Saturday, October 26, 2019

811-दिवाली


डॉoजेन्नी शबनम
1.
सुख समृद्धि
हर घर पहुँचे
दीये कहते।
2.
मन से देता
सकारात्मक ऊर्जा
माटी का दीया।
3.
दीयों की जोत
दसों दिशा उर्जित
मन हर्षित।
4.
अमा की रात
जगमगाते दीप
ज्यों हो पूर्णिमा !
5.
धरा ने ओढ़ा
रोशनी का लिहाफ
जलते दीये।
6.
दिवाली दिन
सजावट घर-घर
फैला उजास।
7.
बंदनवार
स्वागत व सत्कार
लक्ष्मी प्रसन्न।

-0-
2-मंजूषा मन
1
उजियारे बोए हैं,
हमने दीपक बन
अँधियारे धोए हैं।
2
हर तरफ उजाला है,
बाती दीपक का
यह काम निराला है।
3
हम दीप जलाएँगे,
गहन अँधेरे का
साम्राज्य मिटाएँगे।
4
ये जीत न पाएगा,
छाया अँधियारा
पल में मिट जाएगा।
5
इक दीप जलाएँगे,
मन में पसरा जो
अँधियार मिटाएँगे।



-0-


Friday, October 25, 2019

810


1-मंजूषा मन
1
लिख दे प्रेम
अंतिम निर्णय-सा
तोड़ कलम।
2
प्रेम पुस्तक
कर दे हस्ताक्षर
अंतिम पृष्ठ।
3
ऋतु ने ओढ़ी
कोहरे की चादर
नर्म धवल।
4
बाहें समेटे
उकड़ू बैठे पेड़
सर्दी से डरें।
5
ओस के मोती
पत्तों पर ठहरे
चमकें हीरे।
6
किरचें बनीं
यादें बनके चुभीं
ओस की कनी।
-0-
2-आशा बर्मन
1.
फूल चन्दन
प्रार्थना व पूजन
हो शुद्ध मन
2
झर निर्झर,
संगीतमय स्वर
आनंद भर
3
हरित पात
रिमझिम बरखा
सद्यस्नात सा
4
फैला आकाश,
मुक्ति का एहसास
उड़ता पाखी
5
उदास मन
वेदनामय क्षण
अकेलापन
6
चल निकला
तर्कों का सिलसिला
कुछ न मिला
-0-

Monday, October 14, 2019

809 - कमला घटाऔरा (हाइबन)

