Tuesday, May 31, 2016

708

Open diary with pen Royalty Free Stock Images डायरी का पन्ना

कमला घटाऔरा 

डायरी लिखना मेरा न शौक है न दिनचर्या ।लेकिन आज यह शुरूआत जरूर हुई है, उसकी बदौलत क्योंकि मेरी उससे कई दिनों से बात ही नहीं हो पाई थी ।बात न कर पाने का कोई विशेष कारण भी नहीं था । मुझे जब बात करने के लिये अगले दिन का इन्तजार भारी लगने लगा तो मैंने उसे सपने में ही बुला लिया,बिना फोन किये , बिना पाती लिखे ।अपना दु:ख सुख उससे सांझा जो करना था । न जाने घर गृहस्थी की  कितनी बातें उसे बताईं , कुछ उसकी सुनी । 

उस से कहे बिना मुझे कल ही नहीं पड़ती । सुबह उठी तो मेरा मन प्रफुल्लित होकर झूम उठा । तन अंगड़ाई लेकर ताजगी से भर गया ।जैसे  ताकत की बैटरी रीचार्ज हो गई हो। जैसे ग्रीष्मकालीन शीतल सुखद हवा द्वार खोलते ही मन को आह्लादित कर गई हो । मेरी तरह वृक्ष भी सुबह की ताजा हवा का स्पर्श पाकर झूम उठें थे और पत्ता पत्ता सुहानी भोर की हवा का शुक्रिया कर रहा लगा। वैसे ही उस से बात करके मेरे अन्दर बहुत सारी ताज़गी और ताकत भर गई ।और...

 मैं उस का शुक्रिया करने के लिये आज अपनी डायरी का पन्ना उसके नाम लिख रही हूँ । मेरी रूह ने उसकी रूह से एक अटूट संबंध बना लिया है । कभी कभी मैं सोचती हूँ मैंने उसे कहाँ से ढूँढ लिया ? या उसके अन्दर की किस चुम्बकी शक्ति ने मुझे अपनी ओर खींच लिया । यह प्रभु की ही महत्त कृपा हुई है मुझ पर जो  मुझे उससे मिला दिया । भले ही नेट पत्रिका द्वारा ही मैं उससे मिल पाई  हूँ  ।

अन्तर में बहुत कुछ वक्त की गर्द तले दबा पड़ा था ।जब से उसका इस जीवन से संबध जुड़ा है , कुछ न कुछ बाहर आने लगा है ।उसकी अपनत्व भरी बातों ने मुझे इतना मोहित किया, इतना अपना बना लिया कि मैं उस पर सिर्फ अपना एकमात्र अधिकार समझने लगी हूँ । कोई दूसरा उस के प्यार पर अपना हक जताने की बात करता है तो मैं ईर्षा से जल उठती हूँ । अपने को समझाने की चेष्टा भी करती हूँ  कि चाँद अपनी शीतल चाँदनी क्या किसी एक के लिये बिखेरता है ? सूरज क्या किसी एक घर में उजाला करने के लिये उदय होता है ? सुरभित पवन क्या किसी एक के लिये सुगंध फैलाने आती है ? नहीं न। फिर तू क्यों उसे सिर्फ अपने ताईं रखना चाहती है ?  तू यह तो देख कितने दिलों को अपने प्यार के सरोवर में डुबकी लगाने का आनंद दे रही है वह तेरी परमप्रिय ,तेरी मार्ग दर्शक । क्या - क्या नहीं है वह तेरी ?  हाँ मानती हूँ , उसी की बदौलत तो मैं यह पंक्तियाँ लिख पाई हूँ ।नहीं तो कैसे कह पाती  -


भरा था तम
रौशन हुआ मन
पाया जो उसे ।



Saturday, May 28, 2016

707

हरकीरत ‘हीर’
1
नैनों से नीर बहे
तुझ बिन ये साजन
अखियाँ हैं पीर सहें
2
तुम लौट पिया आना
रूठ कभी मुझको
यूँ छोड़ नहीं जाना
3
तू ही मेरा अपना
और नहीं दूजा
इन   अँखियों का सपना
4
निंदिया भी रूठ गई
जब से तुम रूठे
पायल भी टूट गई
5
सूनी सूनी रातें
पल -पल याद करूँ
प्यारी- प्यारी बातें
6
अँखियाँ भर भर आएँ
पल- पल झरते ये
अँसुअन बिरहा गाएँ ।
7
छत पर कागा बोले
आजा अब माही
मनवा मोरा डोले
8
बन इक दूजे के हम
संग सदा रहके
बाँटेंगे अपने ग़म  ।

