Friday, June 24, 2016

714

स्नेह-सिंचन

कहकशाँ हाइबन आदरणीया सुधा गुप्ता को उनके 82 वें जन्म दिन पर त्रिवेणी परिवार की तरफ़ से एक छोटा सा उपहार था ,जो समय के अभाव से कुछ दिनों की देरी से उनको भेंट किया गया। 
18मई, 1934 में जन्म, 83 वें वर्ष में पदार्पण कर चुकी डॉ सुधा गुप्ता जी ने 12 वर्ष की अवस्था से काव्य -रचना शुरू कर दी थी । अब तक आप ने बालगीत,कविता संग्रह, शोध , हाइकु ,ताँका, चोका  आदि  विभिन्न विधाओं में लिखा है और कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । हाइकु की विधा में जब गुणात्मक रचना -संसार की बात आएगी तो शीर्ष पर आपका ही नाम आएगा ।इस विधा में समर्पण का जुनून ही कहिए कि  ‘अकेला था समय’ ग्रन्थ आपके हस्तलेख में होने के साथ-साथ आपके द्वारा बनाए गए चित्रों से सुसज्जित है । आपको  ‘प्राइड ऑफ़ मेरठ’ का सम्मान भी मिल चुका है । 

कभी वह किणमिण उजाले  में बैठकर धूप से गपशप करती है और कभी उसके हिस्से में आई चुलबुली रात ने कोरी मिट्टी  के दिए जलाकर ओक भर किरणें  से खुशबू का सफ़र तय किया है। अपने कलात्मक करिश्मों से वह मुहांदरा चमकाती गई जब कभी अकेला था समय। उसकी नई मंजिलों के दस्तावेज़ महज लफ्ज़ नहीं बल्कि उसके सफ़र छाले हैं 
अपनी शारीरिक अस्वस्थता एवं अ्समर्थता के बावजूद अपनी प्रतिक्रिया इस पत्र द्वारा भेजी है जिसे पाकर हम धन्य हो गए। 

















त्रिवेणी परिवार आपके सुखद ,स्वस्थ जीवन की कामना करता है  ! आपका आशीर्वाद सदा सबको मिलता रहेगा ।


                                

Wednesday, June 22, 2016

713



ज्योत्स्ना प्रदीप 

श्रद्धा से भीगा 
तुलसी का दालान
वो  भोर  प्यारी ,
तितलियों की क्यारी ,
गौरैया-भरा 
प्यारा रौशनदान ।
माँ ने  बोले जो  
वे राम रक्षा स्तोत्र 
व्रत त्योहार  
पिता  के अग्निहोत्र 
सब धुँधले ! 
हींग छुँकी चूल्हे  की   
सोंधी सी  दाल
कहाँ गए वो स्वाद
दीदी का स्नेह   
भाइयों के वे नेह    
रंग- रंगोली 
मौसीजी  का आँगन 
वो चाची  भोली  !
रँभाती श्यामा  गाय 
दादाजी के  वे 
आयुर्वैदिक- उपाय  
नीम- निम्बोली  
कट्टी  व मेल 
रस्सी कूद के खेल 
सखी का साथ 
जुगनू  भरे हाथ 
कहाँ  बसे हैं ?
पलकों में छुपे  हैं  !
जब  भी गम 
दिल में जमते हैं 
मीठी धूप- से   
ये पल छा जाते हैं ।
ग़म पिघलाते  हैं !   
-0-

ज्योत्स्ना प्रदीप 
1
अनुलोम- विलोम करें 
अपनी  उलझन  का 
लो मिलकर होम करें
2
मन से कुछ योग करें 
 राग न द्वेष रहे 
 मन  को नीरोग करें ।
3
मन प्यारा, तन प्यारा 
योगासन में है 
सदियों से हर  तारा
4
ये श्वासों की  माया  
 मन भी उजला है 
कुंदन -सी हो काया
5
ये योग निराले हैं 
रस छलकाते  ज्यों 
ये मधु  के प्याले हैं
6
शिव की ये लीला है
मन का करुणा से 
हर कोना गीला है
7
ये श्वासों की क्रीड़ा 
हरती  तन  - मन की 
जीवन की हर पीड़ा
-0-
 

Monday, June 20, 2016

712




शशि पाधा
 1
जब चुभती घाम हुई
अम्बर डोल गया
तारों की छाँव हुई ।
 2
द्वारे पर आहट है
साँकल खुलती ना  
कैसी घबराहट है ।
3
कुछ मन था भरमाया
रात अकेली थी
लो, चाँद चला आया ।
 4
मौसम भी भीग गया  
धरती ओस -जड़ी
अम्बर भी रीझ गया  ।
 5
मत समझो छोटी -सी
प्रीत सहेजी है
सीपी में मोती -सी ।
 6
चाँदी में जड़नी है
प्रीत नगीने -सी
बिंदी में मढ़नी है ।
 7
कोई हेरा-फेरी ना
बिंदी माथे की
बस तेरी, मेरी ना ।
8
जग ने यह जान लिया
चन्दन -खुशबू का
नाता पहचान लिया ।
9
मन आज कबीरा सा
प्रेम चखा जबसे
बाजे मंजीरा सा ।
 -0-