अधूरी प्यास

कमला घटाऔरा



मन उदासी के पलों में जाने कहाँ -कहाँ भटकता रहता है ,न जाने किस अपने को ढूँढने मिलने जा पहुँचता है उस के पास । दूरियों की परवाह किये बिना ।तुरन्त मिलने का तो बस एक ही जरिया है सपने में उसे बुला लेना ,या आप उसके पास चले जाना ।मेरे मन ने या  उसके मन ने स्मृतियों के द्वार खड़काये और मैं वहाँ पहुँच गई उसके पास ।उस के जाने बिना अपना मन परचा कर ,उसे देख कर अधूरी प्यास लिये लौट भी आई अपनी दुनिया में ।ऐसा अक्सर हो जाता है जब उसे दिल से याद करूँ वह मिल ही जाती है । भले सपने में ही मिले ।सपना तो रात में आता है ।जिस से मिलने का मन किया वह भी तो सो रहा होगा ऐसे में तो मिलन नहीं हो सकता। मन सब जानता था मेरे यहाँ रात तो वहाँ सबेरा होता है ।अलग देशों का टाइम अलग होता है।सारी प्लानिंग मन ने सोच समझ कर की थी । भला  रूह के निमन्त्रण को वह कैसे नकार सकता था ।उसी ने याद किया होगा । मैं पहुँच गई वहाँ बिना किसी विघ्न - बाधा के। मैंने देखा वह कोई स्कूल स्थल था । एक मैडम ने अपना फोन देकर मुझे कहा ,उसे फोन करो वह आ रही है ,या कुछ और पूछने को कहा पर उस का संकेत यही था अपनी सहयोगी टीचर के बारे में पता करना । फोन पर बड़े बड़े अंक तो थे मैं पूछने ही वाली थी कि अनलॉक कैसे करूँ ? तभी उस का उधर से फोन आ जाता है ।देर से आने का कारण बताने के लिए ।मैं शायद उसी मैडम को मिलने गई थी वहाँ ।वह नहीं आई थी ।यह जानकर मैं उस के पास ही पहुँच गई उसके घर । बिना किसी सवारी के , बिना किसी से रास्ता पूछे । मन के रथ पर सवार को राह तलाशने की कहाँ जरूरत पड़ती है । बस एक इशारा ही काफी है । है न अजीब बात ! मन का रथ जहाँ चाहो ले चलो ।तुरन्त चल पड़ता है ।पर उसे काबू में करना आना चाहिये ताकि अपनी मर्जी न कर बैठे ।
 वह अपनी रसोई में नीचे पटरे पर बैठी नाश्ता कर रही थी। जैसे अक्सर गाँव में सर्दी के दिनों में रसोई में ही बैठकर खाना खाते थे लोग ।वह दृश्य मुझे मेरे बचपन में ले गया ,जब मैं ऐसे ही रसोई में बैठकर माँ के हाथ का ,कभी नानी या दादी के  हाथ का बना गर्म गर्म खाना खाया करती थी चूल्हे की आग के सामने ।मैं काफी देर उसे निहारती रही । वह अब देखती है , तब देखती है लेकिन नहीं , वह तो अपने ध्यान में धीरे धीरे खाना खाती रही । किसी मौन चिंतन में डूबी हुई जैसे मुद्दतों  बाद उसे फ़ुर्सत मिली हो अपने आपे से मिलने की ।मैंने पुकार कर उसका ध्यान भंग करना नहीं  चाहा । और मैं लौट आई मन में विषाद भर कर खिन्न मन से ।
भला ऐसा भी क्या ध्यान मगन होना किसी के आने की आहट तक न सुनाई दे। कोई बात नहीं , मिलने पर खबर लेती हूँ , अरे  नाश्ते को ना  पूछती सिर उठा कर देख तो लेती ।बड़ी निर्मोही हो गई हो तुम । यही है तेरा प्यार ! दिखाई न दो बोला तो करो ।दु:ख सुख खोला तो करो ।मन की तिजोरी को कभी कभी हवा भी लगा लिया करो ।मुद्दत हुई ,उससे बात किये ,कान तरसते रहें उसे सुनने को और उसके कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी ।जाने वह किस गूढ़ रहस्य को सुलझाने में लीन थी ।उसके लिए वह क्षण कितने अनमोल होंगे ।मैं जानती थी ,इसलिए उसे आवाज नहीं दी ।लौट आई मन की मन में ले , प्यासी की प्यासी ।


मौन समाधि

कैसे तोड़ती भला

जुड़ी आपे से ।


कमला घटाऔरा

Tuesday, October 1, 2019

808


नवरात्र की तृतीया तिथि माँ के चन्द्रघण्टा रूप के अर्चना-साधना की तिथि है। भगवान शिव के साथ विवाह के बाद देवी महागौरी ने मस्तक पर अर्धचंद्र धारण किया इसलिए उनका नाम चंद्रघंटा पड़ा। देवी के इस रूप की आराधना करने से  जीवन में उन्नति, धन, स्वर्ण, ज्ञान व शिक्षा की प्राप्ति होती है। माँ चंद्रघंटा  को कनेर का फूल अत्यंत प्रिय हैमाँ चंद्रघंटा  की पूजा करने से साहस बढ़ता है और भय से मुक्ति मिलती है। माँ चन्द्रघण्टा को नमन एक सेदोका के माध्यम से।
डॉo शिवजी श्रीवास्त्व
1
चन्द्रघण्टा माँ
शिव अनुरंजिनी
धारे हैं अर्द्ध चन्द्र,
हरें बाधाएँ
ज्ञान दें समृद्धि दें
भक्तों के क्लेश हरें!
-0-

