Tuesday, March 29, 2016

694

अपूर्ण कामना
डॉ हरदीप सन्धु
भाद्रपद की सवेर थी। पक्षी अपनी सुरीली आवाज़ों में जश्न मना रहे लगते थे। मुँह -अँधेरा सा होने की वजह से मौसम में अभी ठंडक थी। मैंने चाय की अभी दो घूँट ही लिये थे  कि उसने द्वार पर दस्तक दी। मैं उसी का इंतज़ार कर रही थी। वह थी 17 वर्ष की, खुश मिज़ाज, छोटे से कद की चुलबुली -सी लड़की । कच्चे फूलों -सी हँसी बिखेरती वह भीतर चली आई। 
               उसके कॉलेज में आज बहु -सभ्याचार दिवस मनाया जा रहा था। विद्यार्थियों  ने अपनी -अपनी सभ्यता को दर्शाता कोई भी वस्त्र पहनना था। उसने साड़ी चुनी थी, जिसे पहनना किसी हुनर निपुणता की माँग करता है। मगर अभी वह इस हुनर से अनभिज्ञ थी और मुझसे सहयोग माँगा था। मैं भी अभी तक इस हुनर से अनजान ही थी। मैंने न कभी खुद साड़ी बाँधी, न किसी को बाँधते देखा और न ही अभी तक कभी सीखने की जरूरत महसूस की थी। मेरी अनभिज्ञता के बावजूद उसने मेरे पास आना ख़ुशी- ख़ुशी स्वीकार कर लिया था। 
   " आज उसको माँ बहुत याद आई होगी," उसकी माँ की अनुपस्थिति का यह दर्दीला अहसास मुझे भीतर तक झिंजोड गया। उसकी माँ को बिछड़े पूरे दो वर्ष बीत चुके हैं।मांवां ठंडीयाँ छावाँ -बिन  माँ  मोहताज  बनी वह जिंदगी को किसी गहरी पीड़ा के रूप में बतीत कर रही है। मगर इस पीड़ा को अपनी दूधिया हँसी में घोलकर वह सहज ही पी जाती है। 
           एक खास उत्तेजना आज उस पर हावी थी। परन्तु मैं एक अजीब से डर में असुरक्षित महसूस कर रही थी। सोच रही थी कि सीमित से समय में मेरी पहली कोशिश के असफल हो  जाने से कहीं उसका चाव फीका न पड़ जाए। वह तो आज किसी अज्ञात मंजिल की ओर बिन पंखों से उडान भरना चाह रही थी। माँ की खरीदी मोर पंखी रंग वाली चमकीली साड़ी  उसने मेरे आगे रख दी। मैं अपनी भीतरी  उल्लास के घेरे को तोड़ती हुई उसको साड़ी  बाँधने लगी। वह  खुशबु भरे स्वर में साड़ी के हर घेरे के साथ अपनी माँ की मीठी मोह भरी यादों  का सुख पा रही थी और मुझे भावुक किए जा रही थी। 
       उसके मुखड़े पर अब सिंदूरी  क्रीड़ा थी। उसका उल्लास चाँद की परछाईं जैसे मन के आँगन में बिखर रहा था। खूबसूरत रंगीन साड़ी पहने हुए वह मुझे अपनी माँ के आँचल का आनंद लेती लग रही थी। साड़ी के रेशे -रेशे से शायद वह अपनी माँ के हाथों की छुअन महसूस कर रही होगी। दुनिया की कोई भी वस्तु उसकी माँ  की कमी को तो पूरा  कर सकती है, मगर एक छोटी सी अपूरित ख्वाहिश को उसकी झोली में डालना मुझे सकून  दे गया।
 

हवा का झोंका 
पंखड़ियों ने छेड़ा
राग सुरीला।  
          डॉ हरदीप सन्धु



Wednesday, March 23, 2016

693

माहिया -  शशि पाधा
1
चुपचाप खड़ा माली
उपवन उजड़ा -सा
बिन फूलों के खाली
2
कुछ देर- सवेर हुई
मौसम बदलेंगे
पंछी की टेर हुई
3
धरती सब सहती है
विपदा-आपद में
बस मौन ही रहती है
4
वचनों का मान किया
काँपी धरती तो
पर्वत ने थाम लिया
5
सागर इक बात बात कहे-
बहती लहरों में
नदिया की पीर बहे
6
अम्बर के तारे भी
दो पल संग चले
दो साथ किनारे भी
7
बादल को गाने दो
गीत जुदाई के
कुछ देर सुनाने दो
8
अम्बर में बादल- सा
तुझको आँज लिया
अखियों में काजल सा
9
यह अब ना टूटेंगे
धागे बंधन के
थामे, ना छूटेंगे
10
साँसों में बाँध लिया
ढाई आखर का
गुर मंतर बांच लिया
11
अधरों पे नाम धरे
मनवा जोगी -सा
तेरा जप ध्यान करे
12
नदिया की लहरों में
प्रीत पनपती है
आठों ही पहरों में
13
कैसा संयोग हुआ
चाँद चकोरे- सा
अपना भी योग हुआ
14
कुछ अजब कहानी है
अधर हँसे हर पल
नयनों में पानी है

