Monday, July 30, 2018

821-1



1-जानते तो हो
कृष्णा वर्मा

जानते तो हो
नहीं पसंद मुझे
सवार होना
पाल लगी नाव में,
गवारा नहीं
मुझे हवा की मर्ज़ी
मान  चलना
झेलूँ आवारगियाँ
मैं क्यों उसकी
भरोसेमंद हुईं
कब हवाएँ
बदलकर रुख़
गिरा दें पाल
छोड़ दे कहीं कश्ती
वो मझधार
जानती हूँ-तुम ना
थामोगे पतवार।
-0-
2-कृष्णा वर्मा
1
ग़म ख़ौफ न
बोझ होती ज़िंदगी
रहती खिली-खिली
होता सुर्ख़ुरू
जीना, समझते जो
मन इक-दूजे का।
2
तुम क्या जानो
जीवन रंगमंच
मैं ऊँचा कलाकार
छिपा लेता हूँ
कैसे अपनी पीड़ा
हँसी की लकीरों में।
3
जलाए मन
पल-पल यह क्यों
तेरी सोच की आग
कैसे बताऊँ
है पाक मन मेरा
तेरा ही मन मैला ।
4
घुलता रहूँ
कैसे दिखलाऊँ मैं
अंतर्मन अपना
शंका मिटाता
सीना चीर दिखाता
होता राम भक्त सा।
-0-

Saturday, July 28, 2018

821-जो स्पर्श तेरा मिला


रामेश्वर  काम्बोज हिमांशु
1
प्रिय की याद
रह -रहके आई
फूटी रुलाई
हिचकी नहीं थमी
छाई आँखों में नमी।
2
सोचना पड़ा-
तुम मिले न होते
तो क्या- क्या होता?
प्यासे ही मर जाते
हम नदी किनारे।
3
कभी पिला दो
अधर -सोमरस
मुझे जिलादो,
आलिंगन कसके
सूने उर बसना।
4
घना अँधेरा
घिरा है चारों ओर
तेरी मुस्कान
मेरा नूतन भोर
तुम्हीं हो ओर-छोर।
5
कर दूँ तुम्हें
मैं सुख समर्पित
अपने दुःख
मुझे सब दे देना
वही आनन्द मेरा।
6
यह जीवन
यों स्वर्णिम हो गया
दर्द खो गया
नील नभ में कहीं
जो स्पर्श तेरा मिला।
7
प्यासा गगन
था मेरा यह मन
भटका सदा
सरस धरा तुम
सींचे  सूखे अधर।
8
पलकें खुलीं
झरा प्यार -निर्झर
पिया जीभर
ओक बने अधर
सरस मन हुआ।
9
थाती तुम्हारी
प्राण मेरे विकल
अर्पित करूँ
भर -भर अँजुरी
मेरे प्रेम देवता।
10
सृष्टि प्रेम की
सींचती प्रतिपल
आए प्रलय
बूँद थी मैं तुम्हारी
तुम्हीं में हूँ विलय।

Tuesday, July 24, 2018

820-खोले द्वार यूँ



डॉ.कविता भट्ट
1
बाँचो तो मन
नैनों की खिड़की से
पूर्ण प्रेम के
हस्ताक्षर कर दो
प्रथम पृष्ठ पर ।
2
रजनीगंधा
हो सुवासित तुम
अँधेरे में भी,
तुम्हारे अस्तित्व से
जीवन संचार है ।
3
रजत -कण
बिखेरे मेरा मन
मुस्कानों के
प्रिय तेरे आँगन
यों बरसा जीवन ।
4
तुम विवश
हो मेरी मुस्कान- सी
पुण्यसलिला
नहीं छोड़ती धर्म
उदास हो बहती।
5
लौटाने आया
जिसने ली उधार
धूप जाड़े में
कर रहा प्रचार
गर्मी की भरमार ।
6
खोले  द्वार यूँ
बोझिल पलकों से,
नशे में चूर
कदमों के लिए भी,
मंदिर के जैसे ही।
7
टूटना - पीड़ा
उससे भी अधिक
पीड़ादायी है
टूटने-जुड़ने का
विवश सिलसिला ।
8
घृणा ही हो तो
जी सकता है कोई
जीवन अच्छा
किन्तु बुरा है होता
प्रेम का झूठा भ्रम ।
9
तोड़ते नहीं
शीशा, तो क्या करते
सह न सके
दर्द-भरी झुर्रियाँ
किसी का उपहास ।
10
भरी गागर
मेरी आँखों की प्रिय
कुछ कहती,
जीवन पीड़ा सहती
लज्जित, न बहती ।
-0-

