Sunday, February 7, 2016

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सोन किरनें
डॉ हरदीप सन्धु
ढलती हुई शाम को ऊँचे आसमान पर छाए सुरमई बादलों में से कभी -कभी सूर्य भी दिखाई पड़ जाता था। इस अलबेले से मौसम में हम चारों अपनी नौका तथा चप्पू लिये नदी के किनारे जा पहुँचे थे। शहर के बीचो -बीच बहती इस नदी के पानी में शरबती रंग घुले लगते थे। मस्त हुए परिंदे आज़ाद हवाओं में कुदरत की सराहना के गीत गाते लग रहे थे। सूर्य के प्याले से बहती लाली से चमकता पानी इस मनमोहनी कायनात को और भी रंगला बना रहा था।
लाइफ़ जैकेट पहनकर एक नौका में हम दोनों माँ -बेटा तथा दूसरी में वे दोनों बाप -बेटी बैठ गए। खुला -ताज़ा माहौल था। एक दूसरे की मन की अनकही बातों को समझने तथा रिश्तों की गरिमा को महसूस करने का समय। हमें खुद ही चप्पू चलाकर गहरे पानी में उतरना था। मेरे हिस्से नौका को केवल आगे धकेलना आया था और मेरा बेटा नौका को सही दिशा में रख रहा था। फाल्गुन की धूप जैसे खिला हुआ वह बड़ी ही सहजता से नौका को कंट्रोल में रखने के बारे में भी मुझे बताता जा रहा था। मैंने नज़र घुमाकर सामने देखा। दूसरी नौका हमसे काफ़ी दूर जा चली थी। मगर हमारे वाली नौका हमारी हँसी के भँवरजाल में उलझी एक ही जगह पर गोल -गोल घूमे जा रही थी।
कहते हैं कि कुदरत उनका साथ दे ही देती है ,जो हर हालत में अपने मकसद को पाने के लिए दृढ़ रहते हैं। अब हमारी नौका हमारे कंट्रोल में थी; मगर हँसी अभी भी बेकाबू। "चलें पापा तथा निकड़ी से आगे निकलें," उसकी आँखों में शरारत तथा बोलों में ताज़ी हँसी थी। पानी की लहरों को चप्पुओं की आवाज़ ताल दे रही थी। अगले कुछ ही पलों में हमारी नौका दूसरी नौका के साथ -साथ जा रही थी। खुशियों- भरे शरबती पलों ने आँखों में खुशनुमा रंग बिखेर दिए थे।
नदी के किनारे लगे वृक्षों के अक्स पानी की तरंगों के संग नाचते लगते थे। परिंदों की गूँजती संगीतमयी आवाज़ों ने हमारे भीतर फैले चिंता के अँधेरे को रौशनी से भर दिया था। मोह -भरी हँसी की अँगुली पकड़कर उन कुछ ही पलों में हमने ताउम्र हँसी अपने आँचल में समेट ली थी। जिसको याद करते हुए आज भी मेरी साँसे जीने जैसे अहसास से धड़कने लगती हैं।
छुपता सूर्य
पानी पर फिसलें
सोन किरनें।
- ० - 


16 comments:

anita manda said...

बहुत सुंदर प्रकृति चित्रण

Manju Gupta said...

हईगा मनोरम प्रकृति दृश्य का बारीकी और गहराई से ओतप्रोत चित्रण .
बधाई
हरदीप जी

Kamla Ghataaura said...

प्राकृतिक सजीव दृश्यों से भरा यह हाइबन केवल एका नौका यात्रा का चित्रण ही नही करता बल्कि हमें यह शिक्षा भी देता है कि इन्सान के हौंसले बुलन्द हों तो मंजिल पा ही लेता है ।दूसरा सन्देश यह देता है कि फाल्गुनी धूप सी उजली हँसी चिन्ता के अन्धेरे को पास फटकने नही देती ।बहुत सुन्दर हाइबन है हरदीप जी बधाई हो ।

Dr.Bhawna said...

Haiga bahut achha laga meri badhai..

Savita Aggarwal said...

हरदीप जी नदी में परिवार के साथ चप्पू चलाते हुए प्रकृति दर्शन करते हुए मन की प्रसन्नता पर सुन्दर हाइबन रचा है आनंद आ गया पूरा दृश्य आँखों के सामने घूम गया .

rbm said...