Saturday, September 28, 2019

807


डॉ0 सुरंगमा यादव
1
विकल पल
आतुर आलिंगन
ढूँढते हर पल
प्रिय सान्निध्य
ओह!जग बंधन
अधरों पे क्रन्दन!
2
गहरी रात
मन में खिल रहा
नित नव प्रभात
प्रिय का साथ
सब ओर उजास
नैनों में मृदु हास
3
तुम्हारा साथ
पंख लगे हजारों
मन के एक साथ
दूर गगन
आया कितना पास
हो गयी पूरी आस
4
कोई हो ऐसा
हर ले जो मन के
सारे दुःख- संताप
अश्रुजल में
खिला दे जो पल में
शत प्रेम कमल
5
घटाओ सुनो !
अभी न बरसना
राह में है कहीं वो
व्यग्र होके मैं
द्वार पर हूँ खड़ी
लगाना मत झड़ी
-0-

Sunday, September 22, 2019

806


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1
मन उन्मन
तरसे आलिंगन
कहाँ खो गए
अब चले भी आओ
परदेसी हो गए !!
2
आकर लौटे
बन्द द्वार था मिला
भाग्य की बात,
दर्द मिले मुफ़्त में
प्यार माँगे न मिले।
3
टूटते कहाँ
लौहपाश जकड़े
मन व प्राण
मिलता कहाँ मन
जग निर्जन वन।
-0-

Tuesday, September 17, 2019

805-अधर-हस्ताक्षर


डॉ.पूर्वा शर्मा
 1.     
रिश्ता निराला
शरारतों में डूबा
बचपन हमारा,
कुछ टॉफियाँ
राखी के बदले में
अब नहीं मिलतीं
2.     
ज़िंदगी चखे
चाशनी से टुकड़े
प्रत्येक मोड़ पर,
मन ना भरे
मनभावन यादें
करती रही बातें
3.     
खाली है झोली
देखे खड़ा बेबस 
फ़कीर-सा शिशिर,
पिटारा भर
पुष्प-पल्लव लाया
ये वसंत खजांची।
4.     
अडिग रही
हरेक मौसम में
साहिल-सी ज़िन्दगी,
हिलोरे खाती
ऊँची, तो कभी नीची
लहरें सुख-दुःख।
5.     
वर्षों पहले
भाल पर थे सजे
अधर हस्ताक्षर,
भीनी ताज़गी
अब तक अंकित
मन भी पुलकित।
-0-

Friday, September 6, 2019

884


दैवीय बाँध  
               अनिता ललित  
जब से बातें समझ में आनी शुरू हुईं थीं, मम्मी-पापा से यही सुनते आए थे - “तुम्हारे जन्म के समय घर में शहनाई बज रही थी! तुम हमारे लिए लक्ष्मी हो, तुम्हारे जन्म के बाद ही
पापा के काम की तरक्क़ी भी हुई और घर में ख़ुशहाली आई!” सुनकर बड़ा अच्छा लगता था हमें, इतराते फिरते थे पूरे घर में! यही नहीं! अपने हर जन्मदिन पर मम्मी-पापा से यही सुनते आते रहे! ढेर सारे आशीर्वाद और प्यार-भरी बातों के साथ, यह बात कहना वे दोनों कभी नहीं भूलते थे! हमारी सदैव पूरी कोशिश रहती थी कि कोई भी ख़ुशी का दिन हो, चाहे कोई  त्योहार हो, हमारा या पापा-मम्मी का जन्मदिन हो, हममें से किसी के विवाह की वर्षगाँठ हो, मातृ-दिवस हो, पितृ-दिवस हो, शिक्षक-दिवस हो, गुरु पूर्णिमा हो...सबसे पहले हम उनको फ़ोन करके शुभकामनाएँ देते थे, उनका आशीर्वाद लेते थे!
      जीवन में सुख-दुःख तो लगे ही रहते हैं! इस दुनिया में आपके दुख पर ख़ुश होने वाले तथा सुख पर जलने व दुखी होने वाले तो बहुत मिल जाएँगे, परन्तु आपके सुख से, आपकी प्रसन्नता से यदि किसी को सचमुच आपसे अधिक ख़ुशी मिलती है, तो वे होते हैं आपके माता-पिता! हमारे हर सुख, हर ख़ुशी पर, पहला अधिकार पापा-मम्मी का है, हमेशा से हमारा यही मानना रहा है! उनके आशीर्वचनों से हमारी ख़ुशी कई-कई गुना बढ़कर हम तक वापस पहुँचती थी!
     इस बार हमारा पहला जन्मदिन है, जिसमें न पापा साथ हैं, न ही मम्मी! याद तो बहुत आती है उनकी, दुःख भी होता है, मगर मन को यही समझाते हैं, कि सारे कष्टों से, इस दुनिया के मायाजाल से, छल-प्रपंचों से रिहा होकर, वे दोनों परमात्मा की गोद में सुक़ून से बैठे होंगे और वहीं से अपना स्नेह और आशीर्वाद हमें दे रहे होंगे!
1
जीवन मेरा
हर सुख ही मेरा
आपकी देन!
2
दैवीय बाँध
मेरी आत्मा में बसा
आपका प्यार!
-अनिता ललित
-0-

