Monday, January 28, 2019

853-वक़्त


डॉ जेन्नी शबनम

वक्त की गति 
करती निर्धारित  
मन की दशा 
हो मन प्रफुल्लित 
वक़्त भागता
सूर्य की किरणों-सा
मनमौजी-सा
पकड़ में न आता
मन में पीर
अगर बस जाए
बीतता नहीं
वक़्त थम-सा जाता
जैसे जमा हो
हिमालय पे हिम
कठोरता से
पिघलना न चाहे,
वक़्त सजाता
तोहफ़ों से ज़िन्दगी
निर्ममता से
कभी देता है सज़ा
बिना कुसूर
वक़्त है बलवान
उसकी मर्ज़ी
जिधर ले के चले
जाना ही होता
बिना किए सवाल
बिना दिए जवाब!
-0-

Friday, January 25, 2019

852


सुदर्शन रत्नाकर
1
बाँचते रहे
रात भर चिट्ठियाँ
चाँद -सितारे
धरा ने भेजी थीं जो
आसमान के लिए।
2
दुबक कर
बैठी धूप अँगना
चली जाएगी
सहमी - सहमी -सी
साँझ के आग़ोश में।
3
हवा के झोंके
लहरों का नर्तन
खिलते फूल
व्याकुल हों भागती
मिलने को आतुर।
4
बीमार रिश्ते
कब तक सहेजूँ
छूटते नहीं
शरीर से लिपटीं
चूसतीं जोंकों जैसे।
5
सिर पे बोझ
कठिन है जीवन
गाँव बालाएँ
रॉकेट के युग में
पनघट पे जाएँ।
6
तुम्हीं बताओ
कब तक सहूँ मैं
पीडा मन की
कोई तो राह होगी
काँटे बीनने होंगे।
-0-
 उमस भरी
1    
उमस भरी
बीती है दोपहरी
साँझ सुहानी
लौट रहे हैं पक्षी
आसमान से
पूरी हुई दिन की
लम्बी उड़ान
पर नहीं थकान
अपना नीड़
सिमटा कर पंख
बच्चों के संग
कल की प्रतीक्षा में
चिंता- रहित
सोते हैं रात भर।
भोर होते ही
फिर जग जाएँगे
चहचहाते
नहीं है तेरा-मेरा
नभ की ओर
उड़ेंगे एक साथ
बंधनमुक्त
न कोई कशमकश
पूर्णरूपेण
जीवन से संतुष्ट
वे परिन्दें हैं
प्यार से रहते हैं
प्यार समझते हैं।
-0-
सुदर्शन रत्नाकर,-29,नेहरू  ग्राउण्ड ,फ़रीदाबाद 121001
मो.9811251135
-0-

Saturday, January 19, 2019

851-जाड़े की धूप



1-डॉ.सुधा गुप्ता
1
पौष की हवा
कहे मार टहोका-
बता तो ज़रा
अब क्यों दुत्कारती
जेठ में दुलारती ।
2
सुबह  बस
ज़रा-सा झाँक जाती
दोपहर आ
छत के पीढ़े बैठ,
गायब होती धूप ।
3
जाड़े की धूप
पुरानी सहेली-सी
गले मिलती
नेह-भरी ऊष्मा  दे
अँकवार भरती ।
4
झलक दिखा
रूपजाल में फँसा
नेह बो गई
मायाविनी थी धूप
छूमन्तर हो गई ।
5
भागती आई
तीखी ठण्डी हवाएँ
सूचना लाईं
शीत-सेना लेकर
पौष ने की चढ़ाई ।
6
मेरे घर में
मनमौजी सूरज
देर से आता
झाँक, नमस्ते कर
तुरत भाग जाता ।
7
भोर होते ही
मचा है हड़कम्प
चुरा सूरज-
चोर हुआ फ़रार
छोड़ा नहीं सुराग।
8
सूरज-कृपा
कुँए- से आँगन में
धूप का धब्बा
बला की शोखी लिये
उतरा, उड़ गया।
9
शीत –ॠतु का
पहला कोहरा लो
आ ही धमका
अन्धी हुई धरती
राह बाट है खोई ।
10
बर्फ़ ढो लाई
दाँत किटकिटाती
पौष की हवा
सब द्वार थे बन्द
दस्तक दी ,न खुला ।
11
झोंक के मिर्च
शहर की आँखों में
लुटेरा शीत
सब कुछ उठाके
सरेशाम गायब ।
12
तीर -सी चुभी
खिड़की की सन्धि से
शातिर हवा
कमरे का सुकून
चुराकर ले गई ।

Thursday, January 3, 2019

850- पुल




डॉ .कविता भट्ट
1
पास में खड़ा
मोटर पुल नया,   
पैदल पुल-
अब चुप-उदास 
था लाया हमें पास

2
बचपन था-
जहाँ झूलता मेरा,
टँगा है मन
ननिहाल के उसी
आम के पेड़ पर
3
जब से बना 
पुल मोटर वाला,
बह रही है
अलकनंदा नदी
अब रुकी-की -सी 
4
वाहन तुम
पुल पर दौड़ते
नदी-सी हूँ मैं
शान्ति से बहती
सब कुछ सहती  
5
मानव नंगा
कैसे पाप धोएगी
काँवर गंगा !
उदारमना शिव
भावे आत्माभिषेक
-0-