Tuesday, January 24, 2017

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मन सीपी- सा
भावना सक्सैना
(छाया:रश्मि शर्मा, राँची, झारखण्ड)

जग-सागर
लहरों-सा जीवन
कौन किनारे
जाने कब क्या मिले!
ढेर सीपियाँ
शंख अनगिनत
लहरों में आ
टकरा तट पर
मिले रेत में
फिर भी कितने ही
कण बेगाने
गर्भ अपने रख
रंग -बिरंगे
बुनकर क़तरे
संजोते मोती,
सीप- रत्न दे जाते
सह पीड़ा को।
मोती कितने भरे
मन के सीप
आओ सींचें हौले से
स्नेह कणों को
परख हवाओं को
बंधन -मुक्त
लहरों संग बहें
बन सहज चलें।
-0-

11 comments:

sunita kamboj said...

वाह भावना जी उत्तम सृजन

Kashmiri Lal said...

मन भावन

jyotsana pardeep said...

मनमोहक चोका भावना जी !

शुभकामनाओं के साथ -
ज्योत्स्ना प्रदीप

Vibha Rashmi said...

बहुत सुंदर चोका सृजन भावना जी। बधाई लें ।
सस्नेह विभा रश्मि

Vibha Rashmi said...
This comment has been removed by the author.
Dr Purnima Rai said...

Dr Bhavna ji

Bahut sunder likha

ज्योति-कलश said...

सुन्दर मोती..हार्दिक बधाई भावना जी !

anita manda said...

बहुत अच्छी रचना।

Savita Aggarwal said...

मनमोहक रचना पर भावना जी बधाई हो |

सुनीता शर्मा said...

Manohari rachna badhai

प्रियंका गुप्ता said...

एक खूबसूरत रचना के लिए बहुत बधाई...|