Thursday, January 28, 2016

680



आँखों का भ्रम
रामेश्वर काम्बोजहिमांशु

नन्हे हाइकु ने चश्मा न तोड़ दिया होता तो पता ही नहीं चल पाता कि मोतियाबिन्द विस्तार पा चुका है।अब आँख का आपरेशन होना था।अच्छा ही हुआ जो चश्मा टूटा और आँखों का भ्रम भी।सुबह सुबह अन्तिम मेल देखी । मैंने मेल अपने एक अन्तरंग मित्र को अग्रेषित कर दी कि अब कुछ दिनों के लिए लिखा-पढ़ी का काम संभाल ले। गाड़ी में बैठकर घर से निकला ही था कि एक आत्ममुग्ध कवि का फोन आ गया।उनका आग्रह था कि मैं उनकी प्रकृति विषयक कविताओं पर लेख लिखकर दो-चार दिन में रवाना कर दूँ । वे अपनी कविताएँ भेजने को भी तैयार न थी । मैं खुद ही उनके संग्रहों से छाँटूँ। इनको अपने बारे में लिखवाने का बहुत पहले से व्यसन रहा है । किसी के बारे में लिखना तथा अच्छी रचनाओं की प्रशंसा करना खुद का अपमान समझते हैं।
मैंने उनको ऑपरेशन की बात कही और साफ़-साफ़ कह दिया कि पूरे महीने मैं लेखन आदि काम नहीं कर सकूँगा।ये सब कुछ अनसुना करके केवल अपने बारे में लिखने पर ही ज़ोर दे रहे थे । कानों का इस्तेमाल इन्होंने सीखा ही नहीं था।सुना था साँप के कान नहीं होते,लेकिन हम सबको साँप ही नहीं,बिना कान के  लाखों इंसान मिलेंगे ।ये बीमार और कराहते हुए वृद्ध व्यक्ति को भी अपनी तुर्श आवाज़ में यह कहते सुने जा सकते हैं-आपने हमारे बारे में लेख नहीं लिखा।सचमुच इतनी हेकड़ी दिखाना ठीक नहीं है।हम पर नहीं लिख पाएँगे तो आप अमर कैसे होंगे?’’ साथ ही आपको यह भी समझाने की कोशिश करेंगे कि इन पर क्या लिखा जाए और कितना लिखा जाए।ये मरने से पहले अमर होना चाहते हैं।
मन में चलती विचारों की उलझन के कारण पता ही न लगा कि कब मुझे ऑपरेशन बैड पर लेटा लिया गया।अब मुझे बेचैनी तथा चिंता को अपने गले से उतारना था। ऑपरेशन जो शुरू होने जा रहा था। प्रभु का नाम जैसे ही मन में लिया मुझे ऐसा लगा कि मेरे चाहने वाले मेरे ऑपरेशन टेबल के पास मेरी सुरक्षा के लिए आ खड़े हुए हैं।
बोझिल मन

