Friday, June 3, 2016

709



Click on the arrow to listen कहकशां 

कहकशाँ
डॉ हरदीप कौर सन्धु 


 सरघी वेला सी। शफ़ाफ़ नीले अंबर दी हिक्क 'ते सरकदे सुरमई ते संतरी रंग दी भाअ मारदे बदल दूर -दुमेल 'ते चढ़दी टिक्की दी निशानदेही कर रहे जाप रहे सन। कुज पलां बाद बूंदाबांदी होण लग्गी। निक्कीआँ बूँदां दे आर -पार लंघदीआँ धुप किरणां सत्त रंग बण के खिण्डण लग्गीआँ। भांत -सुभाँते खुशबूदार फुल्लां तो हो के आई पौण मिठ्ठी -मिठ्ठी लग्ग रही सी। पंछीआँ ने रल के आपणी मिठ्ठी आवाज़ दा सुर छेड़िया होइया सी। 
             मैं बाहर बरांडे 'च बैठी इस अलौकिक नज़ारे दा आनंद लै रही सी। चाँदी कणीयाँ बण वरदीयाँ बूँदां दी टिप -टिप ते दूर दुमेल वल्ल उडारी भरदी कोयल दी आवाज़ डा सुमेल मैनू उस दी कहकशां वल्ल लै तुरे। अगले ही पल अछोपले जिहे उस दे खिआलाँ तक्क आण पहुँचे मेरे अहिसासाँ नू जिओण जोगे साहाँ दी खैरात मिल गई। यह आपणी कहकशां 'चों बाहर निकल मेरे नाल गल्लां करन लग्गी," तैनू किवें पता लग्गा कि कोयल दी आवाज़ मैनू मोहित करदी है ?" हुण मैं जागदीआं अख्खां दे सपनिआँ रहीं ओह पल जी रही साँ जो मेरी असल ज़िन्दगी 'च कदे नहीं आए। 
   उस दी कहकशां दी हमसफ़र बणी मैं उस दे नाल हो तुरी। ओह मैनूं अंतरीव विच झात पवाऊँदी आपणे ओस आलमी विहडे 'च लै गई जिथे देश प्रेम नाल ओत -प्रोत गाथावाँ सुणदी ओह वड्डी होई है। बटवारे वेले ओह मसीं 13 कु वरिआँ दी होवेगी। उस दे आपे नूं पता वी ना लग्गा कि संवाद रचाऊण दी आत्मिक पिरत उस अंदर कदों पैदा हो गई। मस्तक 'च चानणा डा कफिला कावि रिशमाँ बण वहिण लग्गा। अखाँ 'च उनींदरीआँ राताँ दे सेव सुपने उस दे आपे अंदर खलबली मचाऊँदे रहे। ओह आपणी जादूमई छोह नाल मौलिक अंदाज़ 'च नित्त नवाँ सिरजदी रही ते हुण तक्क सिरज रही है। नवीआँ उचाणा नूं नतमस्तक होणा उस दी सच्ची इबादत है। 
  मेरा मन कणीआँ दी रिम -झिम 'च सरशार होइया उस दी अमुक गल्लाँ डा हुँगारा भरी जा रिहा सी। कदे -कदे मैनूं इंझ लगदा कि जिवें मैं आपनी पड़नानी नाल गल्लाँ कर रही होवाँ। ओह मेरे वास्ते असीसाँ दी आबशार ए ते मेरे सुपनिआँ दी जूह। हुण ओह किरमची कियारी 'चों फुल्ल बिखेर रही सी, " बन्द कमरिआँ 'च मेरा दम घुटदा है। रंग -बिरंगी कायनात दी मैं दीवानी हाँ। कुदरत नाल रह के बहुत कुज मिलिया। पर कोई वी ख़ुशी इकदम नहीं मिली, सालाँ बधी मेहनत ते उडीक तों बाद मिली है। पर अजे ताँ छोप विचों पूणी वी नहीं कती। जद तक ऊँगलीआँ 'च जान है लेखण जारी रहेगा।"
  कहिंदे ने कि अहसासाँ दी साँझ डा रिश्ता सभ तों सुच्चा रिश्ता हुँदा है जिहड़ा उमरां दे तराज़ू विच नहीं तुलदा। सोच दे हाणीआँ 'च साह -जिन्द जिही नेडता हुंदी है ते साडी साँझ वी कुज एहो जिही ही है। चानण राहाँ 'ते तुरन दीयाँ तरकीबां दस्स ओह मैनू ऊँगल ला आपणे नाल तोरी रखदी है। कदे ओह किणमिण चानण 'च बहि के धुप्प नाल गल्लाँ करदी ए ते कदे उस दे हिस्से आई चुलबुली रात ने कोरी मिट्टी दे दीवे बाल ओक भर किरना नाल खुशबू डा सफ़र तहि कीता है।आपणे कलामई क्रिश्मियाँ नाल ओह मुहांदरा लिशकाऊँदी गई जद कदे इकल्ला सी समाँ। उस दे नवें मरहल्लियाँ दे दस्तावेज़ महिज़ लफ्ज़ नहीं बल्कि उस दे सफ़र दे छाले ने। 
 हुण मठी मठी पौण ने बदलां डा घुँड चुक दित्ता सी। मैनूं लग्गा जिवें अज्ज ओह चिलकणी धुप्प वाली सरघी संग साडे विहडे  आ के फ़िज़ा 'च सूहे रंग बिखेरदी सुचीआँ नियमतां दी रहमत मेरी झोली पा रही होव। उस दी कहकशां डा रुख्ख अज्ज साडे विहडे उग्ग आया सी। 
कोयल कूक 
मींह भिज्जी सरघी 
चिलकी धुप्प। 

