Thursday, December 28, 2017

787


  विभा रश्मि 

सोन  चिरैया 
चुग्गा चोंच - दबाए
उड़ी थी फुर्र  
बसेरे का सपना 
नीड़ अपना 
चूज़े भरें आनंद 
पंख फैलाएँ
तपिश -आलोडन
महके मन
चिरैया डाल -डाल
है इठलाए
तिनके भरे चोंच
बनी  श्रमिक 
कलरव नवल
वसंत हर पल ।
-0-

ललना प्यारी
घुटरुन खिसके
मोह ले हिया 
मनोहारी  मुद्राएँ 
वश में मैया 
विस्मृत दिनचर्या
लेती बलैयाँ 
पकड़ भई खड़ी
साड़ी का पल्लू 
गिरे जब  विलापे 
अंक में छिपी
ललना किलकारी 
मैया दुनिया सारी । 

-0-

Tuesday, December 19, 2017

786

डॉ. सुधा गुप्ता
1.
जैसे ही ज़रा
पंख फरफराए
उड़े, छोड़ ममता
घोंसला रोता
धीरज बँधाने को
कहीं, कोई होता।
2
टूटे भरम
नदी हँसती रही
घिरे आग में हम
झूठे सपन
वो मख़मली  फूल
बने कैक्टस शूल
3
फूलों का ढेर
जीवन भर सींचा
मोहक था बग़ीचा
वक़्त का फेर
फूलों का उपवन
बना पाहन-वन
4
प्यास थी घनी
रूठे कुएँ, पोखर
सरिता अनमनी
दो घूँट जल
पाने को तरसे
रहे सदा विफल।

-0-

Monday, December 11, 2017

785

ताँका रचनाएं : डॉo सुरेन्द्र वर्मा

1

घिरती रात 

दहाड़ती लहरें

समुद्र तट -

यहाँ नहीं हो तुम

फिर भी मेरे पास

2

हर चौखट

भटकता रहा मैं

तुम्हारे लिए

जंगल में बस्ती में

गरमी में सर्दी में

3

इतना वृद्ध

कि छोड़ गए मित्र

सारे के सारे

बरगद पुराना

देता रहा सांत्वना

4

वासंती दिन

हर जगह शान्ति

जूही के फूल

क्यों अशांत होकर

यत्र तत्र बिखरे 

5

वादा करके

मुकर गई थी

मेरी तो छोडो

सौगंध खाकर वो

है कित्ती दयनीय !

 6  

एक अकेला

पर्वत की ढाल पे

चीड का वृक्ष

चारो ओर ताकता

कोई साथी न पास

7

युग युगांत

बीते राह देखते

झोली न भरी

खाली आई थी साथ

रीती चली जाएगी

8

डूबना चाहा

उतराता ही रहा

सतह पर

गहरी थी नदिया

तैर भी तो न पाया

9

सर्वत्र व्याप्त

अनुपस्थित रहा.

एकला चला 

भीड़ जुटती गई

राह बनती गई

(10

गुलमोहर

सहता रहा ताप

हंसता रहा

तंज कसता रहा

क्रोध पर सूर्य के

-0-                                               

डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड ,इलाहाबाद -२११००१ 

-0-
2-पुष्प मेहरा 

यादें हैं मेरी
उधार की न कोई,
मिलीं भेंट में
अपनों से ही मुझे
अमूल्य बड़ी
ब्याज़ न वसूलतीं
लुटीं न कभी
मन- पेटिका भरी
चमकती हैं
सदा स्वर्ण-आभा- सी
दिपदिपातीं
रातों में जुगनू -सी
चन्द्र-चन्द्रिका
भोर उजास -भरी
झोंका हवा का
ठंडा मनभावना
जुड़ाता मन
ताप धूप का बन
जलाती मन
कभी झड़ी वर्षा की
फुहार बन
अंतर्मन भिगोती,
अरे ! देखो तो
पेटी में बंद  डाँट
प्यारी अम्मा की
जो तहों में सहेजी
पड़ी थी दबी
आज अचानक ही
खुलने लगी
परतें,सुगंधित
उसकी सारी ,
भीगा जो मन-पट  
मीठी गंध से
हो उठी भावुक मैं
रोए जो नैन
तह से खुला पल्लू ,
माँ का निकला        
पोछने लगा आँसू
धीरे-धीरे से,
अहा !अमोल पल
सुरभित वे
भूलूँगी नहीं कभी
सोचती हुई ,
दौड़ गई तेज़ी से
कभी बस्ती में
कभी सूनेपन में
झूलों-पेड़ों पे
मन्दिरों व बागों में
खलिहानों में
रातों-महफ़िलों में
देखती फ़िल्में -
हर पल बिताए
सभी दिनों की
हसीन थे जो सारे,
उन्हीं दिनों को
तह पे तह लगा
बंद पेटी में
बुरी नज़र वाले
हर साथी से 
छिपा  कर रखूँगी
सूने में ही खोलूँगी ।

-0-

Monday, December 4, 2017

784

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1
मन-मीत चले आओ
दो पल बाकी हैं
सीने से लग जाओ।
2
तन से तुम दूर रहे
पर सूने मन में
तुम ही भरपूर रहे ।
3
बस इतना जाने हैं-
इस जग में तुमको
हम अपना माने हैं।
4
जाने कब आओगे !
बाहों में खुशबू
बनकर खो जाओगे।
5
कुछ समझ नहीं आता
कितने जन्मों का 
मेरा तुमसे नाता ।
6
जब अन्त इशारा हो
होंठों पर मेरे
बस नाम तुम्हारा हो।
7
जिस लोक चला जाऊँ
चाहत इतनी-सी-
तुमको ही मैं पाऊँ।
8
तुमको जब पाऊँगा-
पूजा क्या करना
मंदिर क्यों जाऊँगा।
9
चन्दा तुम खिल जाना
सूनी रातें हैं
धरती से मिल जाना।
10
नभ आज अकेला है
प्यासी धरती से
मिलने की बेला है।
11
जीवन में प्यास रही-
जो दिल में रहते
मिलने की आस रही।
12
चित्र; कमला निखुर्पा 
बादल तुम ललचाते
आकर पास कभी
क्यों दूर चले जाते ।
13
धरती ये प्यास-भरी
बादल रूठ गए
मन की हर आस मरी।
14
तुमको पा जाऊँगी
कब तक रूठोगे
हर बार मनाऊँगी।
15
इस आँगन बरसोगे
प्यासा छोड़ मुझे
तुम भी तो तरसोगे।
-0-

Friday, December 1, 2017

783

मंजूषा मन
तुम मन को भाते हो
मन में बसकर तुम,
कितना इठलाते हो?
पहले ना खबर हुई
मन में आप बसे,
तब मुश्किल जबर हुई।
सन्नाटा गहरा था
तेरे आने से
टूटा हर पहरा था।
जन्मों तक तुम मिलना
मेरे मन बस कर,
तुम फूलों से खिलना।
होता जो अच्छा है
तुम विश्वास करो
ये रिश्ता सच्चा है।

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