Thursday, January 28, 2016

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आँखों का भ्रम
रामेश्वर काम्बोजहिमांशु

नन्हे हाइकु ने चश्मा न तोड़ दिया होता तो पता ही नहीं चल पाता कि मोतियाबिन्द विस्तार पा चुका है।अब आँख का आपरेशन होना था।अच्छा ही हुआ जो चश्मा टूटा और आँखों का भ्रम भी।सुबह सुबह अन्तिम मेल देखी । मैंने मेल अपने एक अन्तरंग मित्र को अग्रेषित कर दी कि अब कुछ दिनों के लिए लिखा-पढ़ी का काम संभाल ले। गाड़ी में बैठकर घर से निकला ही था कि एक आत्ममुग्ध कवि का फोन आ गया।उनका आग्रह था कि मैं उनकी प्रकृति विषयक कविताओं पर लेख लिखकर दो-चार दिन में रवाना कर दूँ । वे अपनी कविताएँ भेजने को भी तैयार न थी । मैं खुद ही उनके संग्रहों से छाँटूँ। इनको अपने बारे में लिखवाने का बहुत पहले से व्यसन रहा है । किसी के बारे में लिखना तथा अच्छी रचनाओं की प्रशंसा करना खुद का अपमान समझते हैं।
मैंने उनको ऑपरेशन की बात कही और साफ़-साफ़ कह दिया कि पूरे महीने मैं लेखन आदि काम नहीं कर सकूँगा।ये सब कुछ अनसुना करके केवल अपने बारे में लिखने पर ही ज़ोर दे रहे थे । कानों का इस्तेमाल इन्होंने सीखा ही नहीं था।सुना था साँप के कान नहीं होते,लेकिन हम सबको साँप ही नहीं,बिना कान के  लाखों इंसान मिलेंगे ।ये बीमार और कराहते हुए वृद्ध व्यक्ति को भी अपनी तुर्श आवाज़ में यह कहते सुने जा सकते हैं-आपने हमारे बारे में लेख नहीं लिखा।सचमुच इतनी हेकड़ी दिखाना ठीक नहीं है।हम पर नहीं लिख पाएँगे तो आप अमर कैसे होंगे?’’ साथ ही आपको यह भी समझाने की कोशिश करेंगे कि इन पर क्या लिखा जाए और कितना लिखा जाए।ये मरने से पहले अमर होना चाहते हैं।
मन में चलती विचारों की उलझन के कारण पता ही न लगा कि कब मुझे ऑपरेशन बैड पर लेटा लिया गया।अब मुझे बेचैनी तथा चिंता को अपने गले से उतारना था। ऑपरेशन जो शुरू होने जा रहा था। प्रभु का नाम जैसे ही मन में लिया मुझे ऐसा लगा कि मेरे चाहने वाले मेरे ऑपरेशन टेबल के पास मेरी सुरक्षा के लिए आ खड़े हुए हैं।
बोझिल मन

भूल गया पल में

सारी तपन।

18 comments:

Sudershan Ratnakar said...

स्वार्थपरक दुनिया का सत्य । लेकिन चाहने वालों का अपनत्व,स्नेह मरहम का काम करता है। बहुत सुंदर।

Dhingra said...

भाई साहब जीवन का आनंद तो मुट्ठी भर चाहने वालों से ही आता है। ऐसे लोगों की स्वार्थपरता तो समय-समय पर खलती है।

Dr.Bhawna said...

kaise kaise log duniya men hain ham sab jante hain kya kiya jaye aise logon ka samjh se bahar hai par aapke hiban ki antim 4 panktiyon ne aankhne dabdaba din...bahut bahut badhai aapko...

Shashi Padha said...

मेरे पिता कहते थे 'जिसके पास जो है वो वही देगा , अगर आप लो ही नहीं तो उसके पास ही रह जाएगा ' यह बात मैंने गाँठ बाँध के रखी है |अपनों का स्नेह हर परिस्थिति से जूझने की शक्ति प्रदान करता है , यही हमारी निधियाँ हैं |

शुभकामनाओं सहित,

शशि पाधा

ज्योति-कलश said...