**********************************************************************************
सरघी -भोर ;   शफ़ाफ़- साफ़ ; कहकशां- आकाश गंगा ; अंतरीव- भीतर ; सरशार -सराबोर  ; अछोपले -हौले से ; मरहल्लियाँ- मंजिल ; पिरत - परंपरा 
********************************************************************
अब हिंदी में------------------------------------
भोर वेला था। सफ़्फ़ाक नीले अंबर पर सरकते सुरमई तथा नारंगी रंग के बादल  दूर क्षितिज पर चढ़ती लाल टिक्की की निशानदेही कर रहे जापते थे। कुछ पलों बाद बूँदें गिरने लगीं। छोटी छोटी बूँदों के आर -पार होतीं धूप किरणें सात रंग बनकर बिखरने लगीं थीं। भिन्न -भिन्न खुशबूदार फूलों से हो कर आई पुरवाई मीठी मीठी सी लग रही थी। पक्षियों ने मिलकर अपनी मीठी आवाज़ का सुर छेड़ा हुआ था। 
   मैं बाहर बरामदे में बैठी इस अलौकिक नज़ारे का आनंद ले रही थी। चाँदी की कनियाँ बनकर बरसती बूँदों की टिप -टिप तथा दूर क्षितिज की ओर उडारी भरती कोयल की आवाज़ मिलकर मुझे उसके कहकशां की ओर ले चले। अगले ही पल धीरे से ख्यालों तक आ पहुँचे मेरे अहसासों को जीने के लिए  साँसों की खैरात मिल गई। वह अपनी कहकशां से निकल  मुझसे बातें करने लगी, " तुझे कैसे पता चला कि कोयल की कूक मुझे अति प्रिय है ?" अब मैं जगती आँखों के सपनों द्वारा वो पल जिए जा रही थी ,जो मेरी असल ज़िंदगी में कभी नहीं आए। 
   उसकी कहकशां की हमसफ़र बनी मैं उसके साथ चलने लगी। वह मुझे अपने भीतर फैले अंतरिक्ष  में ले जाती हुई अपने उस सांसारिक आँगन में ले गई जहाँ देश प्रेम की वीर गाथाएँ तथा गीत सुनती हुई वह बड़ी हुई थी। बँटवारे के समय वह महज़ 13 वर्ष की रही होगी। उसको खुद  पता नहीं चला कि संवाद रचाने की आत्मीय संवेदना उस के भीतर कब पैदा हो गई। मस्तक में रौशनी का काफ़िला काव्य धारा बनकर बहने लगा। आँखों की अनिंद्रा रातों के सावे सपने उसके भीतर खलबली मचाते रहे। वह अपनी जादूई छुअन से मौलिक अंदाज़ में रोज़ नया सिरजती रही और आज तक सिरज रही है। नई ऊँचाई को नतमस्तक होना उसकी पाक इबादत है। 
  मेरा मन बारिश की रिम -झिम में सरशार सराबोर हुआ उसकी कभी न खत्म होने वाली बातों से लबरेज़ हुआ चला जा रहा था। कभी -कभी मुझे लगता कि मैं अपनी पड़नानी से बातें किए जा रही हूँ। वह मेरे लिए आशीष का झरना है  और मेरे सपनों की नींव। अब वह अपनी किरमची (एक किस्म का लाल रंग) क्यारी से फूल बिखेर रही थी, "बंद कमरों में मेरा दम घुटता है। रंग -बिरंगी कायनात की मैं दीवानी हूँ। कुदरत रहकर बहुत कुछ मिला। मगर कोई ख़ुशी एकाएक नहीं मिली ,बरसों की मेहनत और प्रतीक्षा के बाद मिली है। मगर अभी तो छोप में से पूनी भी नहीं काती। जब तक अँगुलियों में जान है ,लेखन जारी रहेगा।"
  कहते हैं कि अहसासों की साँझ का रिश्ता सबसे पाक रिश्ता होता है जिसको उम्र के तराज़ू में नहीं तोला  सकता।   हम ख्यालों  में साँसों संग जीवन  जैसी निकटता होती है और हमारी साँझ भी कुछ ऐसी ही है। रौशन- रास्तों पर चलने की तरकीबें बताकर वह मुझे अँगुली लगाकर अपने साथ लिये चल रही है। कभी वह किणमिण उजाले  में बैठकर धूप से गपशप करती है और कभी उसके हिस्से में आई चुलबुली रात ने कोरी मिट्टी  के दिए जलाकर ओक भर किरणें  से खुशबू का सफ़र तय किया है। अपने कलात्मक करिश्मों से वह मुहांदरा चमकाती गई जब कभी अकेला था समय। उसकी नई मंजिलों के दस्तावेज़ महज लफ्ज़ नहीं बल्कि उसके सफ़र छाले हैं। 
अब हल्की -हल्की सी हवा ने बादलों का घूँघट खोल दिया था। मुझे लगा जैसे आज वह चमकती धूप वाली भोर संग हमारे आँगन आकर फ़िज़ा में गहरे रंग बिखेरती पाक नियामतों की रहमत मेरी झोली डाल रही हो। उसकी कहकशां का वृक्ष आज हमारे आँगन में उग आया था। 

