Thursday, June 8, 2017

767

1-कमला  निखुर्पा
1
थी मैं अभिधा 
गिनाए जो तुमने
लक्षण मेरे 
बन गई व्यंजना 
खुद को पहचाना ।
-0- 
2-रामेश्वर काम्बोजहिमांशु
1
मैं निरुत्तर
तेरा नेह-विस्तार
धरा से नभ
नहीं पा सका पार
भिगो रही बौछार ।
-0-
रमेश कुमार सोनी  
1
नदी अकेली
प्यास बुझाने दौड़ी
बस्ती बसाती
प्रदूषित हो जाती
बचाओ नहीं बोली
2
धूप की कूची
भित्ति चित्र पेड़ों के
रोज बनाती
सदा से ही अधूरी
छोटी –बड़ी हो जाती

-0-

11 comments:

Rekha said...

सभी ताँका सुंदर व्यंजक भाव -प्रधान !!!
सादर बधाई !

Sudershan Ratnakar said...

सभी ताँका बहुत सुंदर

Dr.Bhawna said...

Sabhi rachnayen gahan abhivykti liye,sabhi ko hardik badhai...

Anonymous said...

एक से एक बढकर ।

Dr Purnima Rai said...

आ.कमला जी
आ.रामेश्वर सर जी
आ.रमेश सोनी जी
आप सभी ने विशिष्ट भावनाओं की उम्दा अंदाज से प्रस्तुति की है...आप सभी को नमन !!

ज्योति-कलश said...

बहुत अच्छे ताँका !
सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई !!

Pushpa Mehra said...


सभी ताँका बहुत सुंदर हैं,बधाई |

पुष्पा मेहरा

Krishna said...

बहुत बढ़िया सभी तांका।
आप सभी रचनाकारों को बहुत बधाई।

sunita kamboj said...

सभी ताँका बहुत सुंदर मनभावन ..आप सबको हार्दिक बधाई ।

Kashmiri Lal said...

beutiful

प्रियंका गुप्ता said...

सभी तांका बहुत अच्छे हैं...| मेरी बधाई...|