-0-

Thursday, May 26, 2016

706

1-कृष्णा वर्मा
1
सूरज जब सर चढ़ता
मौसम का तेवर
दहशतगर्दी करता।
2
ऐंठी बैठी गरमी
हठ ना छोड़ रही
कैसी यह बेशरमी।
3
बरसी गरमी खुलके
रोगी हुई हवा
फूलों के मुख झुलसे।
4
भानु थका घर जाए
लहरा तम उतरे
शीतलता छा जाए।
-0-
2-डॉ सरस्वती माथुर
1
आतुर होके
यादें उड़ती गईं
जाल को  बिछाकर
मन सिंधु में
नाव बन तैरती
लग गई किनारे।
2
पपीहा बोला
अमराइयों में तो
मेरे आस पास में
मन ने देखा
पुरवा में उड़ती
तुम्हारी ख़ुशबू थी ।
-0-

Sunday, May 22, 2016

705

सूरज नासपिटा 
डॉ जेन्नी शबनम 

सूरज पीला 
पूरब से निकला 
पूरे रौब से 
गगन पे जा बैठा
गोल घूमता 
सूरज नासपिटा
आग बबूला 
क्रोधित हो घूरता,  
लावा उगला
पेड़-पौधे जलाए 
पशु -इंसान 
सब छटपटाए  
हवा दहकी 
धरती भी सुलगी   
नदी बहकी  
कारे बदरा ने ज्यों 
ली अँगड़ाई 
सावन घटा छाई 
सूरज चौंका 
''मुझसे बड़ा कौन?
मुझे जो ढका'',
फिर बदरा हँसा  
हँस के बोला -
''सुनो, सावन आया 
मैं नहीं बड़ा
प्रकृति का नियम 
तुम जलोगे 
जो आग उगलोगे 
तुम्हें बुझाने 
मुझे आना ही होगा'',
सूरज शांत 
मेघ से हुआ गीला 
लाल सूरज 
धीमे-धीमे सरका 
पश्चिम चला 
धरती में समाया 
गहरी नींद सोया !

-0-

Thursday, May 19, 2016

704

                            डोर

सीमा स्‍मृति 

हम  इस हाऊसिंग  सोसाइटी नये  नये  आये थे । गेट  मैन  को बोला  कि वह कोई कामवाली बाई  भेज दे।  गेट मैन ने इक दुबली पतली चालिस पैंतालिस साल की एक औरत  को भेज दिया। मन में प्रश्‍नों की सुईयाँ टिक –टिक करने  लगी । पता नहीं कैसी होगी .......? देखने  में साफ सुथरी तो लग रही है। ऊफ!! बातें बहुत करती है……..देखो काम कैसा करती है ? एक बार मेरी सहेली कह रही थी कि मेरे प्रश्‍नों से तो राव  सिक्रेट एजेंसी वालों  को भी अपनी कार्यशैली की चेक लिस्‍ट बना लेनी चाहिए  । नजर रखनी पडेगी.......शक्‍ल से कुछ ज्‍यादा स्‍पष्‍टता नहीं है .........कहीं  चोर ही ना हो.......................????
 यशोदा यही नाम है  हमारी कामवाली का, उसे हमारे घर में काम करते करते छह महीने हो गये। हमारी वकिंग लेडीज की भाषा में कहूँ तो मुझे लगा कि वो धीरे-धीरे वो सैट सी होने लगी। अब उसे और उसे अधिक  सेट करने की खातिर,मैं अपनी  क्रिएटिव सोच के घोड़े दौड़ाने लगी............मैं अक्‍सर घर का आलतु-फ़ालतू सामान उसे देने लगी ।एक दिन शाम को  मैंने उसे अपना एक पुराना पर्स जिसकी चेन खराब हो गई थी,उसे  दे दिया।  अगले दिन यशोदा  सुबह जल्‍दी आ गई । उसके हाथ में कल शाम को उसको दिया हुआ पर्स भी था।
क्‍या यशोदा आज इतनी  जल्दी आ गई?’’
हाँ, दीदी मुझे तो रात भर नींद नहीं आई।
क्‍या हुआ…………?
दीदी ,देखो ना जो आप ने ये जो पर्स दिया था। उसकी जेब फटी हुई थी और जब मैंने इस में हाथ डाला तो  इस में तीन सौ रुपये और ये दो दो के चार सिक्‍के निकले हैं।यशोदा ने रुपये  और सिक्‍के मेरी और बढ़ाते हुए कहा।
यशोदा को काम पर रखते समय मेरे मन में आये वो  सारे प्रश्‍न मुझे आज साँपों से डस रहे थे ।खुद के फेस रीडर होने के दावे के बदले लगा कि काश आना देख लिया होता।  उस दिन के बात जो यशो यशोदा के साथ जो डोर बंधी,आज सोलह वर्ष हो गए। उसकी बेटी,दोनों बेटे, बहू  आज तक हमारे घर में काम करते हैं । बस यही लगा आज कि ...............
विश्‍वास -डोर
मनके मोती  पिरो