कोयल कूक 
भोर वर्षा से भीगी 
चमकी धूप। 





24 comments:

हरकीरत ' हीर' said...

बहुत सुंदर ... बहुत दिलकश आवाज़ ..अंदाज़ ....बधाई ...!!!

ਸੁਰਜੀਤ ਸਿੰਘ ਭੁੱਲਰ said...

मेरा आत्मगत विश्लेषण - हायबन कहकशां बारे ' कहकशां ' को जब मैं पहली बार पढ़ा था तो मेरे मन की आँखों को जैसे चमकती हुई धूप ने रुशनाउणा दिया हो। सौभाविक ही कुछ सवाल उत्पन्न हुए - लेखका इतने गहरे विचारों को कैसे साधारण शब्द युक्त के द्वारा प्रकृति का वर्णन करने में सफल हो गयी है ? यह कौन है , जिस के कहकशां की वह हमसफ़र बनी ?
क्योंकर उस को अपनी पड़नानी के रूप में गाल करती को महसूस किया है , जिस ने अपनी जीवन गाथा को सुचारु अंदाज़ में बयानों ? और और भी कई सवाल।

मैं अब तक लेखका की जितनी रचनायें पढ़ीं हैं , उन में वह कुदरत के खेडे को अपनी कलम के द्वारा चिंतन कराने में बड़ा सक्षम है।
शायद यह उस का प्राकृतिक दिब्ब - दृष्टि का कमाल है और साथ ही इस प्रती गहरा अभ्यास।
कहकशां के पहले पैरे में प्रकृति का चित्र बहुत भव्यता से चित्रण किया है : सुबह का समय का संतरी रंगे भाव मारते हुए बादलों में चढ़ती हुआ सूर्य की सूहा टिकिया की से बूँदें बांदी का शुरू होना और इन में परकाश का खिलार और धूप किरणों का सात रंगा जलौ दिखाना , फूलों में लाँघती पवन का मीठा लगना और पक्षियों ने सुर संगीत का छेड़ना एक अलौकिक और अचंभे भरे अभूतपूर्व दृश्य का कलम चित्र बयानी के साथ-साथ भाषा के ज्ञान का भी ध्यान रखा गया है जो उन पलों को ख़ास उजागर भी करती है , जो कोयल की आवाज़ का अभिन्नता करती करती कहकशां का हमसफ़र बनी। दोनों के अहसासों ने एक दूसरे ने आँखों के सपनों के द्वारा वह क्षण जीने का अवसर प्रदान किया , असल ज़िंदगी में कभी मिले भी नहीं था .

