Friday, March 30, 2018

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सुदर्शन रत्नाकर
तितली

बाल रवि अभी-अभी उदय हुआ है। मंद-मंद, सुगंधित शीतल हवा चेहरे का स्पर्श कर रही है। मैं प्रकृति की इस छटा का आनन्द ले रही थी कि मेरी दृष्टि पीले रंग की एक तितली पर गई ।जाने कितने समय के पश्चात् आज फूल पर बैठी तितली को देख रही हूँ। कंकरीट के जंगलों में विलुप्त होते प्राकृतिक उपादान चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। चालीसवें माले पर गमलों में फूल-पौधे लगाकर हरियाली भले ही कर ली जाए : किन्तु तितली तो इतनी ऊँची नहीं न उड़ सकती।

बचपन में भाग-भाग कर तितलियों को पकड़ने की कोशिश और जब पकड़ लेते तो उसकी छुअन का जो अहसास होता था <उसकी अनुभूति आज भी रोमांचित कर रही है। तितली अब भी मेरे सामने है। एक फूल से उड़कर दूसरे फूल पर बैठती है, लेकिन लौटकर फिर उसी फूल पर बैठ जाती है। शायद यह फूल उसे अधिक आकर्षित कर रहा है। गहरे हरे रंग के पत्तों के बीच बैंगनी रंग के फूल और उस पर बैठी पीले रंग की तितली। इन तीनों प्राकृतिक रंगों की छटा को घूँट-घूँट पीती मैं सम्मोहन में बँधती जा रही हूँ। मैं इन क्षणों को अपने भीतर समा लेना चाहती हूँ।

तितली उड़ी
फूल-पंखुड़ियों के
गले जा मिली।
-0-

हाइबन

उन आँखों को भूलना आसान है क्या...?
प्रियंका गुप्ता

कई बरस बीत चुके हैं, मुझे हरिद्वार में हर की पैड़ी पर गए। पर जाने क्यों, जब भी...कहीं भी गंगा किनारे के घाटों पर जाती हूँ, दो निरीह...बूढ़ी और आशा से भरी आँखें मेरा पीछा नहीं छोड़ती। जाने कितने सवाल भरे हैं उन आँखों में...जवाब खोजते-खोजते थक गई हूँ, पर जवाब हैं कि हर बार मुँह मोड़कर चले जाते हैं। घाट की सीढ़ियों पर उतरती हूँ, तो दो लड़खड़ाते कदम, कँपकँपाते झुर्झुर हाथ मेरा सहारा लेने को आगे बढ़ आते हैं...पर चाहकर भी उन्हें थाम नहीं पाती। लपककर हाथ आगे बढ़ाती हूँ...सम्हालो अम्मा...पर फिर जैसे होश आता है। सामने न तो सवालों से भरी वह आँखें हैं, न वह डगमगाते कदम...और न ही वह कमज़ोर हाथ।

थककर वहीं सीढ़ियों पर बैठ जाती हूँ। नीचे उतरने की हिम्मत नहीं होती। पंडा कहता रह जाता है...नीचे जाकर आचमन करो बिटिया...गंगा मैया से माँग लो...जो माँगना है। मैया की मनौती खाली नहीं जाती। पर मैं माँगू भी तो क्या...? अन्दर अचानक ही जो खालीपन आ गया, उसे दूर करने की मनौती माँगू...या फिर ये...कि बरसों पहले जो सवाल सामने खड़े कर दिए थे तुमने...उनके जवाब ही दे दो मैया...?

आज भी...बहुत चाह कर भी दिलो-दिमाग़ से वह घटना नहीं निकल पाती। शादी के कुछ ही दिनों बाद देहरादून गई थी...मँझली बुआ सास के यहाँ...मोहिनी बुआ के यहाँ, तीन दिनों के लिए। दूसरा ही दिन था, जब देवर गौरव और ननदों दीपा, पारुल और प्रीती ने यूँ ही बैठे-बिठाए हरिद्वार-ऋषिकेश का प्रोग्राम बना डाला। राजीव तो नहीं जाना चाहते थे, पर उन्हें मनाने का भार दीपा ने सम्हाला। ऊपर से बुआ-फूफाजी का जोर...अरे, तुम्हारा न सही, बहू और इन सब का मन तो है। हो आओ एक दिन के लिए ही। हार कर राजीव तैयार हुए और एक बड़ी गाड़ी लेकर हम सब घर से रवाना हो गए. राजीव को ड्राइवर का पड़ोसी बना पीछे हम चारों फुलटूश मस्ती करते चल पड़े थे।