मन को जोड़।

Monday, May 16, 2016

703

कृष्णा वर्मा
1
ढले जो दिन
दबे पाँव उतरे
साँवरी  सां
सलेटी यादों की
खोलती गाँठ
आ लिपटें मन से
बरखा में ज्यों
बिजली गगन से
मन के घन
यादें घनघनाएँ
पिघले पीड़ा
अखियाँ बरसाएँ
ज्यों-ज्यों शाम
ओढ़ती जाए रात
तर्रार होती
जाए स्मृति- बौछार
साँझ निगोड़ी
काहे करे हैरान
सुलगा जाए
फिर बुझी राख में
क्यों यादों वाली आँच।
2
छाने लगे जो
मन -आकाश पर
भावों के मेघ
झरने लगती हैं
चिंतन -बूँदें
जोतने लगती है
कलम नोक
कोरे काग़ज़ी खेत
अँकुरा जाते
संवेदना के बीज
उग आती हैं
शब्दों की फुलवारी
महक उठें
गीत ग़ज़ल छंद
मौलिक फ़नकारी।
3
साँझ के गाल
लगा जो रंग लाल
सूर्य घोड़ों की
हुई मध्यम चाल
उतरा सिंधु
रवि करने स्नान
मौन हो धूप
रोए है ज़ार-ज़ार
बालू में खिंडी
जो रंगों की डलिया
बंसी में फूँके
सुर कोई छलिया
खड़ा सुदूर
चन्द्रमा मुस्कुराए
रात के पल्लू
तारे टिमटिमाए
रात उचक
देखे भीगे नज़ारे
लहरों की पीठ पे
झूलें सितारे
आ बैठा चाँद
बरगद की डाल
हौले-हौले से
उतरी जो चाँदनी
भीगा ख़ुमार
रात की रानी जगी
महका प्यार
जुन्हाई में नहाई
सगरी कायनात।
-0-


Friday, May 13, 2016

702

जुगल बन्दी : माहिया 
अनिता मंडा : डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा 
1
कुछ ख़्वाब सुहाने से।
होकर अपने भी
लगते बेगाने से।1 अनिता मण्डा
 0
जो भी देखूँ सपने
सब तेरे ,साजन !
कब होते हैं अपने  । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
2
फूलों पर सोई थी
सूनी रातों में
क्यों शबनम रोई थी। अनिता मण्डा
0
बिस्तर है फूलों का
बिरहा की मारी 
चुभना है शूलों का  डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
3
बेटी का भाग लिखा
आँसू की मसि ले
क्यों दुख का राग लिखा। अनिता मण्डा
0
भर खूब उमंगों से
आप सजा लूँगी 
मैं दुनिया रंगों से डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
 4
घुँघरू सब टूट गए
छमछम की सरगम,
सुर हमसे छूट गए। अनिता मण्डा
0
घुँघरूँ से हैं बजते 
छेड़ो मन-वीणा
सुर साज सभी सजते डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
 5
सौ रोग यहाँ कम हैं
एक गरीबी में
दुनिया के सब ग़म हैं। अनिता मण्डा
 0
पूरे अरमान हुए
तेरा प्यार मिला
कितने धनवान हुए डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
6
पथरीली राह मिली।
औरत के हिस्से
क्यूँ हरदम आह मिली। अनिता मण्डा
 0
पत्थर से टकराना
नदिया की फ़ितरत 
बेरोक बहे जाना  । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
7
आग भरे दरिया से
पार उतरना है
नफरत की नदिया से। अनिता मण्डा
0
दरिया में आग भरी 
डूबी ,उतराई 
साधी जब प्रीत तरी । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
8
यूँ देख न दानों को
उड़ जा चिड़िया तू
पहचान सयानों को। अनिता मण्डा
0
गर चतुर शिकारी है
उड़ती चुग, चिड़िया 
अब ना बेचारी है । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
9
कुछ तारे टूट गए
नभ की थाली से
अनजाने छूट गए। अनिता मण्डा
 0
देखूँ टूटा तारा
एक दुआ माँगूँ
यूँ बिछड़े ना प्यारा । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