भूल गया पल में

सारी तपन।

Monday, January 25, 2016

679



1-कृष्णा वर्मा
1
बड़ा अधीर
होता ये ख़ारा नीर
झरे ज़रा -सी पीर
झट ढो लाए
जा हृदय का भार
नैन- नदी के तीर।
1
माटी के हम
औ बनाए हमने
रेत के ही मकान
थमा ना कभी
सिलसिला तूफानी
कैसे निभे गुमान।
3
हैं स्मृतियों के
धुँधले दर्पण में
पूर्ण पलों की छाया
टँगे सवाल
उलझन की खूँटी
क्या-क्या खोया,क्या पाया।
4
लगने लगा
अनायास यादों का
सतरगी बाज़ार
ढलने लगीं
मेरी जीवन शामें
यादों की रौनक में।
-0-
पिटारी यादों वाली-सीमा स्मृति
      आज याद कि पिटारी में से एक याद का मोती आप सब के लिए निकल आया। शायद  से बात सन् उन्नीसों बहत्तर की है -मैं केवल नौ वर्ष की थी। मुझे टेलीविजन देखने का बहुत शौक था।  मैं उस समय की बात कर रही हूँ ,जब टेलीविजन के शुरूती दिन थे। पूरे मोहल्ले में एक ही घर पर एंटिना दिखाई देता था। मुझे टेलीविजन देखने की  इतनी रुचि थी कि मैं  अपने मोहल्ले की लाइट ना होने पर कभी कभी दूसरे मोहल्ले के घर में टेलीविजन देखने चली जाती थी । कोई कोई टेलीविजन वाला घर तो इतवार को फिल्म आने वाले दिन, पचीस पैसे टिकट लगा देता था मुझे याद है, हमारे सामने वाले घर में टेलीविजन वाली आण्टी की बेटी से मेरी दोस्ती थी । हम दोनों हमेशा घरघर, स्टापू,गिट्टे रस्सा कूदना,पिठू-गर्म जाने क्या क्या  खेल साथ साथ खेलते थे। एक दिन रंजना से मेरी लड़ाई हो गई। शायद  बात मम्मियों तक पहुँच गई।  ओहो वो दिन था इतवार । फिल्म आने का दिन, मैं उन के गेट पर अन्दर जाने को खड़ी थी । तभी उसकी मम्मी दनदनाती हुई निकल कर आई और बोली कि खबरदार जो घर में घुसी, तेरी एक टाँग तो खराब है, लगड़ी है, दूसरी भी तोड़ दूँगी(मेरी टाँगो में पोलियो है)और मुझे वहाँ से भागा दिया । मैं उनकी लगड़ी  बात से ज़्यादा दुखी नहीं हुई अपितु  फिल्म ना देख पाने के दु:ख के कारण रो रही थी ।
मेरे पिता जी ने मुझे बहुत समझाने कि कोशिश की पर मेरा वो दुख तो  फिल्म न देख पाना था । मैं रोते रोते सो गई। अगले दिन उदास मन से स्कूल चली गई। मुझे याद है स्कूल में पढ़ाई में दिल नहीं लग रहा था ;बल्कि मैं रंजना से पुन: दोस्ती करने के उपाय सोच रही थी। दोपहर को जब मैं घर आई तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा । मेरे पिता जी हमारे लिए वेस्टन कम्पनी का एक नया टेलीविजन ले आये थे । मम्मी ने बताया कि पापा ने कल साथ वाली  आण्टी ने जो मुझे टाँग तोड़ने वाली बात कही थी, वो  सुन ली थी ।  थोड़े दिनों बात मैं देखा कि पापा शाम को घर देर से आने लगे । मैं कई बार पापा के आने  का इंतजार करते करते सो जाने लगी और कभी सुबह देखती कि पापा का गला खराब है ,वो अकर गरारे कर रहे होते थे ।मैंने  म्मी से पूछा कि पापा आजकल इतनी देर से क्यों आते हैं, तो मम्मी ने बताया कि हमारे पास इतने रुपये नहीं थे कि टेलीविजन खरीद सकें।उन्होंने अपने दोस्त से उधार लिया है। ये टेलीविजन बहुत मँहगा है। चार हजार रुपये का है; इसलिए तेरे पापा अपने स्कूल के बाद तीन जगह ट्यू पढ़ाने  जाते हैं; ताकि हम उधार चुका सकें।  आज भी मेरे जहन में टेलीविजन का वो मूल्य जो रोज सुबह पापा के गरारों के रूप में सुनाई देता था, याद है । आज हमारे घर में चार टेलीविजन हैं और पापा बहुत शौक से दिन भर अपने कमरे में टेलीविजन देखते रहते हैं-
मिश्री -सी मीठी
निबौरी सी कड़वी
अनन्त यादें।                                       
    - सीमा स्मृति