जब मैंने यह पहला बंध पढ़ा तो मुझे लगा जैसे कुदरत की हर शैअ की रूह को लेखका ने स्वगत रूप में अपना अंतरमुखी मन से एक सुर कर लिया हो और मैं भी इस अनुभव को लेने का यात्री बन गया था। .
कुछ क्षण रुकने के पश्चात , जब मैं और अगेरे बढ़ा तो मुझे इन दोनों के बीच में संवाद रचने का पता लगा। एक बताती चली गई - दूसरा सुनती रही।
कहकशां ने बात बताई - देश के विभाजन की - जब वह अभी 13 ही वर्ष की होगी।
उस समय तो वह बेख़बर थी कि क्या कभी कविता जैसे गहन भाव उस के भीतर खलबली मचाएँगे ? लेखका का मन मभी न खत्म होने वाली बातों का हुंगारा भरी जा रहा था।
एक सिरजती रही और दूसरी नतमसतक हो उस की सच्ची इबारत को इबादत के रूप में सुनती रही।
उस की समझदार बातें सुनकर लेखका को लगा जैसे वह अपनी पड़नानी से बातें कररही हो।
अहसासों का एकसुर होना बताता था कि न सिर्फ वह उस की अमुक्क बातों का केवल हुंगारा भरी जा रही थी, इसके साथ असीस की निर्झर बरसात में सर्शार भी हो रही थी।
दोनों की मन की बातों में बहुत कुछ कहा सुना गया और मैं मूक दर्शक के रूप में डा. हरदीप संधू के ज्ञान भरे विचारों की गहराई को नापता रहा।
वह कहती है कि ' अहसासों के सांझ का रिश्ता सब से सुच्चा रिश्ता होता है , जो उम्र के तराज़ू में नहीं तोला जा सकता । यह बिलकुल सचाई है , पर मेरी सोच इस ' उम्र के तराज़ू ' का पल्लड़िआं में पड़ गई। मैं सोचता रहा - सोचता रहा - - - और आख़िर इस का जवाब मुझे मिल गया था।
* अँत में लेखका ने भावां को शिखर पर ले जाते उनकी किताबों का ज़िक्र कलातमिकता से किया उसे बयाँ करना असंभव है जैसे ' 1 ) धूप से गपशप 2 ) चुलबुली रात ने 3 ) कोरी मिट्टी के दिए 4 ) ओक भर किरणे , 5 ) ख़ुशबू का सफ़र , 6 ) अकेला था समय और 7 ) सफ़र के छाले हैं।
'किसी व्यक्ति को बिन देखे उसे बिन मिले उस प्रती इतनी श्रद्धा दर्शाना , ऐसी इंसानी फ़ितरत किसी किसी को ही नसीब होती है।
मेरा विश्वास है , जो भी इस हायबन को दिल से पढ़ेगा , ' लेखका के पात्र का कहकशां का पेड़ ' उस के आँगन का भी शृंगार बनेगा।
- सुरजीत सिंह भुल्लर
USA
03 - 06 - 2016

Sudershan Ratnakar said...

हरदीपजी लाजवाब हाइबन। सुंदर प्रकृति वर्णन और अद्भुत भाषा-शैली। बधाई।

मेरा साहित्य said...

very nice bahan bahut dino baad suni madhur awaj
badhai
rachana

Savita Aggarwal said...

हरदीप जी,
आपने अपने हाईबन में प्रकृति का अत्यंत सुन्दर दर्शन कराया है | इस उत्तम रचना पर आपको हार्दिक बधाई |
सविता अग्रवाल "सवि"

Vibha Rashmi said...

हरदीप जी , आपकी गहरी आवाज़ में , कुदरत के सूक्ष्म मनोहारी चित्रण ने , यादों के झरोखे से हाइबन में चार चाँद लगा दिए । बहुत उम्दा । बधाई ।

Vibha Rashmi said...

