Tuesday, August 15, 2017

773

परमजीत कौर 'रीत'
1
खामोशी कहती है
यादें सावन बन
आँखों से बहती हैं
2
आँगन के फूलों की
याद बहुत आ
नानी-घर झूलों की
3
नभ को तकती नजरें
पाँव धरा पे जो
मंजिल थामे बाहें
4
क्या खोना ,क्या पाना
अपनों के बिन ,जी!
क्या जीना,मर जाना
-0-kaurparamjeet611@gmail.com

-0-

8 comments:

anita manda said...

क्या खोना ,क्या पाना
अपनों के बिन ,जी!
क्या जीना,मर जाना।

अपनों के बिन, जी

सुंदर प्रयोग।
अच्छे माहिया, बधाई।

डॉ. जेन्नी शबनम said...

बहुत सुन्दर माहिया, बधाई परमजीत जी.

प्रियंका गुप्ता said...

आँगन के फूलों की
याद बहुत आए
नानी-घर झूलों की

हाँ सच्ची, कितना कुछ याद आता है ऐसा...| भावपूर्ण और बेहतरीन माहिया के लिए आपको बहुत बधाई...|

Krishna said...

उम्दा भावपूर्ण माहिया परमजीत जी बहुत बधाई आपको।

Kamla Ghataaura said...

सुन्दर माहिया रचे परमजीत जी ।बहुत भाये ।

ज्योति-कलश said...

सुन्दर माहिया ..हार्दिक बधाई !

jyotsana pardeep said...

भावपूर्ण माहिया परमजीत जी.. बहुत बधाई!!

Vibha Rashmi said...

मनभावन माहिया परमजीत जी ।ढेर बधाई ।
क्या खोना ,क्या पाना
अपनों के बिन ,जी!
क्या जीना,मर जाना ।