पहले ऋषिकेश थोड़ा-सा घूमते हुए हम सब शाम तक हरिद्वार पहुँचे...सीधे हर की पैड़ी पर। एकादशी का दिन था। सुहावना मौसम...एक बड़ा-सा जन-सैलाब...सामने हहराती गंगा जी। अप्रतिम नज़ारा था। हिम्मत तो नहीं थी, पर सबके कहने पर एक-दूसरे का हाथ पकड़कर नीचे की सीढ़ियों तक उतरी...गंगा का पानी ले अपने ऊपर छिड़क भर लिया। वापस ऊपर आकर सीढ़ियों पर बैठ नज़ारा देखते कब शाम का धुँधलका गहरा गया, अहसास ही नहीं हुआ। शाम की प्रसिद्ध गंगा-महा‍आरती का वक़्त हो रहा था। उठने ही लगी थी कि पीछे आ रही बातचीत कान में पड़ी...अम्मा, कब तक बैठी रहोगी...? भीड़ बहुत है, चलो उधर कोने में बैठा दूँ। अब कोई न आने वाला...बेकार ज़िद किए बैठी हो।

पीछे मुड़ कर देखा, अस्सी-पिचासी साल की एक बूढ़ी अम्मा मुझसे एक-दो सीढ़ी पीछे बैठी हुई थी। झुर्रीदार, पोपला मुँह...नाक पर बार-बार फिसल-सा आता मोटा चश्मा, जिसे वह नाक सिकोड़कर अपनी जगह पर टिकाए रखने का असफल प्रयत्न कर रही थी...और सफल न हो पाने पर गर्दन हल्की ऊँची कर उसे गिरने से बचाए हुए थी। सफ़ेद, थोड़ी मैली-सी धोती। कद शायद चार-साढ़े चार फुट से ज़्यादा नहीं रहा होगा। हाथ में एक गँदलाई-सी पोटली बड़े जतन से सहेजे हुए थी...मानो डर हो कि अशक्त जान कोई वह पोटली उनसे छीन न ले जाए। उस आदमी के उनके वहाँ से उठ जाने के इसरार के जवाब में उन्होंने बगल में रखी लाठी एक हाथ से पकड़ ली थी, जैसे ज़रा भी जबर्दस्ती हुई नहीं कि वह उस लाठी से उसका सिर ही फोड़ डालेंगी।

वो व्यक्ति उन्हें वहाँ से उठाने की कोशिश कर रहा था और वो...हम न जाबे, ब‍उआ अ‍इहें तो केहर ढूँढबे करि हमका...कहती उठने से इंकार किए जा रही थी। जाने क्यों हल्की उत्सुकता लगी। खुद को रोक नहीं पाई तो पूछ ही लिया...क्या हुआ अम्मा...? वह बूढ़ी अम्मा टुकुर-टुकुर मुँह देखने लगी। जाने मेरा सवाल समझ नहीं आया था या वह खुद नहीं समझ पा रही थी कि मेरी बात का जवाब क्या दें। उत्तर उस आदमी ने दिया...हुआ कुछ नहीं बिटिया। इनका बेटा इस बुढ़ापे में धोखा दे गया और ये हैं कि इस बात को मानने को तैयार ही नहीं। सुबह से इन्हें धोखा देकर यहाँ बैठा गया कि धर्मशाला ठीक करके आता हूँ...तब तुम्हें ले जाऊँगा। न उसको आना था, न वह आएगा। पर अब अम्मा को कौन समझाए...? इस तरह बीच में बैठी हुई हैं, भीड़ बढ़ रही। इधर लोग आरती के लिए खड़े होंगे...कहीं दब-दुबा गई तो क्या होगा...?

अम्मा शायद उसकी बात समझ रही थी, तभी गरियाने के से अन्दाज़ में अंट-शंट बोलने लगी...जिसका सार यही था कि उनका ब‍उआ जब कह कर गया है, तो आएगा उन्हें लेने। पर हकीक़त तो शायद सच में कुछ और ही थी। जिस तरह अपने विश्वास के समर्थन में उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, उसमें दिए की टिमटिमाती लौ-सी एक उम्मीद थी कि सच में उनका ब‍उआ उन्हें इस समय लेने आएगा न...? उम्र के इस पड़ाव पर, जब वे उसका सहारा नहीं बन सकती...वो उनको काँधा देने में हिचकिचाएगा तो नहीं न...? उनके इस विश्वास को आधार देने की कोई उम्मीद मेरे पास भी नहीं थी, सो मैंने भी नज़रें चुरा ली। आखिरकार उन्हें वहाँ से उठना ही पड़ा। राजीव के नाराज़ होने के कारण वहाँ से मुझे भी हटना पड़ा...पर जाते-जाते पीछे मुड़कर देखा...लड़खड़ा कर खड़ी होती अम्मा के हाथों से उनका आखिरी सहारा...वो लाठी...एक झटके से छूट कर जाने कहाँ विलीन हो चुकी थी।