Thursday, September 5, 2019

693--अमूल्य भेंट


[बहन कमला निखुर्पा द्वारा भेजी अतुल्य एवं अमूल्य भेंट सबको समर्पित। इन उद्गारों के लिए मैं चिर ॠणी रहूँगा। -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’]

(शिक्षक दिवस पर मेरे सृजन गुरु मेरे हिमांशु भैया को समर्पित ये चोका )
कमला निखुर्पा ( प्राचार्या केन्द्रीय विद्यालय , पिथौरागढ़-उत्तराखण्ड)


हाथों में थमा
सृजन की लेखनी
नेह सियाही 
भर यूँ छिटकाई
उठी लहर 
भीगा-भीगा अंतर
तिरते शब्द
उड़े क्षितिज तक 
मिलन हुआ
धरा से गगन का
रच ली मैंने
फिर नई कविता
निकल पड़ी
अनजानी राह पे
मिलते रहे
पथ में  साथी -संगी
कोई हठीली
अलबेली सहेली
हवा वासंती 
बदरी सावन की
प्प से गिरे
सिहरा के डराए
भिगो के माने
रिमझिम की झड़ी 
राह में मिली 
नटकेली कोयल 
छिप के छेड़े
कूक हूक जगाए
बागों में मिली
तितली महारानी
फूलों का हार
पाकर इतराई 
गुंजार करे 
भाट भँवर -टोली
सृजन राह
अनुपम पहेली
 नई -सी भोर
 निशा नई नवेली 
नवल रवि
चंद्रिका-सी सहेली।
मुड़के देखूँ
चित्र;प्रीति अग्रवाल
दूर क्षितिज पार 
तुम्हें ही पाऊँ
गहन गुरु -वाणी
थामे कलम
नेह भर सियाही
बूँदे छिटकी
सुधियों की सरिता 
उमगी बह आई।
-0-

Monday, September 2, 2019

882


डॉ0 सुरंगमा यादव
1
चहुँओर है
कोलाहल कलह
तू मलय वात-सा,
ताप हर ले
आषाढ़ घन बन
सींच दे क्लांत मन
2
छाया; रामेश्वर काम्बोज ;हिमांशु'
सावन-भादो
झूम-झूम बरसें
प्रेमी मन तरसे,
कोई न जाने
बादल संग नैना
बरसें दिन-रैना
3
तुम्हारे लिए
खुला मन का द्वार
जन्म-जन्मान्तर से,
संचित प्रेम
वार दूँ तुम पर
आओ तो प्रियवर!
4
सावनी-तीज
नेह पी का बरसा
मन आँचल भीगा,
प्यार का रंग
ऐसा करे कमाल
मेंहदी दूनी लाल
5
हवा का दर्द
दूर तलक कोई
चले जो हमदर्द,
ढूँढते बीते
कितने युग-कल्प
ले जो प्रेम संकल्प ।
6
छाया; रामेश्वर काम्बोज ;हिमांशु'
शाम उदास !
कहने को कितना है,
सुनने वाला  कौन?
दूर पास
जीवन- पथ पर
खोया हास-विलास
7
गोधूलि बेला
शिथिल हुआ सूर्य
बढ़ रही थकान,
तम के पग
कर रहे प्रशस्त
निशा सखी का पथ!