प्रयास और विवेक सफलता की सीढ़ी हैं,haiga और हाइबान दोनों ही चित्रण को सजीव बना रहे हैं,बहन संधु जी आपको बधाई |


पुष्पा मेहरा

Sudershan Ratnakar said...

हरदीपजी बहुत सुंदर हाइबन। बधाई

मेरा साहित्य said...

bahan kavita mayi prastuti hai ek ek pankti kavita hai kya khoob haiban likha hai
badhai
rachana

ज्योति-कलश said...

प्रकृति की सुन्दरता को साकार करता बहुत सुन्दर हाइबन ! हार्दिक बधाई !!

jyotsana pardeep said...

bahut hi pyara haiban ... prakrati ke manoram drishyon ko badi hee bareekee se ukertaa ....saath hi sakratmakta ki ore le jaata ...haardik badhai hardeep ji !

Amit Agarwal said...

बेहद सुन्दर हाईबन डॉ. संधु, शुभकामनाएं!

त्रिवेणी said...

सबसे पहले आप सभी साथियों का बहुत आभार हाइबन के बारे में अपने -अपने विचार प्रस्तुति करने के लिए। प्राकृतिक सजीव दृश्यों का चित्रण तो है इस हाइबन में क्योंकि वहाँ सब कुछ था ही इतना मन लुभाने वाला। उस दिन हम इतना हँसे कि लगा जैसे पूरी जिन्दगी की हँसी एक दिन में ही बटोर ली हो। मेरा बेटा इतना हँसमुख है कि वह किसी साधारण सी बात में भी हँसी के फुव्वारे छोड़ सकता है जिनमें भीगने से बचना नामुमकिन होता है। उस दिन हम दोनों एक ही नौका में बैठे थे। चप्पू चलाना तथा नौका को कंट्रोल में रखना जितना आसान दिखता है असल में उतना है नहीं। वह मुझे बाएँ चप्पू चलाने को कहता तो उसकी हँसी के हँसग़ुल्लों में मैं दाएँ चप्पू चला देती। अगर दाएँ कहता तो मैं बाएँ चला देती। वहाँ कोई पानी का तेज़ बहाव नहीं था जिसमें हमारी नौका उलझी हो। अगर आपने सही से हाइबन पढ़ा होगा तो मैंने लिखा है - "मगर हमारे वाली नौका हमारी हँसी के भँवरजाल में उलझी एक ही जगह पर गोल -गोल घूमे जा रही थी" .
चलिए आगे बात बढ़ाते हैं - हमारे कई पाठकों ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि हाइगा बहुत सुंदर है भावपूर्ण है। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि यहाँ हाइगा तो प्रकाशित किया ही नहीं था। केवल हाइबन ही था जिसमें एक तस्वीर लगा दी थी नौका वाली । हाइगा तो तब बनता जब तस्वीर के साथ उसको प्रस्तुति करता कोई हाइकु भी होता। हाइगा तथा हाइबन कभी एक साथ प्रकाशित नहीं किए जाते।

आपके प्यार तथा सहयोग के लिए एक बार फिर आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया।
हरदीप

Kashmiri Lal said...

यात्रा का अहसास

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

वाह! प्रकृति की मनोरम गोद में, माँ-बेटे के बीच बहता... हँसी का फ़ौव्वारा !--बहुत ही ख़ूबसूरत दृश्य आँखों के सामने साकार हो जाता है हरदीप जी ! सचमुच बहुत ही मज़ा आया होगा ! ऐसे अनमोल पल हमारे जीवन में सदा एक ताज़गी भर देते हैं।
इस मनमोहक प्रस्तुति के लिए आपको हार्दिक बधाई!!!

~सादर
अनिता ललित

Pushpa Mehra said...


नौका विहार के आनन्दमय क्षणों को दिए गये चित्र द्वारा जीवंत करता हाईबान बहुत ही सुंदर था,मैंने गलती से haiga लिख दिया था इस बात की ओर मेरा ध्यान पब्लिश पर क्लिक करने के बाद गया ,तीर तो हाथ से
छूट चुका था |आपने गलती का अहसास कराया आपका आभार |

पुष्पा मेहरा

प्रियंका गुप्ता said...

वाह...आपकी लेखनी तो जैसे चलचित्र की तरह पूरी घटना को आँखों के आगे सजीव कर देती है...| हाइबन के साथ ये चित्र बिलकुल सटीक लगा...| आपकी ज़िंदगी की नौका भी सदा हँसी-खुशी की लहरों पर चलती रहे...|
मेरी बहुत शुभकामनाएँ और बधाई...|