-0-

Friday, March 18, 2016

692


ताँका : डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
 1
उजला थान
उसमें से मुझको
मिला रुमाल
रखा मैंने निर्मल
जतन से सँभाल 
2
 उगा पड़ा है
आवाजों का जंगल
तन्हा खड़ी मैं
गा लेती संग में ,क्यों-
अनमनी बड़ी मैं ?
3
खूब लुभाते
गुनगुन करते
रस के लोभी
झूमती कलिकाएँ
खिल-खिल मुस्काएँ 
4
 चुरा ले गई
फूलों के दामन से
खुशबू हवा
समझी थी सहेली
क्यों बनी है पहेली ?
5
 रेतीले तट
सागर से बिछुड़ी
लहरें गुम
पत्थर ज़्यादा लाईं
सीपियाँ तो हैं कम 
6
 पीले फूलों में
अजब-गजब सा
खड़ा बिजूका
किसी को भी न भाए
मन में पछताए 
-0-
2-शशि पाधा
1
चुपचाप खड़ा माली
उपवन उजड़ा -सा
बिन फूलों के खाली
2
कुछ देर- सवेर हुई
मौसम बदलेंगे
पंछी की टेर हुई
3
धरती सब सहती है
विपदा-आपद में
मौन बनी रहती है
4
वचनों का मान किया
काँपी धरती तो
पर्वत ने थाम लिया
5
सागर इक बात बात कहे-
बहती लहरों में
नदिया की पीर बहे
6
अम्बर के तारे भी
दो पल संग चले
दो साथ किनारे भी
7
बादल को गाने दो
गीत जुदाई के
कुछ देर सुनाने दो
8
अम्बर में बादल- सा
तुझको आँज लिया
अखियों में काजल- सा
9
यह अब ना टूटेंगे
धागे बंधन के
थामे, ना छूटेंगे
10
साँसों में बाँध लिया
ढाई आखर का
गुर मंतर बांच लिया
11
अधरों पे नाम धरे
मनवा जोगी -सा
तेरा जप ध्यान करे
12
नदिया की लहरों में
प्रीत पनपती है
आठों ही पहरों में
13
कैसा संयोग हुआ
चाँद चकोरे- सा
अपना भी योग हुआ
14
कुछ अजब कहानी है
अधर हँसे हर पल
नयनों में पानी है
-0-

Friday, March 11, 2016

691


माहिया-जुगलबंदी

(क्रमांक में पहला माहिया ज्योत्स्ना प्रदीप  का है तो जुगलबन्दी में रचा दूसरा माहिया डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा का है। त्रिवेणी में किए जा रहे सर्जनात्मक और सकारात्मक प्रयोग के लिए हम दोनों सभी के आभारी हैं। -डॉ हरदीप सन्धु-रामेश्वर काम्बोज)

ज्योत्स्ना प्रदीप : डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

1

 उसकी पहचान नहीं

भेस बदलता है

राहें आसान नहीं । ज्योत्स्ना प्रदीप

0

मैं उसको जान गई

मन भरमाता है 

सब सच पहचान गई!- डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

 0

2

 माँ ने क्यों सिखलाया-

चुप रहना सीखो,

पर रास नहीं आया ।

 0

हर सीख यहाँ मानी 

जीवन पेंच हुआ

अटकी हूँ अनजानी।

3

देखो आई यामा

आँसू कब ठहरे

 किसने इनको थामा?

0

रजनी के तारे हैं 

कुछ तेरे नभ में 

कुछ पास हमारे हैं ।

4

 नाहक आँखें भरतीं

मिलती माधव से

कई मासों में धरती ।

0

मिलने की मजबूरी 

सह लेती , मुश्किल 

मन से मन की दूरी।

5

कोई  होरी -राग नहीं

दिल में सीलन है

कोई भी आग नहीं ।

0

हर वार करारा है 

ढूँढ कहीं दिल में

आबाद शरारा है ॥

6

ऐसी भी बात नहीं

प्रेम समर्पण है

कोई खैरात नहीं ।

0

भाती है सीख नहीं 

प्रेम फकत चाहा 

माँगी है भीख नहीं 

7

नाते वो पीहर के

जी लूँ कुछ दिन मै

 खुशियाँ ये जी भरके ।

0

दिन-रैन लुभाती हैं 

गलियाँ नैहर की 

हाँ,पास बुलाती है।

8

 हा ! माँ भी वृद्धा है

अब भी  आँखों में  

ममता है श्रद्धा है ।

0

दिन,सदियाँ ,युग बीते 

माँ की ममता से  

कोई  कैसे  जीते ।

9

 बेटी को प्यार किया

माँ ने लो फिर से

घावों को  खूब  सिया ।

0

मरहम -सा सहलाए

 उलझन बालों की

मैया जब सुलझाए॥

10

 नाता वो भाई का

अमवा से पूछो ऋण

वो  अमराई का।

0

भाता  है ,भाई है

 हर सुख में ,दुःख में

जैसे परछाई है ।

11

 भाभी की शैतानी

पल भर में छिटका

 वो आँखों का पानी ।

0

खट्टी -मीठी गोली 

छेड़ करे भाभी

 बनती कितनी भोली॥

12

 बहना भी प्यारी है

ग़म  को कम करती

खुद गम की मारी है।

0

प्यारी सी बहना है 

वो दिल का टुकड़ा 

सोने का गहना है

13

 मन इतना भोला था

 ढोए बोझ घने

उफ़ तक ना बोला था।

0

मन तो मतवाला है 

तेरे तीरों से 

कब डरने वाला है।

14

 अब मन पर भार नहीं 

मेरे खाते  में

अब दर्ज़ उधार नहीं।

0

चर्चा ये जारी है 

कर्ज यहाँ तुझपे

सुन मेरा भारी है ।

15

अहसास बड़ा प्यारा-

तेरा कोई है

बैरी फिर जग सारा । ज्योत्स्ना प्रदीप

0

अधरों पर आह नहीं 

तू मेरा है ,फिर

मुझको परवाह नहीं । डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
-0-