Monday, August 8, 2016

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1-बोल दो मीठे बोल
प्रेरणा शर्मा

 
प्यारी बगिया
बहुत जतन से
घर के आगे
महकाए आँगन
फूलों के रंग
सुंदर फुलवारी
मन बावरा
देख-देख हर्षित
बाग़ अनोखा
फूला नहीं समाता
ख़ूबसूरती
देख-देख झूमता
गुनगुनाता
सपने बुन रहा
झूमूँ या गाऊँ
कितना इठलाऊँ
सोचते हुए
सहसा, अनायास
हवा का झोंका
संग संग अपने
अतीत को ले या
छा गये चित्र
स्मृति-पटल पर
निज यादों में
सुधि वृक्ष की छाई
था हरा-भरा
बगिया बीच खड़ा
शोभा घर की
गौरव बना रहा
कुछ दिन से
घर के पिछवाड़े
उसे लगाया
तब से बिसराया
सोच में डूबा
हुआ मन उदास
जाकर देखा
जब उसके पास
हरित वृक्ष
यों क्यों कुम्हलाया है
सूख- सा गया
क्यों रूह और गात
खड़ा उदास
मुरझाया -सा क्यों है
वीरान सा -हो
घबराया -सा क्यों है
जानते हुए
अनजान बने हो
पूछते हो तो
सुनो दर्द की दास्ताँ
मन को मारे
अपनों को पुकारे
चुप -सी साधे
है बाट जोह रहा
कभी बैठते
सब उसकी छाँव
गुनगुनाते
प्यार के मीठे गीत
झूला झूलते
शाख़ पर उसकी
भीनी ख़ुशबू
फैलती चहुँ ओर
सबका प्यारा
था घर का दुलारा
मान देते थे
घर-भर के बच्चे
सहकर भी
आतप के प्रहार
चमकता था
जिसका पात-पात
साये का साथ
ढूँढता वही आज
बैठता नहीं
कोई उसके पास
वक़्त किसे है
करने को दो बात
समय नहीं  ?
कैसी बेतुकी बात
ठहरो ज़रा
हिय को तो टटोलो
कैसे यों भूले
अपनत्व जो पाया
सुकून मिला
जिसके साये तले
उँडेल ज़रा
गागर भरकर
स्नेह का नीर
उसकी जड़ों पर
छाँव में सुस्ता
दो घडी पलभर
सुन तो ज़रा
उसके मन की बात
लाभ न देख
तराज़ू में न तोल
बैठ तो पास
मन की आँखें खोल
बोल दो मीठे बोल।
-0-
2-बाग़बा कोई
प्रेरणा शर्मा,

मनमोहक
उपवन की शोभा
सुंदर पुष्प
खिले हैं क्यारियों में
प्रसन्नचित
भँवरों की गुँजार
मँडरा रही
चंचल तितलियाँ
ख़ूबसूरत
है नज़ारा बाग़ का
शोभा इसकी
मुग्ध करे सबको
मगर कौन
कब कितनी बार
पूछता उसे
जो बाग़ को पालता
परिश्रम से
चमन सँभालता
मुस्कराहटें
फूलों पर वारता
करता प्रीत
क्यारियाँ सँवारता
सुनता वह
कोयल की कुहुक
मोर की पीहू
पपीहे की पुकार
दादुर- टेर
पल-पल सुनता
स्वयं बनता
चमन-मनमीत
है निरखता
रंगी शोख़ कलियाँ
मन मुदित
गुलज़ार गुलिस्ताँ
अजीब दास्ताँ
बाग़ जग सराहे
बाग़बा कोई- कोई।
-0-