हरदीप जी , आपकी गहरी आवाज़ में , कुदरत के सूक्ष्म मनोहारी चित्रण ने , यादों के झरोखे से हाइबन में चार चाँद लगा दिए । बहुत उम्दा । बधाई ।

ज्योति-कलश said...

बेहद ख़ूबसूरत लाजवाब प्रस्तुति बहन हरदीप जी ....इसका आनंद तो गूँगे का गुड़ हो गया है ...हार्दिक बधाई ..बहुत शुभ कामनाएँ आपको !

Pushpa Mehra said...


कल्पना की उड़ान भरता बीते पर सदैव जीते अतीत की खिड़की से झाँकते रिश्तों के अहसास से घिरा सुखद -मनोहारी धरती से लेकर अन्तरिक्ष तलक प्रकृति की सुखद ,मनोहारी-सुरम्य वादियों का आनन्द लेता यही नहीं अपितु अपनी शब्द मंजूषा उसे झंकृत कर पाठकों को भी उस अनिवर्चनीय सुखों की घाटियों घुमाता हाइबन बहुत ही सुंदर है |हरदीप बहन बधाई|

पुष्पा मेहरा

Kamla Ghataaura said...

प्राकृतिक दृश्यों की चित्रेरी डा.हरदीप संधु जी हमारे लिये प्राकृति के मोहक पलों को शब्दों द्वारा इस तरह चित्रित करती है कि पाठक रूपी दर्शक आवाक सा उन्हें देखता रह जाता है ।भोर के सुरमेई बादलों के पीछे से आता संतरी रंग का उजाला यानी सूर्योदय का मोहक चित्र ,फिर टिप टिप करती चाँदी सी बूंदों के साथ सुर मिलाती कोयल की मधुर ध्वनि उसे कहाँ से कहाँ ले जाती है । वे जागती आँखों के सपनों की दुनिया में खो जाती हैं ।
कहते हैं -'जहाँ न जाये रवि,वहाँ जाये कवि ।'
अपने सह - अहसासों जैसी उच्चकोटि की काव्य सृजक के आंगन यानी उसकी कहक्शां के भीतर ।वहाँ वह जो कुछ महसूस करती है उसे जागती आँखों का सपना बता कर उन क्षणों को और भी अमूल्य बना लेती है ,यह कह कर के जैसे वह अपनी पड़नानी के साथ चल रही होवे ,जो उसके लिये आशीसों का झरना है । हरदीप अपने इन अनमोल अहसासों को हम तक लिख कर पहुँचा कर ही विराम नहीं लेती बल्कि अपनी मधुर सुरीली आवाज में सुना कर यह हाइबन इस तरह पेश करके समां बांध लेती है कि सारी प्रकृति भी 'पिन ड्रोप साइलेंट' हो कर सुनने लगे ।त्रिवेणी के कैनवस पर उकेरा यह चित्र साहित्य जगत में एक ऐतिहासिक कृति कही जायेगी ।
हार्दिक बधाई इतनी सुन्दर भावभरी कृति के लिये प्यारी हरदीप जी ।ढेरों शुभ कामनायें ।



Kamla Ghataaura

Kamla Ghataaura said...

कहकशां
कवि मन को कोई विशेष कारण नही चाहिये ।अपने अहसासों कों उच्च कोटि के अहसासों के साथ कुछ पल सफर करने के लिये । प्रकृति के चितेरे को नभ आँगन का कोई भी दृश्य विमोहित कर सकता है ।उस आँगन से वह अपने लिये मन पसन्द साथ तलाश कर ही लेता है । हरदीप के इस बार के हाइबन ने अपने अहसासों का साथी ऐसा तलाशा जिसने अपने जीवनके हर तरह के अनुभवों को काव्य में उतारा । हमें अनेक पुस्तकें दी ।उसके अनुभवों की आकाश गंगा में सरावोर होने के लिये । हम उन की रचनायों से मिल कर धन्य हो गये ।हमारा सौभाग्य है कि हम उन के युग में हैं । और आज हरदीप के साथ इस हाइबन में हम भी उसी की तरह -कोयल कूक /मींह भिजी सरगी /चिलकी धुप्प । का आनंद मान रहें हैं ।
खूबसूरत लिखत ।आनंद दायक । हार्दिक बधाई ।
Kamla Ghataaura

Dr Purnima Rai said...

