Sunday, August 14, 2016

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दीप जला
पुष्पा मेहरा

शुभ बेला में
साँझ की ड्योढ़ी पे
जला जो दीप,
करता है इशारा-
हटेगा तम
व्यापार विनाश का
होगा समाप्त
हिंसा औ भेद-भाव
होंगे काफ़ूर
वैर -भाव मिटेंगे
फैलेगा प्यार
अंतर्विरोध हारेगा
कर विचार
जाते सूरज ने भी
सौंपा दुशाला
अभ्रकी केसरिया
सिन्धु को सारा,
धार लिया सिन्धु ने
निज तन पे
उसे सौगात मान
देखो तो ज़रा !
गर्व से फूला फूला
आन- शान से
व्रत तट-रक्षा का
मन में लिये
वह शौर्य से भरा
गरज रहा
चौकस भरपूर
धरती माँ के
चरणों को पखार ,
होगा निर्माण
लेके नया विश्वास
भूल थकान
यहाँ-वहाँ भागके
तटों को जगा
इस रोशन देश में
नूर से भरा
कर्तव्य निभा रहा ,
फूटी किरण
देख तेज नभ का
पाखी भी सारे
हर्ष की पाती थामे
लौटे नीड़ से,
दुंदभी बज उठी
लहरें नाचीं
लहराया तिरंगा
चहके पंछी ,
गूँज उठा आकाश
बरसे  फूल
ध्वनि राष्ट्र गान की
सोतों को जगा ग |
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5 comments:

ज्योति-कलश said...

बहुत सुन्दर दृश्य साकार किया दीदी !
बहुत-बहुत बधाई !!

jyotsana pardeep said...

सुन्दर... भावपूर्ण.... पुष्पा मेहरा जी आप को बहुत-बहुत बधाई !!

anita manda said...

आदरणीया पुष्पा जी आशा का संचार करता आपका चोका बहुत प्रेरक है।


धार लिया सिन्धु ने
निज तन पे
उसे सौगात मान
देखो तो ज़रा !
गर्व से फूला – फूला
आन- शान से
व्रत तट-रक्षा का
मन में लिये
वह शौर्य से भरा
गरज रहा
चौकस भरपूर
धरती माँ के
चरणों को पखार ,

इन पंक्तिओं ने तो मन मोह लिया।

Vibha Rashmi said...

बहुत सुंदर भाव, भावपूर्ण प्रस्तुति ।बहुत उम्दा पुष्पा दीदी।बधाई ।

rbm said...

साथ में दिए गये चित्र में समुद्र की कुलाँचे भरती सुनहरी किरणें कभी मुझे खिलखिलाती लगीं तो कभी बलशाली कर्तव्य बोध कराती लगीं जिन्हें देख मुझे महसूस हुआ कि प्रकृति का हर अंग, जिसका हम ग़लत या सही रूप में लाभ उठाते हैं
कितने सहज स्वाभाविक रूप में अपना हर दायित्व निभाता है और तभी मैंने उस सागर के निच्छल रूप को स्वतन्त्रता दिवस की गरिमा के साथ उकेरने की टूटी-फूटी कोशिश की थी | आज अचानक इस छोटे चोके के माध्यम से प्राप्त कुछ टिप्पणियों में अपना नाम देख कर मैं सम्पादक द्वय का आभार प्रकट करना चाहती हूँ ,साथ ही उत्साहवर्द्धक प्रक्रिया हेतु अपनी प्रिय सखियों को हृदय से धन्यवाद दे रही हूँ |

पुष्पा मेहरा