आने की प्रतीक्षा में ओट में चुपके से खड़ी रही और अंत में एक गौरैया का चित्र ले ही लिया।
     मन में एक आशा बँध रही है, शायद वे यहीं रहेंगी, कहीं नहीं जाएँगी।
नन्ही गौरैया
लौट आई अँगना
प्रफुल्ल मन।                                           
-0-सुदर्शन रत्नाकर,ई-29, नेहरू ग्राँऊड ,फ़रीदाबाद 121001
मो. न. 9811251135

Saturday, June 1, 2019

865


1-ताँका-सुदर्शन रत्नाकर
1
एक चिड़िया
उड़ती आकाश में
गीत सुनाती
ऊँचाइयाँ है छूती
इधर से उधर।
2
सुबह होती
 चिड़िया चहकती
मन मोहती
वातावरण देखो
प्रकृति सँवारती ।
3
लगा है मेला
तारों संग निकला
चाँद सलोना
रात भर चमके
भोर ओझल हुए।
4
लो आ गई है
चूनर ओढ़े रात
सितारों वाली
चंदा रहेगा साथ
होने तक प्रभात।
5
चाँद आते हो
गोधूलि ख़त्म होते
तारों के संग
यामिनी को मनाने
गगन को सजाने।
6
चाँद आया था
उजियारा लेकर
मेरे आँगन
पर मैं सोती रही
बंद किए खिड़की।
7
बाल रश्मियाँ
फैलीं जो धरा पर
बजी घंटियाँ
थिरका झील-नीर
स्वागत विहान का।
8
सोया था कल
नभ के आग़ोश में
सिमटकर
सूर्य जगा है आज
धरा जो मुस्काई है।
9
विभिन्न रूप
विभिन्न आकृतियाँ
कैसे लाते हो
सावन में बादल
रंग अनेक तुम।
10
उड़ी आ रही
बादलों की पालकी
बैठी दुल्हन
वर्षा-शृंगार किए
धरती से मिलने।
11
कोसी धूप में
अलसाई दूब पे
चार क़दम
चलें हम साथ में
रास्ता कट जाएगा।
12
सोने -सा रूप
आँगन की धूप का
छुईमुई -सी
शर्माती उतरी है
सिमटी है बाहों में।
13
हो गया शुरू
धरती का उत्सव
हुई जो वर्षा
नहाई है प्रकृति
चहक उठे पक्षी।
14
सोई है धरा
ओढ़ चूनर नीली
आसमान की
चाँद -सितारों वाली
सूरज जगाएगा ।
15
नेह की बूँदे
बरसती आँगन
आता सावन
बजती सरगम
गाते पिक भ्रमर।
-0-
( नई लेखनी)
2-सेदोका -2-नीरू देवी

 जब कभी मैं
 पुकारता हूँ तुम्हें
 चले आते हो तुम
 मन - मंदिर
 जहाँ भी देखूँ उसे
 र आता साथ।
   -0-