Monday, April 30, 2018

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ज्योत्स्ना प्रदीप

1-शुभ सौन्दर्य


ध्वनि शंख-सी

आँखें मोर-पंख-सी

एक छवि की!

कल्पना हो कवि की,

शुभ-सौन्दर्य

मूक चित्रकार का।

आकार लिये,

उस निराकार का।

सुशोभित हो

पीत-परिधान में

मुस्कान मानो

मोती भरा-कटोरा

फैला ब्राह्माण्ड

चहुँ ओर उजले

गीता का ज्ञान

तेरी-बाँसुरी स्वर!

या शंख-नाद

है समीर समेटे

आज भी कही

एक गोपी ढूँढ़ती

वह विटप

जिसके तले कान्हा

गैया के पास

आज भी अधलेटे

सुने जो सुर

अनादि-वंशी-तान

असीम-भाग्यवान!


2-अक्षम्य अपराध

 

तुमने मुझे

कभी तो चाहा होता,

सराहा होता।

एक शहर में ही

रहते नहीं

अलग-अलग से,

भोली भूलें थीं

माना मेरी भी कहीं,

पर तुम्हारे?

अक्षम्य अपराध

भ्रम-सर्पों के

मन के पाताल में

पालते रहे

जो हर पल दिल

सालते रहे।

दे गये नेह-पीड़ा,

उलाहनों के

तेरे दिये वह दंश,

यूँ मुझमें भी

समा गया आखिर

विष का अंश।

फिर भी यह मन

तुझमे खोया,

चाहे टूटा या रोया

एक ही आस

भर देती है श्वास

गाते अधर-

ज़हर को ज़हर

करेगा बेअसर।

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3-पिता

 

तुम कभी हो

विस्तृत आकाश से,

कभी लगते

एक दिव्य प्रकाश।

माना तन में

कोई कोख नहीं है

मन में किया

एक गर्भ-धारण

अपना अंग

स्वेद से सींचते हो।

शिशु के संग

दिवसावसान में

करते क्रीड़ा,

कल्पवृक्ष से तुम

हरते पीड़ा।

तेरा अनन्त ऋण

युग भी बीते

कोई चुका ना पाए,

आज पिताजी

बहुत याद आए,

उस तारे से

झाँकते मेरा घर

आशीर्वाद देकर! 

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9 comments:

ज्योति-कलश said...

सरस भावधारा !
तीनों चोका एक से बढ़कर एक , खूब बधाई !!

bhawna said...

बहुत सुंदर सरस चोका ज्योत्सना प्रदीप जी।
मन में किया गर्भधारण... वाह👌👌👌

भावना सक्सैना

anita manda said...

एक आंतरिक लय है इनमें जो सहसा बांध लेती है।
बहुत सुंदर बधाई।

Vibha Rashmi said...

बहुत खूबसूरत चोका , पढ़कर चित्त प्रसन्न हो उठा ।बधाई लें ।

Kavita Bhatt said...

बहुत सुन्दर चोका, हार्दिक बधाई .

Krishna said...

बहुत ख़ूबसूरत चोका...हार्दिक बधाई।

प्रियंका गुप्ता said...

तीनों चोका बहुत मनभावन हैं, आपको हार्दिक बधाई...|

Kamla Ghataaura said...

तीनो चौका एक से एक बढ़कर एक हैं ज्योत्सना जी ,सुन्दर सरस एवं भाव पूर्ण । हार्दिक बधाई स्वीकारें ।

sunita kamboj said...

बहुत भावपूर्ण,सरस चोका... हार्दिक बधाई ज्योत्स्ना जी