Monday, January 18, 2016

677



आत्मबोध
थाइलैंड की राजधानी में बना मंदिरों वाला रमणीक शहर बैंकॉक। कुछ समय पहले मुझे वहाँ जाने का अवसर मिला। अम्बर से संवाद रचती ऊँची इमारतों के बीचो -बीच एक मंदिर देखा। सोने के बुद्ध वाला मंदिर। 10 -12 फुट ऊँचा शुद्ध सोने से बना हुआ बुद्ध आँखें बंद किए हुए वहाँ समाधि में बैठा है। पास पड़ा एक काँच का बक्सा इस मूर्ति का इतिहास अपने मुँह से बोलता है।

             बारीक़ -बारीक़ लिखे हुए को पढ़ने का मैं असफ़ल प्रयास कर रही थी। मेरे चेहरे पर फैली उत्सुकता को भाँपते एक सेवादार मेरे पास आया। उसने बड़ी नम्रता से बताया, " शांत तथा गंभीर मुस्कान बिखेरता बुद्ध ज़िंदगी के अनबूझ रहस्य अपने भीर लिये बैठा है। कहते हैं कि बहुत वर्ष पहले यहाँ किसी मंदिर वाले स्थान पर हाईवे बनने के कारण एक मिट्टी के बुद्ध की मूर्ति को क्रेन से उठाकर कहीं और स्थापित करना था। अचानक मूर्ति में दरार आ गई और बदकिस्मती से बारिश भी होने लगी। मूर्ति को एक बड़े कपड़े से ढक दिया गया और काम भी बंद हो गया। रात को टीम का मुखिया देखने गया कि वहाँ सब सही है क्या ? उसको टॉर्च की रौशनी में कपड़े के नीचे कुछ चमक दिखाई दी। उसकी हैरानी की कोई सीमा ही न रही, जब उसने मूर्ति से मिट्टी हटाई , वहाँ सोने के बुद्ध की मूर्ति प्रकट हो गई।"

          मन में उठते सवालों से प्रश्न सूचक बना मेरा चेहरा देखते उसने फिर बताना शुरू किया। " उस दिन उस मुखिया की सोच में भी अनगिनत सवाल थे। उसने मूर्ति का भेद खोलने के लिए अपनी आगे की खोज के परिणाम जब सामने रखे, तो पता चला कि कई सौ वर्ष पहले बर्मा की फ़ौज ने थाईलैंड पर धावा बोल दिया था। वहाँ बौद्ध भिक्षुओं ने सोने की मूर्ति को बचाने के लिए एक खास किस्म की मिट्टी का लेप लगाकर ढक दिया।हमले में सभी भिक्षु मारे गए तथा यह भेद भी उनके साथ ही दफ़न हो गया था। "

        सेवादार तो इतनी बात बताकर वहाँ से चला गया;मगर मैं अपनी सोच के समंदर में गहराई से उतर सोच रही थी कि हम सभी मिट्टी के बुद्ध ही तो हैं। हमने खुद को कभी डर -चिंता तथा कभी क्रोध –अहं के कठोर नकाब से ढका हुआ है। हर नकाब के नीचे कोई न कोई सोने का बुद्ध बैठा होता है -सोने जैसी शुद्ध तथा पवित्र आत्मा वाला। जरूरत है इस नकाब को उतारने की। मुझे लगा कि मेरे नए विवेक की रौशनी में दिखाई दे रहा मेरे सामने बैठा बुद्ध ज़िंदगी के वास्तविक सकून को पाने के लिए मुझे खुद को खोजने का मशवरा दे रहा हो।
           