चोका भाव-ूमि के  विषय में

सम्माननीय संपादक द्वय  
 नमस्कार!
सर्वप्रथम मुझ जैसे नए रचनाकारों को इस परिवार में मंच प्रदान करने के लिए हार्दिक आभार , धन्यवाद । मेरी रचना 'चोका' ('बोल दो मीठे बोल') वर्तमान पीढ़ी द्वारा बुज़ुर्गों की अनदेखी से संबंधित है। वर्तमान समय अधिकतर लोग हर काम या व्यक्ति को उपयोगिता और लाभ के दृष्टिकोण से महत्त्व देने लगे हैं।अन्य को समयाभाव की दुहाई देकर अनदेखा करने लगे हैं। सम्मान व प्यार की भावना लुप्त- सी हो चली है और पुराने पेड़ के समान परिवार के बड़े बुज़ुर्ग एकाकीपन का दंश झेलने को मजबूर हो रहे हैं। प्रकट रूप में हम बहुत सभ्य व सुसंस्कारित जीवन शैली में आनंदित व उत्साहित होने के लिए उद्यत हो रहें होते हैं ,वहीं जीवन को सरलता व सादगी से जीने वाले हमारे बुज़ुर्ग हो चले परिवार जनों की तरफ़ स्नेह -सम्मान की तरफ़ से लापरवाह होते जा रहे हैं। दूसरा चोका- बागबां कोई-कोई' भी कमोबेश इसी तरह के भाव लिये है कि हमारे जीवन की ख़ुशियों के रंग जो सब महसूस करते है ,देख सकते हैं उसके वास्तविक हक़दार हमारे व्यक्तित्व निर्माता व उनका परिश्रम है । सुंदर बगिया की ख़ूबसूरती में जिस प्रकार माली की समर्पण भाव से की गई मेहनत है ।प्रकृति की सुंदरता बागबां के परिश्रम से द्विगुणित हो जाती है; ठीक इसी तरह हमारी ज़िंदगी को दिशानिर्देश देने वाले बुज़ुर्गों व गुरु-वृंद की अहमियत भी समझनी चाहिए। मेरा लेखन के क्षेत्र में अनुभव नगण्य ही समझिए अत: त्रुटियों के सुधार हेतु आपके मार्गदर्शन की आशा करती हूँ। पुनः हार्दिक धन्यवाद ।
प्रेरणा शर्मा ,
   228  प्रतापनगर, खातीपुरा रोड
   वैशालीनगर ,जयपुर-302021

12 comments:

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

अत्यन्त भावपूर्ण चोका!आपकी दोनों रचनाएँ पूरी तरह आपके मन के भावों को प्रदर्शित कर रही हैं। हार्दिक बधाई आपको!
बुज़ुर्गों की ऐसी अवहेलना देखकर मन बहुत दुखी होता है...आज की पीढ़ी को समय रहते चेत जाना चाहिए वरना बुढ़ापा तो हरेक के जीवन में आना है...

~सादर
अनिता ललित

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

अत्यन्त भावपूर्ण चोका!आपकी दोनों रचनाएँ पूरी तरह आपके मन के भावों को प्रदर्शित कर रही हैं। हार्दिक बधाई आपको!
बुज़ुर्गों की ऐसी अवहेलना देखकर मन बहुत दुखी होता है...आज की पीढ़ी को समय रहते चेत जाना चाहिए वरना बुढ़ापा तो हरेक के जीवन में आना है...

~सादर
अनिता ललित

Prerana said...

अनिता जी हार्दिक धन्यवाद !
आपने भावों को गहराई से समझा , अच्छा लगा। वरना आज की व्यस्त ज़िंदगी में समय
देना और समझना बडीबात है।आभार!!!

ज्योति-कलश said...

परिवार में बुजुर्गों के प्रति बढ़ते जा रहे उपेक्षा भाव और उससे उपजी व्यथा को व्यक्त करती बहुत सुन्दर चोका रचनाएँ !
हार्दिक बधाई प्रेरणा शर्मा जी !!

Krishna said...

बहुत भावपूर्ण रचनाएँ । आज के परिवारों की वास्तविकता का सुंदर चित्रण । हार्दिक बधाई प्रेरणा शर्मा जी।

Prerana said...

ज्योति जी व कृष्णा जी द्वारा की गई सराहना मेरे लिए
उत्साहवर्धक है।मेरा ह्रदय से धन्यवाद स्वीकारें।

Savita Aggarwal said...

प्रेरणा जी इतने सुन्दर शब्दों में आपने अपने भावों को चोका में पिरोकर प्रस्तुत किये हैं बुज़ुर्गों के लिए समयअभाव की सत्यता को दर्शाती रचनाएं हैं आपको हार्दिक बधाई ।

Prerana said...

ह्रदय के अन्त:स्थल से आभार व्यक्त करती हूँ सविता जी!

jyotsana pardeep said...

सुंदर चित्रण!! आपकी दोनों रचनाएँ अत्यन्त भावपूर्ण!! हार्दिक बधाई प्रेरणा शर्मा जी !!

Manju Gupta said...

सुंदरभावपूर्ण प्रस्तुति .
बधाई .

Kashmiri Lal said...

बढिया पेशकश

प्रियंका गुप्ता said...

आपके दोनों चोका बहुत भावपूर्ण हैं | सच ही है, हमारे बुजुर्ग कई बार जाने-अनजाने हमसे उपेक्षित सा महसूस करते हैं | आपने इस विषय का अपने चोका में बहुत अच्छा निर्वाह किया है | मेरी हार्दिक बधाई...|