Friday, July 20, 2018

819-रस के लोभी

डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा 
1
रस के लोभी
भँवरे मँडराते
चतुर कली
देख-देख  मुस्काए
पर हाथ न आए ।
2
सागर हुआ
मिलने को बेकल
धीमे-धीमे ही
बहती कल-कल
कहती रही.... कल !
3
चाहें तुम्हें,ये
बताया ही न गया
लाज घूँघट
चाहके भी उनसे
हटाया ही न गया !
4
बड़ी बेदर्द
सावन की झड़ी है
उषा- सुंदरी
मिलने सजन से
बेकल- सी खड़ी है  !
5
मिलने आया
द्युतिमान सूरज
उषा मुस्काए
बैरिन है बदली
झट चुरा ले जाए ।
6
ढोल-नगाड़े
बजा रहा सावन
नाचे बरखा
कहीं उगे सपने
कहीं डूबा है मन !
7
भरा-भरा है !
रातभर सावन
क्यों रोता रहा !
भला दर्द किसका
मन भिगोता रहा
!

Wednesday, July 18, 2018

818



माहिया-रेनू सिंह जादौन
1
अम्बर बदली छाई
धरती तड़प उठी
ऋतु सावन की आई।
2
कैसी ये रीत पिया
सजना परदेसी
तड़पाती प्रीत पिया
3
शृंगार नहीं सजना
दर्पण सूना है
पायल भूली बजना।
4
तुमको लिखती पाती
सागर यादों का
लहरें उमड़ी जाती।
5
शुभ हो बरसात तुम्हें
प्रियतम घर आना
देना सौगात हमें।
-0--0-
अनिता मण्डा के 3 हाइबन
1-आषाढ़- अनिता मण्डा
आषाढ़ प्रतीक्षा की पूर्णता का महीना है। झमाझम संगीत और माटी की सोंधी सुरभि का महीना है। धरती की दरारों में छिपा अँधेरा बादलों की गड़गड़ाहट से भय खाता है। बूँदों के पोर आहिस्ता आहिस्ता धरती को गुदगुदाते हैं, हरियाली धरती की खिलखिलाहट है। तपस्वी पेड़ों की साधना का वरदान आषाढ़ बादलों के लिफाफों में बूँदों के ख़त लाता है। अपना दुःख, ताप धोकर पेड़ सरसाते हैं। सारे लोकगीत आषाढ़ पर पाँव धर सीधे सावन का झूला झूलने की हड़बड़ी में हैं। इन सबसे अनभिज्ञ आषाढ़ मदमस्त हाथी- सा गुज़रता है, गरजता है, बरसता है। एक आवेग हर कहीं भर देता है। नदियों की मंथरता टूटती है। पंछियों के गान फूटते हैं। जंगल कच्चे हरे से उफनता है। खेतों में हल के मांडने आस से हरे होते हैं। पर्वत, नदियाँ, जंगल, खेत, वनस्पति, जीव सब आषाढ़ ढ़ की छुवन से स्पंदित हो गाते हैं। बारिश सुख का संगीत रचती है, इंद्रधनुष का सतरंगी सितार प्रकट होता है, मानो अम्बर के आँगन रंगोली पूर दी हो किसी ने। कण-कण में अनुराग की उपस्थिति है बारिश।
1
आषाढ़  माह
अनुराग उपजे
मेघ बरसे।
2
बंजारे मेघ
गाएँ मल्हार राग
जागे हैं भाग।

-0-

2-बैसाख-- अनिता मण्डा

बैसाख में सूरज की प्यास अनियंत्रित हो जाती है। नदी तालाब बावड़ी जहाँ भी पानी दीखे अपनी किरणों की स्ट्रो से चोसता रहता है। बैसाख के ज़ुल्म से नदियों की देह सिकुड़ जाती है। लहरें घायल से पाँवों से रेंगती हुई अपनी पायल के घुँघरू उतार रख देती हैं। किनारे अपनी पहले दिन वाली जगह नहीं मिलते। नित्य जगह बदलते हैं। फिर भी वो नदी से अलग नहीं रह पाते। उसके साथ जो बंधन की आदत जो ठहरी।     
प्यासे चौपाये, पखेरू पल-पल अपने होने को बचा रहे तालाब-बावड़ियों के पास जाते हैं। प्यासे जीवों को तृप्त न कर पाने के दुःख में तालाब बावड़ियों का हृदय दरक जाता है। उनके पाँवों के निशान वो स्मृति-स्वरूप अपने पर संजो लेते हैं।
ऐसी ही बैसाखी दुपहरी में धूप को दूर-दूर तक बादल का कहीं आलम्बन नहीं मिलता। तब वो हरियाते रूखों का आश्रय ढूँढती है। पेड़ों के नीचे विश्राम करती छाँव काँप कर सिकुड़ जाती है। पेड़ अनवरत धूप का अनुवाद छाँव में करते हैं। ऐसा सटीक संवेदनशील अनुवाद करना और किसके बस की बात है भला।  दम साधे बैठे पंछियों का गला अवरुद्ध हो सुर गले में ही चिपक जाते हैं। तब हर कहीं सन्नाटा अपना साम्राज्य जमा लेता है। सन्नाटे से दम साधे जूझती प्यासी दुपहर रेंगती -सी चलती है। हर कहीं बस प्यास और प्यास। बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं का वैभव तब एकदम फीका लगता है ,जब उनमें प्यासे पंछियों के लिए एक मिट्टी का सिकोरा तक नहीं मिलता। पत्ता पत्ता प्यासा होकर बादलों को पुकारता है।
1
दरक गया
बावड़ियों का हिया
प्यासे पखेरू।
2
सताए प्यास
खोये हैं मीठे सुर
पंछी उदास।
-0-