सोने का बुद्ध

बैठा यूँ मुस्कराए

 देख मुझको।

-       डॉ हरदीप सन्धु

Friday, January 15, 2016

676

नटखट मुन्ना
कमला घटाऔरा

एक दिन मेरी बेटी को जॉब इन्टरव्यू के लिए जाना था।अपने नौ दस महीने के बेटे को मेरे पास छोड़ कर। मुन्ना मेरे पास आकर बहुत खुश हुआ। जैसे उसे खेलने को साथी मिल गया हो। मैं  भी आनंदित हो गयी अपने बचपन को मुन्ने के रूप में देखने के लिए। उसका घुटनों के बल चलना मुझे आनंदित कर रहा था। यशोदा के कान्हा की बाल लीलाओं का मैं कल्पना में आनंद लेने लगी। कभी तुलसी के राम की छवि निहारने लगी। यद्यपि वह कुछ पकड़ कर खड़ा  हो सकता है । ठुमुक ठुमुक कर चल नही सकता । वह हर खिलौना हाथ में लेता घुमा कर खोलने की कोशिश करता फिर रख देता। फिर दूसरी चीज़ तलाशता। हमारे छोटे से ओपन किचन वाले फ्लैट में वह सीटिंग रूम से बेड रूम की और भागता। मैं उठ भी न पाती की वह पहुँच चुका होता। बिना कुण्डी के द्वार  इस लिए बंद  नहीं किये कहीं  खोलते समय उसका हाथ ना जाये। अपने घर में ऐसे ही हाथ दे बैठा था। खाने  का टाइम होने पर मैं खाना खिलाने बैठी तो वह हाथ से हिला कर चम्मच  दूर गिरा देता। दूध भी आधा पी कर छोड़ दिया। अब क्या करूँ ?याद आया नैपी चेंग करनी है। यह भी हो गया। उसके सामने खिलोने रख कर उसे खेलना सिखाने लगी। अब उसके नाना जी के दुपहर के खाने का टाइम था। । मैंने सोचा उनके लिए रोटी बना कर रख दूँ। मुन्ना सो जाता तो आसानी होती। अब क्या करूँ ?


अब मुझे यशोदा बनना पड़ा। अपनी चुन्नी से उसे बांध कर दूसरा सिरा टेबुल के  पाये से  बांध दिया। मैंने अभी तवा भी नहीं रखा था कि जाने कैसे वह तो बंधन छुड़ा कर रसोई में आ पहुँचा। शायद मैंने उसे ढीला बाँधा था। वह बन्धन से आजाद हो झट से मेरी टाँगों के सहारे  खड़ा हो कर नीचे की सामान रखने वाली कबड़ के हैंडल पकड़ कर देखने लगा। एक छुड़ाती दूसरी खोल लेता। उधर से हटाया तो वाशिंग मशीन के पास जाकर उसके बटन चेक करने लगा सारी सेटिंग बदल दी। उसे उठाये घूमना भी सहल नहीं था। कुछ देर उठाये रखा। अब मेरी बस थी। मैंने कहा, ‘‘चलो मुन्ने सोने का टाइम है। बहुत खेल लिया।” मुन्ना कहाँ मानने वाला। उस की निगाह कॉफ़ी टेबल पर पड़े इनके आई पैड पर चली गयी वह उसे लेने को मचलने  लगा। अच्छा, लो खेलो। मैंने  खोल कर सामने रखा तो स्क्रीन पर हाथ घुमा कर देखने लगा। स्क्रीन चेंज  होकर  उसे और लुभाने लगी। इस खेल में उसे बहुत आनंद आने लगा। कैसे छुड़ाऊं लेने पर रोने लगता। उस से जबरदस्ती आई पैड छुड़ा कर छुपाया। उसे गुस्सा होकर कहा, ‘‘बस, अब सोना है बाद में मम्मी  के  साथ खेलना।’’ उसे कंधे से लगा थपथपा कर सुलाने की कोशिश करने लगी। भला मुन्ना क्यों सोये। मेरे कंधे से उसे मम्मी के कंधे जैसा स्पर्श और महक नहीं मिल रही थी। वह बार बार गर्दन हटा कर कभी नीचे उतरने की ज़िद्द करता कभी दोनों हाथों से मेरे बाल खींचने लगता। छुड़ाने पर डर लगता उस की ऊँगली को चोट न पहुँच  जाये।
तीन चार घन्टों में उसने मुझे तो नाको चन्ने चबा दिये । मेरी तौबा करा दी। एक डर भी था कि उसे कहीं सट्ट-चोट न लग जाये। दूसरा उसे कुछ अपनी मर्जी से या अधिक खिलाने से कहीं बिगाड़ न हो जाये। बाहर द्वार खुलने की आवाज से उसके कान  खड़े हो गए। उसे आभास हो गया हो जैसे मम्मी आ गई हो। वही थी।कोई कितना लाड़ लड़ाए, माँ तो माँ  ही होती है ना ! वह हर्षित होकर माँ की ओर जाने को उछला। मैंने नीचे छोड़ दिया और राहत की साँस ली। वह तेजी से घुटनों के बल माँ की ओर भागा। माँ को देख उसका चेहरा ख़ुशी से खिल उठा।   
निहार माँ को
खिला मुख कमल
दमके नैन ।