बहुत सुन्दर ,सरल शब्दों में जीवन के सच से रूबरू कराया आपने !
वाकई ऐसे स्वार्थी बिना ढूँढे हजार मिलते हैं ...लेकिन ..सहज स्नेही चंद लोगों की आत्मीयता इन सब पर भारी है ....सराहनीय , सुन्दर ,प्रेरक हाइबन !!

सादर नमन के साथ
ज्योत्स्ना शर्मा

rbm said...


स्वार्थ का नशा कुछ लोगों के सर पर, उनकी प्रकृतिवश, चढ़ा रहता है ऐसे लोगों को समय-असमय का दूसरे शब्दों में किसी की अच्छी -बुरी परिस्थितियों से वास्ता नहीं होता केवल दूसरों के मन की शांति भंग करना ही उनका ध्येय होता है ऐसे में आने वाली अहम् स्थिति से गुजरने के लिए भुक्तभोगी को मानसिक शांति हेतु प्रभु का ध्यान ही सर्वोपरि होता है और आपका अपनी कुशाग्र बुद्धि द्वारा लिया गया त्वरित निर्णय ही आपका सहारा बना मानसिक शांति आपको अपने स्नेही जनों से घिरा हुआ महसूस करा गई , इंसानी दुनिया से ऊपर कुछ है जो निस्वार्थ भाव से हम इंसानों का सहारा बनता है हमें तनावमुक्त करता है भाई जी आपका हाईबान प्रेरणा प्रदान करता है , बधाई

पुष्पा मेहरा

Krishna said...

लोगों की अजब मनोवृति को उजागर करता बहुत सुंदर हाइबन।
स्वार्थ का चश्मा लगाने वाले लोगों को तो लगता है ............

वर्तमान समझा रहा केवल एक यथार्थ
धूल झोंक संबंधों पे साधो निज का स्वार्थ।

ऐसे लोग कैसे भूल जाते हैं कि असल में तो स्नेह और अपनत्व ही हमारे जीवन की सच्ची शक्ति है।

सादर
कृष्णा वर्मा

मेरा साहित्य said...

uf itna galat hai loog yadi dusre ka drd samajh len to duniya bahuut sunder ho jayegi apne se pahle yadi thoda sa bhi dusron ke bare me soch len to ......
bhaiya bahut khoobi se likha hai aapne
rachana

ई. प्रदीप कुमार साहनी said...

आपके ब्लॉग को यहाँ शामिल किया गया है ।
ब्लॉग"दीप"

यहाँ भी पधारें-
तेजाब हमले के पीड़िता की व्यथा-
"कैसा तेरा प्यार था"

ई. प्रदीप कुमार साहनी said...

आपके ब्लॉग को यहाँ शामिल किया गया है ।
ब्लॉग"दीप"

यहाँ भी पधारें-
तेजाब हमले के पीड़िता की व्यथा-
"कैसा तेरा प्यार था"

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

स्वार्थ का पर्दा जिनकी आँखों पर पड़ जाए, उन्हें फिर और कुछ कहाँ दिखाई देता है.. और अपनों को पहचानने के लिए आँखों की आवश्यकता नहीं पड़ती ... :-)
सुंदर, सरल, सहज शब्दों में कितनी ख़ूबसूरत सच्चाई का बयान किया आपने भैया जी !
बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ आपको !!!
~सादर
अनिता ललित

Amit Agarwal said...

अरे सर, आप जैसे विस्तृत हृदय और प्रेमी व्यक्ति को लोग परेशान नहीं करेंगे तो किसे करेंगे? हाँ, ये उनकी मूर्खता और स्वार्थ ज़रूर है कि वो आपकी अस्वस्थता या व्यस्तता का भी ख़याल न करें..
लेकिन फिर भी देखिये न सर, आप जैसे साहित्यकार को परेशान करके भी वो एक बेहतरीन हाईबन की रचना का कारण बने!
एक दु:खद व्यवहार को भी आपने कितनी सुन्दर अभिव्यक्ति में ढाल दिया... साधुवाद!
काश कि हम आपसे कुछ सीख सकें...

sushila said...

