Monday, February 29, 2016

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[प्रयोग यदि भाव-अनुप्राणित हो तो उसका स्वागत होना चाहिए।हाइकु , ताँका और माहिया की जुगलबन्दी की शुरुआत हिन्दी हाइकु और त्रिवेणी पर कई बार हो चुकी है। इसका श्रेय डॉ भावना कुँअर और डॉ हरदीप कौर सन्धु को जाता है।बाद में डॉ ज्योत्स्ना शर्मा , शशि पाधा , रचना श्रीवास्तव आदि के नाम जुड़ते गए। अनिता ललित ने यहाँ दो तरह के भाव वाले अपने माहिया जुगलबन्दी के रूप में रचे हैं। माहिया तुकबन्दी या मात्रा –संयोजन मात्र नहीं है।  यह पढ़कर आप महसूस करेंगे।सतही तौर पर पढ़कर झटपट कुछ भी लिख देने के पक्ष में हम कभी नहीं रहे। हमारा मानना है जो दिल को छुए,वही रचना सार्थक होती है।अनिता मण्डा के सेदोका की लयात्मकता पर भी आप ध्यान देंगे।  सम्पादक द्वय]

1-अनिता ललित
1
मनभावन रातें थीं
चाँद सलोने- सी
चमकीली बातें थीं।

अब दूर सवेरे हैं
चाँद हुआ तनहा
गहरे तम घेरे हैं।
2
आँखों में सपने थे
दामन थामा था
तुम मेरे अपने थे।

अब आँखें हैं गीली
तुमने मुख मोड़ा
मन की चादर सीली
3
गीत मिलन के गाए
हर धड़कन महकी
तुम प्राणों में छाए

अब दिल भर-भर जाए
हाथ छुड़ा मुझसे
क्यों दूर निकल आए ?
4
क्या ख़ूब नज़ारा था
आँखों ने तेरी
भर नज़र पुकारा था।

अब चुप्पी के ताले
अपने बीच बहें
बस दर्द भरे नाले।
5
वो प्यार भरी बातें
जीवन की पूँजी
नग़मों की बारातें।

अब चुप्पी है छाई
साँसें भी उलझीं
माँगे सिर्फ़ रिहाई।
-0-
2- अनिता  मण्डा

नदी के तीर
साथ-साथ बहते
अजनबी रहते,
मन की पीर
किसे हम कहते
चुप रह सहते।
-0-

Sunday, February 28, 2016

688



शशि पाधा
1
वासंती रुत आई
पाहुन आयो ना
मन -बगिया मुरझाई।
2
कोयल से पूछ ज़रा
तेरे गीतों में
क्यों इतना दर्द भरा।
3
रंगों के मेले में
आँखें ढूँढ रही
चुपचाप अकेले में।
4
यह किसकी आहट है
द्वारे खोल खड़ी
मिलने की चाहत है।
5
अब कैसे पहचानूँ
बरसों देखा ना
अब आओ तो जानूँ।
6
पुरवा कुछ लाई है
पंखों से बाँधी
इक पाती आई है।
7
खुशबू सौगात हुई
धरती अम्बर में
फूलों की बात हुई।
8
नयनों में आँज लिये
प्रीत भरे आखर
गजरे में बाँध लिये।
9
शर्मीली गोरी है
नीले नयनों में
लज्जा की डोरी है।
10 
कँगना कुछ बोल गया 
साँसें मौन रहीं
तन मन कुछ डोल गया।
-0-

Friday, February 26, 2016

687



पुष्पा मेहरा
1
अनंगराज
छिप- छिप फेंकते
मादक प्रेम- बाण,
दहके मन
दहकता- सा लगे
सारा पलाश वन
2
हवा मलिनी
घूम –घूम ले आई
मधु सुगंध- पुष्प ,
तन्मय मन
उड़ी - उड़ी बाँट रही
पल्लू में भर –भर
3
आई तितली
मासों से थी बिछड़ी
मिलनोत्सुकता थी ,
रुक न सकी
फूलों के गले मिली
प्रेम -विभोर  मन
-0-

Tuesday, February 23, 2016

686



अनिता ललित

1

अनिता ललित
कल फूल यहाँ होंगे

अश्कों से सींचा

हम याद कहाँ होंगे !

2

 तुम बिन मर जाएँगे

साँसें भी अपनी 

अर्पित कर जाएँगे

3

पीड़ा दिल की भेदी  

जीते जी इसने

क्यों मौत हमें  दे दी ?

4

झूठे तेरे वादे

साथ निभाने के

बदले आज इरादे।

5

इक दर्द बसाया है

आँखों मैं मैंने

यूँ तुमको पाया है।

6

आँसू- सा छलकाया

छीन लिया मुझसे

क्यों पलकों का साया?

7

आँसू पी डाले थे

ज़ख़्म मिले तुमसे

लफ़्ज़ों में ढाले थे।
-0-