अतीत की कहकशां में देश प्रेम, देश विभाजन ,देश भक्ति के साथ-साथ लेखकीय कुशलता,आत्मीयता,एवं वर्तमान प्राकृतिक नैसर्गिक सौंदर्य का संसर्ग दिखाना बेजोड़ काव्य कला का सशक्त प्रमाण है।सुंदर उद्दीपन भावों एवं सरस भावों ने हाइबन कृति के सुंदरता बढ़ा दी है।पंजाबी ,हिंदी भाषा एवं गायन का सुमेल हरदीप कौर जी के प्रभावशाली व्यक्तित्व की पहचान है।...शुभकामनाएं.....

मनीषा की रचनाएं said...

बहुत ही सुन्दर हायबन।सुनकर फिर पढ़कर दोहरा मज़ा लिया।हरदीपजी बहुत सारी बधाई।कांबोज जी आपको मैं धन्यवाद देती हूँ कि आपने मुझे ये मेल पोस्ट की।मनीषा सक्सेना।

Krishna said...

बेजोड़ रस भीना हाइबन... दिलकश आवाज़... बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति। हरदीप जी हार्दिक बधाई।

सीमा स्‍मृति said...

हरदीप जी मैं तो आप के हाइबन का इंतजार करती हूँ हमेशा की तरह .....बहुत ही खूबसूरत प्रस्‍तुति ।हार्दिक बधाई ।

Kashmiri Lal said...

कुदरत का चित्रन

jyotsana pardeep said...

बेहद प्यारा ! एक अनोखे आनंद के संसार में ले जाने वाला हाइबन मीठी आवाज़ , भाषा शैली और खूबसूरत भावों से भरा। ..आप बहुत प्यारे हाइबन लिखती हैं इसी तरह लिखती रहें। ...आपकी लेखनी को नमन है ! हरदीप जी हार्दिक बधाई।

Dr. Hardeep Sandhu said...

त्रिवेणी के सभी पाठकों का मैं तहे दिल से शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ अपना कीमती समय कहकशां में बिताने के लिए। सभी ने अपने -अपने अंदाज़ में कहकशां का आनंद लिया। सभी ने प्रकृति की सुंदरता को चाहा और कुदरत के सूक्ष्म मनोहारी चित्रण को अपनी आँखों में उतारते हुए इस में डुबकी भी लगाई। मेरी आवाज़ भी सबको पसंद आई।

कमला जी कहना है कि इस आवाज़ ने ऐसा समय बाँधा कि सारी प्रकृति भी 'पिन ड्रोप साइलेंट' हो कर इसको सुनने लगी। इस में एक नन्हा शरारती बच्चा भी शामिल था जिसे भाषा तथा शब्दों की कोई समझ नहीं मगर फिर भी वह इसे मस्त हो कर सुन रहा था।

अब मैं अपने पाठकों का ध्यान इस हाइबन की सबसे अधिक प्रिय बात की ओर लेकर जाना चाहती हूँ। आदरणीय भुलर जी तथा कमला जी ने उस बात की तरफ़ इशारा भी किया है और उस बात को गहराई से सुंदर उद्दीपन भावों में प्रस्तुति भी किया है।

कौन है इस कहकशां का माली ? ये कहकशां आखिर है किसी की ? कौन है ये जिसे कोयल की कूक अति प्रिय है ? कौन है ये कुदरत की दीवानी जो कहती है कि जब तक उँगलियों में जान है लिखती रहूँगी। कौन है जिसे हमें अनेक पुस्तकें दी अपनी कहकशां में सरावोर होने के लिए -

1 ) धूप से गपशप 2 ) चुलबुली रात ने 3 ) कोरी मिट्टी के दिए 4 ) ओक भर किरणे 5 ) ख़ुशबू का सफ़र , 6 ) अकेला था समय और 7 ) सफ़र के छाले हैं

मैंने तो बता दिया अब बारी आपकी !

हरदीप

Manju Gupta said...

गागर में सागर भर दिया , लाजवाब प्रकृति चित्रण .

बधाई

Pushpa Mehra said...