भुला न पाऊँ
मिचमिची वह आँखें
सहारा माँगे।

11 comments:

प्रियंका गुप्ता said...

मेरे हाइबन को यहाँ स्थान देने के लिए बहुत बहुत आभार...।
सुदर्शन जी का हाइबन बहुत मनमोहक है, मेरी हार्दिक बधाई ।

Shiam said...

सुदर्शन जी एवं प्रियंका जी की काव्यमयी रचनाएं पढकर जीवन की क्ष्ण भंगुरता और मानव जीवन की विभिन्न परिस्थितियों का जो चित्र सामने आया है | एक ओर तितली की उपमा और दूसरी ओर जीवन की विवशता दोनों में कवित्व की झलक है | एक सच्चा उदाहरण है कि गद्दय और पद्यय दोनों में विशेष अंतर नहीं होता |पढकर एक आनन्द की अनुभूति हयी | श्याम त्रिपाठी -हिन्दी चेतना

Anonymous said...

दोनी ही रचनाएँ बहुत हृदयस्पर्शी .... अनुभूति की सुन्दर अभिव्यक्ति ..... सुदर्शन जी एवं प्रियंका जी को अभिनन्दन
पूर्वा शर्मा

Dr. Surendra Verma said...

दोनों ही रचनाए मन को छू गईं | बहुत सुन्दर | सुदर्शन जी का बहुत ही कसा हुआ हाईका है | टू द पॉइंट |सुत्रेन्द्र वर्मा

डॉ. जेन्नी शबनम said...
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डॉ. जेन्नी शबनम said...

रत्नाकर जी की रचना प्रकृति की सुन्दर छटा बिखेर रही है. बहुत सुन्दर. बधाई रत्नाकर जी को.
प्रियंका जी की रचना बेहद मार्मिक है. मन को गहरे छू गई. जीवन का एक सत्य यह भी है. भावपूर्ण हाइबन के लिए प्रियंका जी को बधाई.

Kamla Ghataaura said...

सुदर्शन जी का तितली हाइबन जैसे एक शब्द चित्र हो काव्यमय मोहित कर गया ।
प्रियंका जी आप का हाइबन बहुत मार्मिक है । वृद्धा के साथ हुये धोखे की अविस्मरणीय याद ।कभी नहीं भुलाई जा सकती ।आप के इस भाव पूर्ण हाइबन ने हमें भी हरिद्वार की सैर करा दी । लेकिन मन विचलित हो गया ।माँ के टूटे विश्वास से ।

Sudershan Ratnakar said...

प्रियंका जी बहुत ही मार्मिक हाइबन मन में एक टीस सी उत्पन्न कर गया
मेरा हाइबन पसंद करने के लिए आप सबका हृदय से आभार।

Pushpa Mehra said...

प्रकृति के उपादानों (छोटे से छोटे ) से प्राप्त होने वाले सुख और आबादी के बढ़ते चरणों के साथ -साथ बढ़ती जा रही माँगों के फलस्वरूप उनका विलुप्त होते जाना इस तथ्य को आपने जो काव्यमय रूप दिया वह उड़ते पक्षी को गोद में बिठा उसे अपने स्नेह-बंधन में बाँधने जैसा लगा , सुदर्शन जी बधाई | प्रियंका जी का हाइबन सम्वेदना हीन - कर्तव्य विहीन भटके हुए समाज की -परिवार की असलियत उजागर करती कहानी,एक दर्द उभारता आईना है |सुंदर प्रस्तुतिकरण हेतु बधाई|
पुष्पा मेहरा

ज्योति-कलश said...

ईश्वरीय प्रकृति तो बहुत सुन्दर , मनभावन है !
मानवीय प्रकृति को क्या हुआ .. क्या करें ... ??
दोनों ही हाइबन बेहद ख़ूबसूरत ... हार्दिक बधाई !!

anita manda said...

बहुत मार्मिक हाइबन।