3-गुलमोहर- अनिता मण्डा

चिलचिलाती धूप में जब आँखें खुलते हुए स्वतः सिकुड़ जाती हैं, सिर को छाँव का आसरा याद आने लगता है, हवा में बढ़ते तापमान की धमक त्वचा पर हमला कर चुभने लगती है तभी जेठ माह की धूप को मुँह चिढ़ाता गुलमोहर रंग पहनने लगता है। धीरे- धीरे हरा झड़ कर विरल हो जाता है और केसरिया, नारंगी, लाल हावी होता जाता है। धूप जब छाँव के अस्तित्व को मिटाने उसकी सीमाओं का अतिक्रमण करने लगती है गुलमोहर के फूल किसी योद्धा की भाँति  मुकाबले में डट जाते हैं। फूलों को कोमल समझा जाता है। उनकी सुंदरता बरबस मन मोह लेती है, दृष्टि बाँध लेती है। मधुमक्खियाँ उन पर उत्सव मनाती हैं। चूम-चूम कर रस का संचय करती हैं। शहद चुम्बनों का संचय है। तभी तो इतना मीठा  इतना विशुद्ध, गुणकारी है।
फूल कड़ी धूप में भी मुस्कुराना नहीं भूलते। अपनी एक मुस्कान से देखने वालों को ख़ुशी मिलती है तो ये काम इतना कठिन भी नहीं न। फिर हँसकर जिया जाये या मुँह लटकाकर जीना तो है ही। ख़ुश्बू कभी अपने फूल में लौटकर नहीं आती। पर पहचानी तो उसी के नाम से जाती है। हमारी मुस्कान भी वही ख़ुशबू है जो हमारी छवि के साथ ही किसी हृदय में बसी रह जाती है। एक मुस्कान जितना सा जीवन और कितने सुनहरे रंग। प्रकृति की कितनी बड़ी पाठशाला हमारे इर्द-गिर्द मौजूद है। कितना बड़ा कैनवस नित्य सजता  है। कितने रंग रोज़ अपना स्वरूप बदलते हैं। आँखें होते हुए भी कितना कुछ अनदेखा छूट जाता है हमसे। कितना निकल पाते हैं हम मन में लगे जालों को हटाकर। देखने की एक दृष्टि परिमार्जित करते ही दृश्य कितना कुछ कह जाते हैं। समझा जाते हैं। तो क्यों न गुलमोहर को देख कुछ पल को एक गुलमोहर अपने भीतर भी उगा लें जो जीवन के घाम को सहकर खिल उठे। जिसका मकरन्द किसी का सानिध्य चूमकर शहद सा मीठा बन जाए।
गुलमोहर
धूप में मुस्कराए
जीना सिखाए।

-0-

Sunday, July 8, 2018

816-मुलाक़ात


माहिया (मुलाक़ात)
पूनम सैनी
1
इक बार चले आओ

पूनम सैनी

मन में बसते हो,
नैनों में बस जाओ।
2
फूलों में रस जैसे
मैं तो बसती हूँ
साँसों में बस ऐसे।
3
बरसात बहाना है
दो पल रुकना है,
वापस  फिर जाना है।
4
ये बात नहीं अच्छी
बस दो ही पल की
बरसात नहीं अच्छी।
5
नज़रें झुक जातीं हैं
जब तुम मिलते हो
साँसें रुक जाती हैं।
6
यूँ आँख चुराओ ना,
हम तुम ग़ैर नहीं,
ऐसे शर्माओं ना।
7
आ पास ज़रा बैठो,
बात बसी दिल में,
आ पास ज़रा कह दो।
8
लब तो ना खोलूँ मैं,
आँखों से समझो,
नैनों से बोलूँ मैं।
-0-
पूनम सैनी
648/2 दयाल सिंह  कॉलोनी, नजदीक अलमारी फैक्ट्री, हाँसी ( हरियाणा)