Tuesday, April 5, 2016

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सदमा   
 कमला घटाऔरा 

उनके चेहरे की रौनक चुपी और उदासी के पर्दे में चली गयी थी। अब तक उनकी जीवन नदी सीधे स्पाट मैदानसे गुजर रही थी।  इर्द गिर्द को हरा भरा करती अपना स्नेह लुटती रही । शांत और धार्मिक प्रवृति का उनका स्वभाव एक नूर से घिरा रहता। उनके दर्शन मात्र से ही मन में ज्ञान प्रवेश करने लगता। वे सदा ही अपने बड़ों के आदर मान और उनकी आज्ञाकारिता में जुड़े रहे। उनकी साथिन उन्हें टोकती। किसी का भी आँख मूँद विश्वास करना सही नहीं है। वे तुम्हें बुद्धू बना कर तुम पर अपने काम का बोझ डाल देते हैं। उनका  एक ही उत्तर होता, क्या हुआ ? काम से जी नहीं चुराना चाहिए। नफा उन्हें हुआ या हमें परिवार तो एक ही है। उन्होंनें बहस करना सीखा ही नहीं था। आज्ञाकारी बालक बन कर ही सारा जीवन गुज़ारा। अपने भाई का लक्ष्मण बन कर । किसी की बुराई सुनना और करना उन्हें कभी स्वीकार्य नही था। उन्हें कभी नहीं लगा वे एक तरह की ग़ुलामी में जकड़े जी रहें हैं। एक दिन उनके अलग होने का भी समय आ गया। अपने उन बड़ों से अलग हो कर उन्हें लगा वे कितने अकेले पड़  गए हैं। रात दिन का साथ छूट गया। इस पीड़ा को वे मन ही मन पी गए। उन का हँसना बोलना भी कम होगया। रिटायरमेंट के बाद वैसे भी लगता है करने को कुछ बचा ही नहीं। उस पर अगर कोई ऐसा सदमा लग जाये जिससे उदासी के सागर को पार करना जटिल होता है तो जीना और मुहाल हो जाता है । ऐसा ही हुआ। उनके अपने अति प्रियजन के दुनिया से जाने का दुःख उन्हें और अधमरा सा कर गया। अब वे और भी अपने से भागने लगे। किसी से मिलने जुलने से बचने के लिए अपने को कमरे में बंध करके बैठे रहते। ऐसे सदमे से लोग अक्सर डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं । ऐसा सुना था। अब सामने दिख रहा है। कोई उनसे राजी ख़ुशी पूछता तो घर वाले ही उत्तर देते। उन्हें प्रश्नों की चोट से बचाने के लिए कहीं वे और जख्मी न हों । अपने मन को उन्होंने स्वयं ही एक अँधेरी गुफा में कैद कर लिया। मौत का गम किस इंसान को नहीं  सहना पड़ता यह जानते हुए भी  उनका मन उस कोमल फूल  का सा हो गया  जिसे कोई खाद पानी देना भूल गया हो। और वह असमय ही मुरझाने लगे। इस शाश्वत सत्य को जानते हुए भी कि इस दुखों के संसार  को न मर्जी से  छोड़ा जा सकता है न ही अपनी मर्जी से जिया जा सकता है। न जाने वाला कोई वापस ही आ सकता है। इसे ही तो आवागमन कहते हैं। ढांढस देने केलिए कितनी सहजता से हम यह बात कह देते हैं। लेकिन जिसने यह दर्द अपने सीने से लगा लिया वह कैसे उस दु:ख से बाहर आ सकता है? कहना कितना सरल है -

टूटा सितारा 
कब लौटा आकाश 
मृत्यु अटल। 

5 comments:

ज्योति-कलश said...

बहुत मार्मिक ..अटल सत्य को कहता मर्मस्पर्शी हाइबन !
बधाई आपको !

Kashmiri Lal said...

Good

haiku lok said...

नेक दिल इंसान की एक अनूठी तस्वीर। बहुत सुंदर ढंग से चित्रण किया है आपने। पढ़ते समय उनके जीवन का हर पन्ना खुलता गया और धीरे धीरे दर्द बढ़ता गया, ऑंखें नम होती गईं।
उफ़ ! ये दुनिया ऐसी न होती !
हरदीप

Kamla Ghataaura said...

हरदीप बहुत बहुत शुक्रिया आभार । मुझे अपने त्रिवेणी में स्थान दिया।ऐसा काल चलाना नहीं भुलाया जा सकता।

jyotsana pardeep said...


शाश्वत सत्य को जानते हुए भी अवसाद में घिर ही जाते हैं कमला जी और ये नेक दिल के साथ ही क्यों होता है? कितने दुःख की बात है ये.......... बेहद मार्मिक साथ ही कुछ सोचनें पर मजबूर करने वाला हाइबन ।
ज्योत्स्ना प्रदीप