स्वार्थी लोग संबन्ध स्थापित करते हैं केवल पाने की इच्छा लिए। देना इन्हें आता ही नहीं। संवेदना से इनका परिचय ही नहीं।
अंतिम पंक्तियाँ अंतस में उतर गईं। हाइकु भी बहुत सुंदर।
प्रणाम आपको।

sushila said...

स्वार्थी लोग संबन्ध स्थापित करते हैं केवल पाने की इच्छा लिए। देना इन्हें आता ही नहीं। संवेदना से इनका परिचय ही नहीं।
अंतिम पंक्तियाँ अंतस में उतर गईं। हाइकु भी बहुत सुंदर।
प्रणाम आपको।

प्रियंका गुप्ता said...

आपकी आँखों में मोतियाबिंद हुआ, जिसको ऑपरेशन से ठीक किया जा सकता है, पर ऐसे सांपनुमा स्वार्थी इंसानों की आत्मा पर जो जाला होता है, वो किस ऑपरेशन से ठीक हो...???
बहुत करारा व्यंग्य करता हुआ एक यथार्थपरक खूबसूरत हाइबन है यह...मेरी हार्दिक बधाई...|

Kamla Ghataaura said...

रामेश्वर भाई साहब आप का यह हाइबन सीख देने के साथ साथ जीवन सत्यों से अवगत भी कराने वाला है कि संसार स्वार्थी लेगों से भरा पड़ा है।सच्चा स्नेह देने वाले हिमायती लोग कुछेक ही होतें हैं ।बहुत सुन्दर ढंग से आप ने प्रस्तुत किया ।अच्छा लगा ।
अब आप से कुछ पूछना है और कुछ कहना है ।पहली बात यह कि यह बात '१३ की है। लिखी गई '१४ को और हमें पढ़ने को मिली '१६ में ऐसा क्यों ?आप की रचनायों का इन्तजार करने वालों को आप ने इतनी प्रतिक्षा क्यों करवाई ?
दूसरी बात आप की भल मनचाहत का लोग नाजायज फायदा उठाते हैं ।आप इतने भले क्यों हैं ?
अब दुनिया की बात अपने अनुभव से गुजरे लोग कह गये है कि इतने मीठे न बनो कि कोई तुम्हें पूरा ही निगल जाये ना इतने कड़बे बनो कि मुँह में डालते ही थूक दे ।
बीच का रास्ता हमें खुद को ही सोचना पड़ेगा ।
और सुन्दर रचनायों के इन्तजार के साथ ।
शुभकामनायें करती कमला

Dr. Hardeep Kaur Sandhu said...

कहते हैं कि इस संसार में दो तरह के लोग हैं एक केवल अपने बारे सोचने वाले तथा दूसरे 'कर भला हो भला' को मानने वाले। इसे बड़े ही खूबसूरत अंदाज़ में रामेश्वर जी ने अपने हाइबन में बयाँ किया है। आज खुदगर्ज़ी तथा स्वार्थ अपने पूरे पंख फैला कर ऊँचे आसमान में उड़ान लगा रहा है। इंसान इंसान न होकर हैवान बनता जा रहा है। आज जरूरत है हमें इस खुदगर्ज़ी के दायरे से बाहर आने की तथा अपनी सोच को विशाल करने की। इसकी सही दिशा हमें रामेश्वर जी की लेखनी से मिलती है, क्योंकि आप तंगदिली तथा स्वार्थ से बहुत दूर हैं। आप दूसरों की जरूरत को अधिक महत्त्व देने वालों में से हैं। अब यही आपकी पहिचान बन गई है। हरदीप

jyotsana pardeep said...

इस संसार में एक तरफ "आत्ममुग्ध "लोगों की कमी नहीं तो दूसरी ओर
" चाहने वाले" भी कम नहीं जो सुरक्षा कवच का काम करतें हैं परन्तु हिमांशु जी जैसे साहित्यकार तो कोयले की खदान से हीरा निकाल ही लेतें हैं वो भी ...बड़ी ही निर्मलता के साथ ...जिसकी चमक से हम चकाचौंध हो गए ....सुंदर, सहज शब्दों में कितनी ख़ूबसूरत यथार्थ का का बयान किया आपने भैया जी !
सकरात्मक परिणाम को प्रणाम !
बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ आपको !!!