Thursday, July 18, 2019

874


शशि पाधा
1
चुप थी मैं भी
और मौन तुम भी
तुम्हारा स्पर्श
कुछ पिघला गया
मौन मुखर हुआ।
2
मेघा गरजे
गाने लगी बदली
राग  मल्हार
शाख- शाख पी रही
रिमझिम  फुहार।
3
आज भोर ने
घबराते-लजाते
ओढ़ ली धूप
मौसम गुनगुनाया
स्वर्ण सौगात लाया ।
4
शांत झील में
तैरना चाँदनी का
या कोई गीत
पहाड़ में गूँजना
सौन्दर्य-इन्द्रजाल।
 5
रहूँ ,न रहूँ
फर्क नहीं पड़ता
क्या किया मैंने
वही है मेरा नाम
वही पहचान भी।
-0-

Tuesday, July 9, 2019

873-रे निर्मोही बादल !


सुदर्शन रत्नाकर

बिन बरसे
कहाँ जाते हो तुम
बरस भी लो
आए हो तो बादल,
राह निहारे
तपस्वी पपीहरा
प्यास बुझे
व्याकुल पेड़ खड़े
जल -विहीन
सूख रहे हैं सब
ताल- तलैया
आसमान देखता
कृषकाय वो
बिलखती संतान
नहीं अनाज
मिलने को आतुर
तेरी बूँदों से
समन्दर का पानी,
तरस रहे
उपवन -बगिया
बरसो अब
रे निर्मोही बादल !
बिन नीर के
प्यासी -प्यासी है धरा
प्यासा जनमानस।

-0- 

Saturday, July 6, 2019

872


1-वर्षा
डॉ जेन्नी शबनम
1
तपती धरा
तन भी तप उठा
बदरा छाए
घूम -घूम गरजे
मन का भौंरा नाचे।
2.
कूकी कोयल
नाचे है पपीहरा
देख बदरा
चहके है बगिया
नाचे घर अँगना।
3.
ओ रे बदरा
कितना तड़पाया
अब तू माना
तेरे बिना अटकी
संसार की मटकी।
4.
गाए मल्हार
घनघोर घटाएँ
नभ मुस्काए
बूँदें खूब झरती
रिमझिम फुहार।
5.
बरसा पानी
याद आई है नानी
है अस्त व्यस्त
जीवन की रफ्तार
जलमग्न सड़कें।
6.
पौधे खिलते
किसान हैं हँसते
वर्षा के संग
मन मयूरा नाचे
बूँदों के संग-संग।
7.
झूमती धरा
झूमता है गगन
आई है वर्षा
लेकर ठंडी हवा
खिल उठा चमन।
8.
घनी प्रतीक्षा
अब जाकर आया
मेघ पाहुन
चाय संग पकौड़ी
पहुना संग खाए।
9.
पानी बरसा
झर-झर झरता
जैसे झरना,
सुन मेरे बदरा
मन हुआ बावरा।
10.
हे वर्षा रानी
यूँ रूठा मत करो
आ जाया करो
रवि से लड़कर
बरसो जमकर।
-0-
2-हमस
आनन्द रोहिला
1
हमने बोए
बीज मधु-प्रेम के
पर ना उगे,
तू रहा बेखबर
मेरे हमसफर ।
2
ढूँढती फिरूँ
दिनभर बाट में
फर्क न पड़ा ,
रही दरबदर
मेरे हमसफर ।
3
रोए कलियाँ
भँवरे चले गए
तेरी तरह,
धुँधला डगर
मेरे हमसर ।
4
भरी गलियाँ
है सुनसान रास्ते
तू दिखा नहीं ,
ये हर्षाए नगर
मेरे हमसफ़र ।
5
माघ किरण
बहे ठंडी पवन
न शांत करे,
ये देख मेरा हश्र
मेरे हमसर ।
-0- आनन्द रोहिला,गाँव व डाकघरअमीन,जिला -कुरुक्षेत्र ,तहसील - थानेसर चलभाष 9050630925


Friday, July 5, 2019

871


कमला निखुर्पा

1

कहीं भोर है
कहीं साँझ की बेला
खुशियाँ कहीं 
कहीं दु:खों का मेला 
ये जग अलबेला   
-0-

Thursday, June 27, 2019

870

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'


1-बिना तुम्हारे

आँधी को रोका
फूत्कार भय त्यागा
नागों को नाथा
यह कैसे हो पाता
बिना तुम्हारे
हम जी पाते कैसे
बिना सहारे !
दंशित नस-नस
चूमके घाव
तुमने मन्त्र पढ़े
विष सदा उतारा
-0-
2-चन्दन-सा जीवन

घृणा थी रौंदी
किसी का दु:ख देखा
तो हिस्सा माँगा,
ज़हर सदा मिला-
खुद पी डाला
चन्दन-सा जीवन
बना कोयला
फिर राख हुआ था
ख़ाक़ हुआ था
सब कुछ देकर
मैंने क्या पाया-
आहें और कराहें
छलनी हुआ सीना।

Sunday, June 16, 2019

869-पितृ-दिवस



सेदोका
अनिता ललित  
1. 
दुर्गम राहें
ये जीवन कठिन
डर नहीं है मुझे!
है साथ सदा -
आपका एहसास
दुआओं -भरा हाथ!
 2. 
जहाँ हों आप
फ़लक के भी पार!
मैं करूँ महसूस
स्नेह अपार
जो था पाया आपसे
रहेगा साथ मेरे!
-0-