-0-

Thursday, May 12, 2016

701

कमला निखुर्पा
1
झरे फुहार
झमक झमा झम
सिहर उठी धरा ।
बिहँसे मेघ 
धूसरित वसन
दमक लहराया ।
2
नभ- मंडप
थिरकती चपला
बज उठे नगाड़े ।
मेघ साजिंदे
बूँदों की थाप संग
झूम के तरु गाएँ
-0-

700

1-सुदर्शन रत्नाकर
1
बिन मौसम सावन है
रिश्ता तेरा-मेरा
पूजा-सा पावन है  ।
2
बिन सावन घन बरसे
पुत्र विदे गया
माँ की आँखें तरसें  ।
3
मेघा ना बरसे हैं
सूख गई धरती
बिन पानी तरसे है ।
4
कुहू-कुहू वो बोले
चुपके से आकर
कानों में रस घोले ।
5
चाँदी-सी रातें हैं
आ मिल बैठ करें
दिल में जो बातें हैं।
-0-
5+7+7+5+7+7

कमला निखुर्पा
1
झरे फुहार
झमक झमा झम
सिहर उठी धरा ।
बिहँसे मेघ 
धूसरित वसन
दमक लहराया ।
2
नभ- मंडप
थिरकती चपला
बज उठे नगाड़े ।
मेघ साजिंदे
बूँदों की थाप संग
झूम के तरु गाएँ

-0-
5+7+7+5+7+7

2-कमला निखुर्पा
1
झरे फुहार
झमक झमा झम
सिहर उठी धरा ।
बिहँसे मेघ 
धूसरित वसन
दमक लहराया ।
2
नभ- मंडप
थिरकती चपला
बज उठे नगाड़े ।
मेघ साजिंदे
बूँदों की थाप संग
झूम के तरु गाएँ
-0-

2-कृष्णा वर्मा      
1
ढले जो दिन
दबे पाँव उतरे
साँवरी साँ
सलेटी यादों की
खोलती गाँठ
आ लिपटें मन से
बरखा में ज्यों
बिजली गगन से
मन के घन
यादें घनघनाएँ
पिघले पीड़ा
अखियाँ बरसाएँ
ज्यों-ज्यों शाम
ओढ़ती जाए रात
स्मृति- बौछार
प्रखर होती जाए
साँझ निगोड़ी
काहे करे हैरान
सुलगा जाए
फिर बुझी राख में
क्यों यादों वाली आँच।
2
छाने लगे जो
मन-आकाश पर
भावों के मेघ
झरने लगती हैं
चिंतन- बूँदें
जोतने लगती है
कलम नोक
कोरे काग़ज़ी खेत
अँकुरा जाते
संवेदना के बीज
उग आती हैं
शब्दों की फुलवारी
महक उठें
गीत ग़ज़ल छंद
मौलिक अनुबन्ध
3
साँझ के गाल
लगा जो रंग लाल
सूर्य –अश्वों की
हुई मध्यम चाल
उतरा रवि
सिंधु  करने स्नान
मौन हो धूप
रोए है ज़ार-ज़ार
बालू में खिंडी
जो रंगों की डलिया
बंसी में फूँके
सुर कोई छलिया
खड़ा सुदूर
चन्द्रमा मुस्कुराए
रात के पल्लू
तारे टिमटिमाए
रात उचक
देखे भीगे नज़ारे
लहरों की पीठ पे
झूलें सितारे
आ बैठा चाँद
बरगद की डाल
हौले-हौले से
उतरी जो चाँदनी
जागा ख़ुमार
रात की रानी जगी
महका प्यार
जुन्हाई में नहाई
सगरी कायनात।

-0-