Sunday, January 10, 2016

675



उधारे बोल
डॉ हरदीप सन्धु

बसंती ऋतु का आम सा दिन। खिले फूलों जैसी हँसी बिखेरते बातों में लगे विद्यार्थी। मगर वह तो हमेशा की तरह आज भी चुप -चाप बैठी थी। वही भावहीन चेहरा ,सिले लब तथा झुकी नज़रें। लगता था कि उसने ताउम्र लम्बी चुप्पी से समझौता कर लिया है। न वह गूँगी है ,न ही बोली मगर फिर भी वह अपने चारों ओर दूर -दूर तक फैले चुप्पी के मरुस्थल का सफ़र प्रतिदिन करती लगती है।
पहले -पहले तो मुझे लगा कि वह हद से ज्यादा शर्मीली है। धीरे धीरे खुल जाएगी मगर यह दिन कभी न आया। पंद्रह वर्ष की इस लड़की को मैंने हमेशा ही चुप्पी का आँचल ओढ़े ख़ामोश परछाईं के नीचे खड़े पाया है। कभी- कभी वह मुझे एक अनबूझ सवाल -सी लगती है ,तो कभी धरा -म्बर के गहरे रहस्य -सी। उसके कोमल लबों पे हँसी ने कभी दस्तक नहीं दी थी, शायद जन्मी तो वह चुप्पी में नहीं होगी। साधारण से नैन -नक्शों वाली वो दीवानगी की हद तक सलीके वाली है। अब भी वह सुंदर अक्षरों को कलात्मकता से कोरे पन्नों पर सजो रही है।
भीतर तक उतरती उसकी चुप्पी ने मेरे दिल -दिमाग की परतें उलट-पलट कर डालीं। चुप्पी की भाषा महसूस करने पर मुझे उसके व्यक्तित्व से जुड़ी भीतरी पीड़ा का अहसास हुआ। वह तो 'सिलेक्टिव म्युटिज़्म' नाम के एक असाधारण से रोग से पीड़ित है। उसने अपने बोल की सहभागिता सम्बन्ध केवल अपने खून के रिश्तों से ही पाई है। घर की चारदिवारी से बाहर आते ही वह चुप्पी की अँधेरी गुफ़ा में कहीं गुम हो जाती है। उसके मुँह से कभी एक बोल भी नहीं निकला घर की चौखट के इस पार। वह तो एक बंद काँच के डिब्बे में जिए जा रही है जहाँ से वह दुनिया को देख तो सकती है ;परन्तु खुद बाहर नहीं आ सकती। वहाँ बैठी वो चीखती तो है;मगर कोई उसे सुन नहीं सकता। न किसी ने उसे कभी कुछ खाते-पीते  देखा है और न ही चोट लगने पर कभी रोते। शायद अपने अश्रु वह भीतर ही पी जाती होगी। शब्द उसके मुँह में होते हैं ,मगर बाहर नहीं आते। शोर उसकी चुप्पी को और गहरा कर देता है। अब तो चुप्पी ही उसकी पहचान बन गई है।
भरे दरिया -से मन तथा सूनी -सी निगाहों से अब भी वह खिड़की से बाहर देख रही है, वृक्ष की टहनी बैठी रंगीन चिड़ियों की ओर। शायद ये चिड़ियाँ ही उसकी इस चुप्पी को दो बोल उधार दे जाएँ।
गहरी शाम
चहकती चिड़ियाँ
फटकी चुप्पी
-0-