Thursday, June 7, 2018

811-कंठ है प्यासा

डॉ.कविता भट्ट                                                                                                                                               
कंठ है प्यासा
पहाड़ी पगडंडी
बोझ है भारी
है विकट चढ़ाई
दोपहर में
दूर-दूर तक भी
पेड़ न कोई
दावानल से सूखे
थे हरे-भरे
पोखर-जलधारा
सिसके-रोए
ये खग-मृग-श्रेणी
स्वयं किए थे
चिंगारी के हवाले
वृक्ष -लताएँ
अब गठरी लिये
स्वयं ही खोजें
पेड़ की छाँव घनी
और पीने को पानी
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29 comments:

Anil Nawani said...

बहुत सुंदर

Pradeep Rajput said...

Superb.......

Kavita Bhatt said...

हार्दिक आभार, अनिल जी एवम प्रदीप जी

Vijay Bahuguna said...

Accha pryyas hai

Kavita Bhatt said...

हार्दिक आभार, आदरणीय विजय जी

SagarSialkoti said...

नमस्कार
डाॅ कविता भट्ट साहिबा निहायत ही खूबसूरत कविता मुबारकबाद आप ऐसे ही कहती रहें दुआ गो ख़ाकसार सागर सियालकोटी लुधियाना से

Siddhu Paji said...

बहुत ही खूबसूरत.........!

Himanshu Shekhar Jha said...

सुंदर!

सहज साहित्य said...

प्रकृति की उपेक्षा और उसके दुष्परिणाम को रेखांकित करता चोका।

प्रियंका गुप्ता said...

बहुत कुछ मनन करने को मजबूर करता सार्थक चोका है...|
बहुत बधाई...|

sunita kamboj said...

हृदयस्पर्शी चोका कविता जी ..हार्दिक बधाई 🙏🙏🙏

Dr.Purnima Rai said...

प्रकृति प्रेम का सटीक चित्रण किया। बेहतरीन

Kamla Ghataaura said...

कंठ है प्यासा मानव का ही नहीं हर जीव ,जन्तु और परिन्दों की प्यास का दर्द बयाँ कर गया ।बहुत खूबसूरती से लिखा गया है यह चौका ।बहुत सुन्दर लिखती है कविता जी ।बधाई दिल से ।

Balkrishan Goswami said...

सर्वप्रथम आपको प्रणाम।
बहुत सुन्दर

Vibha Rashmi said...

प्रिय कविता पहाड़ो की बेटी हो । दरख्तों की व्यथा जानती हो । सुन्दरभाव - कविता ।

Krishna said...

बहुत मर्मस्पर्शी चोका कविता जी बधाई।

Kavita Bhatt said...

आप सभी का हार्दिक आभार।

Sudershan Ratnakar said...

बहुत खूबसूरत

Shiam said...

जीवन के संघर्षों का अति सुंदर चित्रण पढकर मन को एक नयी चेतना मिली | वास्तव में यही तो जीवन की सच्चाई है | "जो आगे बढ़ते हैं वे पीछे मुडकर नहीं देखते "| मेरी सद्भावनाए कविता बेटी के लिए | आपकी लेखिनी दिन प्रतिदिन प्रखर रही है | श्याम त्रिपाठी हिन्दी चेतना

Satya Sharma said...

हमेशा की तरह बहुत ही उम्दा सृजन
हार्दिक बधाई

Dr.Bhawna said...

bahut khub! bahut bahut badhai..

anita manda said...

बहुत सुंदर

Kavita Bhatt said...

आप सभी का हार्दिक आभार

Dhruv Singh said...

आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' ११ जून २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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Digamber Naswa said...

सही कहा है पहले हम विनाश करते हैं फिर उसी को पाने का प्रयास करते हैं ...
इंसान का स्वार्थ प्राकृति को छीन रहा है ... लाजवाब रचना ...

Kashmiri Lal said...

बढिया

Kavita Bhatt said...

हार्दिक आभार आप सभी का।

ज्योति-कलश said...

सुन्दर , सार्थक सृजन !
हार्दिक बधाई कविता जी !!

jyotsana pardeep said...

बहुत सुन्दर... बहुत - बहुत बधाई आपको !