कहकशाँ - कल्पना की सीमा ? पुष्पा मेहरा दि. ८. ६.१६

जिस सौर मंडल में अन्तरिक्ष तलक फैला एक ऐसा विस्तार हो जिस पर यह धरती , प्रकृति का विशाल आँगन, शीश उठाये हिममंडित गिरिशिखर, कलकल करते पर्वतों के चरण पखारते झरने , फूलों से भरी लहकती सुगन्धभरी कोयल के मीठे स्वरों से गूँजती मनोरम वादियाँ हों और हो सहृदय कविमन में जागी अनुभूतियों की वह दुलहन जो भावों की डोली चढ़ने को बेताब हो उठी हो, तभी एक ऐसा खूबसूरत पल भी आये कि धरती से अन्तरिक्ष तलक प्रकृति की गोद में आगे खिसकती, चित्र शिल्पी मन की अनेक आकाशगंगाओं में विचरती वधु कल्पना की मणियों से श्रृंगारित जब अपनी सखी या काल की पर्तों में सोई कोमल हृदय प्यारी पड़नानी से मात्र अहसासों में मिले तो वह क्षण ही इतना मधुर और उतावला हो उठता है कि सपनों की दुनिया किसी से साक्षात्कार करने का इन्तजार नहीं कर पाती या यूँ कहें कि भावनाओं की मदिरा में झूमती तन्मयमना सहज, सरल- तरल भावों से भरी वधू जागते नैनों की स्वप्निल तन्द्रा में अपने अनदेखे प्रिय से मिल लेती है | आयु का बंधन उसे कभी भी बाँध नहीं पाता, प्रकृति चितेरी की बंधनमुक्त लेखनी अनेक पत्रपुष्प भाव नदी में विसर्जित करती चली जाती है, कोई कुशल तैराक ही उस नदी में डुबकी लगा उसके भावों का आनन्द ले सकता है |यही कारणहै कि बहन हरदीप जी अपने हाइबन के माध्यम से जितना मन:आकाश की ऊँचाइयों में घूमती हैं उतना ही धरती पर आ देशविभाजन,देशप्रेम अदि के किस्से सुनने के लिए अपना प्यारा अनुभवी माध्यम भी ढूँढ लेती हैं बशर्ते वह कोई भी पात्र उस युग का साक्षी भी रहा हो, कामना है कि इस सहृदय चितेरी की लेखनी अनवरत चलती रहे और अपनी भाव धाराओं से पाठकों को आवाक करती रहें|अंत में इतना ही कहना है -
१, भाव परिंदे
रोके नहीं रुकते
ढूँढें रोशनी |

२ देख प्रकृति
रूप-लावण्य भरी
रीझे लेखनी |


पुष्पा मेहरा

Dr. Hardeep Sandhu said...

आदरणीया पुष्पा जी ,
क्या कहूँ ? आपने जो सब कुछ कह दिया। आपने कहकशाँ को और भी रौचक बना दिया। मेरे भाव सागर में आप ने डुबकी लगाई , दिल से पढ़ा तथा मन के चित्र को सुंदर शब्द माला में पिरोकर और भी सुंदर बना दिया। अनुभूतियों की दुलहन, भावों की डोली, वधु कल्पना की मणियाँ भावनाओं की मदिरा जैसे अलंकारों का प्रयोग कर आपने मेरी लेखनी को उत्तम बना दिया। पाठक वर्ग में पढ़ने की दिलचस्पी और बढ़ा दी। मेरे पास आज शब्द नहीं हैं आपको धन्यवाद कहने के लिए। ऐसे ही विचारों की साँझ बनाए रखें।
हरदीप

Shashi Padha said...

मन मोह लिया आपकी अभिव्यक्ति और मधुर आवाज़ ने | बहुत सुंदर प्रस्तुति | बधाई स्वीकारें |

शशि पाधा

पुष्पा मेहरा said...

मेरे अनगढ़ भाव आपने सराहे , आपको बहुत -बहुत धन्यवाद | कविमन को उड़ने के लिए तो सपनों की दुनियाँ में कल्पना के पंख बिन माँगे ही मिल जाते हैं जिसका पूरा अधिकार आपको जन्म से ही मिला हुआ है , शेष तो शब्दातीत है , आपको पुन:धन्यवाद |

पुष्पा मेहरा

प्रियंका गुप्ता said...

आपका हाइबन तो अहसासों का एक ऐसा झरना है जिसमे बस भीगते ही जाने का दिल करता है...| आपकी कलम शब्दों को छूती है और पढने वाले के आसपास जैसे एक जादुई दुनिया बन जाती है...| बस एक शब्द ज़ुबान पर आता है...लाजवाब...!
बहुत बधाई...और देरी से इस खूबसूरत रचना तक आ पाने के लिए माफ़ी...|