Tuesday, January 31, 2017

750



विभा रश्मि
1
नव पल्लव फूटे हैं
शाखाओं ने भी
सजवाए  बूटे हैं।
2
मधुपायी ने पी है
फूलों की हाला
फुलवारी से दी है ।
3
जोगी मन मेरा है
मन के आँगन में 
प्रियतम का डेरा है
4
पत्तों पे फिसली हैं
शबनम
के मोती
सब सच्चे असली हैं ।
5
झिलमिल चुनरी तोरी
शरमाई जब थी
सजना तुझ से गोरी ।
6
ये दिल
गुनगुन गाता
भीगा बरखा में
तू याद सदा आता।
7
रिमझिम बारिश बरसी
पी कब आ
एँगे
मन भीगा
, मैं तरसी ।
8   
बालम मीठी बतियाँ
तेरी रस भीगी
भूली सूनी रतियाँ ।
7
लहरों के रेले हैं
आते जाते पल
दुनिया के मेले हैं ।
8
माँ की बाँहों का है
लोरी
का पलना
आँचल  चाहों का है ।
9
मखमल
-सा मन तेरा
मुझ से बतियाता
सूरज और सवेरा  ।
10
चल नौकायन सजनी
सागर में चाँदी
घोले रूपा  रजनी ।
11
मेघों का मुकुट लगा
सज  बरखा रानी 
पी तो है  प्रेम पगा।
-0-
  Vibharashmi31@gmail.com    
   09414296536

Tuesday, January 24, 2017

749



मन सीपी- सा
भावना सक्सैना
(छाया:रश्मि शर्मा, राँची, झारखण्ड)

जग-सागर
लहरों-सा जीवन
कौन किनारे
जाने कब क्या मिले!
ढेर सीपियाँ
शंख अनगिनत
लहरों में आ
टकरा तट पर
मिले रेत में
फिर भी कितने ही
कण बेगाने
गर्भ अपने रख
रंग -बिरंगे
बुनकर क़तरे
संजोते मोती,
सीप- रत्न दे जाते
सह पीड़ा को।
मोती कितने भरे
मन के सीप
आओ सींचें हौले से
स्नेह कणों को
परख हवाओं को
बंधन -मुक्त
लहरों संग बहें
बन सहज चलें।
-0-

Sunday, January 22, 2017

748



1-शशि पाधा
 1
वो पीर पुरानी थी
तुमसे पाई जो
इक प्रेम -निशानी थी
2
नभ छू लें तो कैसे
बीते लमहों को
हम भूलें तो कैसे
3
इक तू ना मानेगा
अधर सिले ,खोलें
जग सारा जानेगा
4
लगता मधुपान किया
साँसें महक उठीं
जब तेरा नाम लिया
5
बन धूप सुहाती है
याद तुम्हारी जब
आँगन में आती है
6
हम ओढ़े पहनेंगे
तेरी यादों को
चुनरी में बाँधेंगे
7
मधु भीगी बातों में
मोती बीन लिये
पूनो की रातों में
8
रातों का राही दे
झूठा सच लागे
जब चाँद गवाही दे
9
आँखों की निंदिया में
हर पल रहना तुम
माथे की बिन्दी में
10
कुछ बदली-बदली -सी
किरनों की चुनरी
कुछ मचली-मचली सी
-0-
2-डॉ.पूर्णिमा राय

1
शब्द प्रवाह
बेंधता निर्बाध ही
मन का द्वार
जाग जाती तृष्णाएँ
अर्थ की तलाश में!!
2
अर्थ ग्रहण
मिले तृप्ति पल की
शब्दों का खेल
भँवर ज्यों सागर 
घूमता त्यों मस्तिष्क !!
3
अर्थ विहीन
मृदु शब्दों का खेल 
उलझ गया
सुबह और शाम 
दो दिलों का तराना!!
4
शब्द- चातुर्य
बिगाड़े औ सँवारे
सदा सीरत 
शब्द के खेल  से ही
हो मुट्ठी में दुनिया!!
-0-