Friday, November 24, 2017

782

माहिया :
नोक-झोंक माहिया का विशिष्ट गुण हुआ करता था , जो जीवन की आपाधापी में गुम होता गया। डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा जी ने अपने माहिया में इसे जीवन्त कर दिया है। -सम्पादक
 डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा 
1
ये तय इस बार किया 
मैं जाती मैके
घेरो घर-बार पिया।
2
भर चटनी की बरनी 
सखियों संग मुझे 
थोड़ी मस्ती करनी।
3
सब ढंग निराले हैं 
अफसर तुम सजना
छुट्टी के लाले हैं ।
4
तू है मन की भोरी 
खूब थका लेंगी 
चंचल सखियाँ तोरी ।
5
दिल को दिल भाएँगे 
दिन दो-चार रुको 
दोनों मिल आएँगे ।
6
ग़म से पहचान नहीं 
तुम बिन अब सजनी 
जीना आसान नहीं ।
7
मत बात करो खोटी
तुम घूमो जग में 
मैं घर सेकूँ रोटी ।
8
सीधा- सा काम करो 
टिकट अभी मेरा 
बनवा आराम करो ।
9
ये राग पुराने हैं 
बाँध मुझे रखना 
सब खूब बहाने हैं ।
10
क्या बात करो गोरी ?
कटतीं ना सच में 
तुम बिन रतियाँ मोरी ।
11
देखो मनुहार करूँ
तुम बिन चैन नहीं 
बस तुमसे प्यार करूँ ।
12
दुखतीं अँखियाँ मेरी 
फोन मुआ तेरा 
कितनी सखियाँ तेरी ।
13
कितना बतियाते हो 
क्या जानूँ कित से 
दाना चुग आते हो ।
14
मैं तो अब जाऊँगी 
कुछ दिन जी भरकर 
मिल, वापस आऊँगी ।
15
जपना मीरा, राधा 
हो आजाद पिया 
सब दूर हुई बाधा ।
16
छोड़ो भी ये ताना 
ओ सजनी प्यारी  
जल्दी घर आ जाना ।
17
हूँ चाँद, चकोरी ने 
फोन किया देखो 
मैके से गोरी ने ।
18
कैसे हैं हाल पिया 
महँगी है रोटी 
गलती क्या दाल पिया ।
19
मत फिकर करो मेरी 
दे जाती थाली 
दिलदार सखी तेरी ।
20
है बात न जल्दी की 
मुझको क्या चिंता 
आटे या हल्दी की ।
21
कैसे नादान पिया 
फैटी फ़ूड तुम्हें 
देता नुकसान पिया।
22
मैं टिकट कटाती हूँ 
साँझ ढले सजना 
वापस घर आती हूँ ।

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Tuesday, November 21, 2017

781

मन का साथी 
डॉ.पूर्णिमा राय

समेट लिया
सूनापन भीतर
विस्तृत मन
नीलांबर को घेरे
उड़ते पाखी
हो गए हैं विलीन
मनु आहत
कैसी दिखती सृष्टि 
प्रेम- विहीन
श्रद्धा एवं इड़ा भी
व्याकुल बड़ी
ढूँढने है निकली
मन का साथी
दूर करे खालीपन
तृप्त हो रूह
चलके भक्ति- मार्ग
निस्वार्थ सेवा
कर्मरत मनुज
बाँटे खुशियाँ 
खोज लेता आशाएँ
अन्धकूप में 
बटोही की पुकार
 बंजर भूमि
बुनियाद से हिली
धँसती जाती
अपनों से आहत
है सदा सीता मैया!!
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 डॉ.पूर्णिमा राय,शिक्षिका
अमृतसर (पंजाब)
ईमेल-drpurima01.dpr@gmail.com 

Saturday, November 18, 2017

780

मंजूषा मन
1.
तुम्हारा ख़्या
लगे ज्यों नर्म शॉल
भावों की गर्मी,
नेह का उपहार,
बना रहे ये प्यार।
2.
तुम्हारा साथ
सर्दियों में लिहा
नर्म आभास
ओढ़ के इतराऊँ
हृदय से लगाऊँ।

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Tuesday, November 14, 2017

779

भोर की बेला
सुदर्शन रत्नाकर

भोर की बेला
धूसर आसमान
सोए हैं पक्षी
थका -थका सा चाँद
मंद पवन
तारों का रंग फीका
दुल्हन रात
कैसे रंग निराले
लुटा शृंगार
आँसुओं का सैलाब
भीगी धरती
गुपचुप कलियाँ
सूनी डगर
सन्नाटा है पसरा
ओर न छोर।
प्रकृति नहीं हारी
करवट ली
बदल गया सब
उगा सूरज
नभ नील झील में
बिखरे रंग
जाग उठा जीवन
जग- ऑगन
कलरव करते
उड़े विहग
खिल गईं कलियाँ
शीतल हवा
छू रही तन -मन
आलस्य छोड़
उठ गया इन्सान
नव  स्फूर्ति आह्वान।

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