Wednesday, December 9, 2015

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1-रचना श्रीवास्तव

          वो शाम आज भी याद है जब एक सुन्दर- सी भद्र महिला ने हाथ हिलायाकौन होगा से सोच कर मै उसके पास चली आई. उम्र में बड़ी थी हाथ जोड़कर नमस्ते किया. खुश रहो कहा उन्होंने .क्या तुम भी यहीं रहती हो पूछा उन्होंने ..हाँ, मेरा उत्तर था तो वो तुरंत बोलीं  -मै भी यहीं रहती हूँ यूनिट 8 में। तुम किस यूनिट में रहती हो फिर पूछा उन्होंने मैने बताया यूनिट 25 मेँ .ये थी मेरी उनसे पहली मुलाकात और फिर हम लगभग रोज ही मिलने लगे मैने उनको आंटी बुलाना शुरू कर दिया .दोस्तों मैने उनका नाम नहीं बताया न पर मुझे भी उनका नाम जानने की जरूरत कभी नहीं पड़ी ;क्योंकि वो तो हमारी आन्टी बन चुकी थी . आन्टी  के पास यादों और अनुभवों का खजाना था जिनमे से कुछ न कुछ उपहार मुझे भी मिलने लगे .रिश्तों के पौधों को मौसम की मार से कैसे बचाना है. त्याग ,समर्पण और तपस्या से कैसे किसी को नया जीवन दिया जा सकता है , खाने को कैसे रुचिकर और स्वादिष्ट बना देता है मैने उनसे सीखा. वो हमारा मिलना बढ़ता गया उनकी पोती और मेरी बिटिया गहरे दोस्त बन गए अब हमारा रिश्ता पारिवारिक हो गया था .उनका मेरे घर आना हमारा उनके घर जाना अब अधिक होने लगा था आन्टी को देख कर लगता 80 साल की उम्र मेँ भी ये चुस्ती कभी कभी तो खुद पर ही शर्म आने लगती थी ,आन्टी को जानते उनसे सीखते कब 2 साल बीत गए पता ही न चला .आन्टी एक दिन थोड़ा परेशान थीं मैने पूछा क्या हुआ बोलीं गले मेँ गाँठ है डॉक्टर ने बायप्सी की है जाँच के लिए भेज है .पता नहीं क्या होगा .मैने कहा आन्टी अच्छे लोगों के साथ बुरा नहीं होता सब ठीक होगा पर रिपोर्ट आई वो कैन्सर था वो भी चौथी  स्टेज का. बहुत से डॉक्टर को दिखाया सभी ने ऑपरेशन बोला वो भी कराया पर  उसके बाद उनकी तबियत  ख़राब ही होती गयी  और वो मजबूत  स्तम्भ गिर गया .चलती फिरती  मुस्कुराती ,प्यार करती और कभी डाँटती वो आन्टी न जाने कब हम सब की माँ बन गयी पता ही न चला आज वो उस घर में तो हैं पर तस्वीर बन गयीं और उस तस्वीर  पर हमने  हार चढ़ा दिया . अब भी मै उस घर जाती हूँ पर सबके होते हुए भी वो घर खाली लगता है . मैने उनसे कहा था कि अच्छे लोगों के साथ बुरा नहीं होता पर शायद मै ये भूल गयी थी की अच्छे लोगों की भगवान को भी जरूरत होती है.

दुःख  बरसे
नैनो के आँगन में
बिना मौसम

 सहेजूँगी मै
ज्ञान का उपहार
जो तूने दिया
-0-
 Los Angeles, CA

-0-
2-डॉ०पूर्णिमा राय
1
खोल दे ताले
अन्तर्मन की याद
भरे उड़ान
बिना पँख के पंछी
लहराये आँचल!!
2
कानन घना
कोहरे की ओढ़नी
श्वेत वसुधा
सँवरी है दुनिया
बदले दृष्टिकोण !!
 3
दुखती नसें
आह ये सूनापन
उम्र भर का
घिसटती जिन्दगी
मशीनीकरण में।।
4
घरौंदा टूटा
बेदर्द हैं दीवारें
बाँध न पाई
रिश्तों का प्रीत- स्नेह
विष- भरा नींव में ।।
5
मौन गहन
मूक- बधिर दिल
सिसक रहे
गुमनाम अँधेरे
रोशनी की चाह में।।
-0-

14 comments:

Amit Agarwal said...

बहुत सुन्दर हाईबन और ताँका! रचना जी और पूर्णिमा जी को शुभकामनाएँ

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

मन को भिगो गया हाइबन रचना जी। अक्सर कुछ अजनबी इतने अपने से हो जाते हैं कि उनके बग़ैर अपने जीवन की कल्पना करना भी मुश्किल हो जाता है। मगर वक़्त के बेरहम हाथ कब रुके हैं भला!
सुंदर ताँका पूर्णिमा जी ! विशेषकर 'घरौंदा टूटा...' दिल को छू गया !

सुंदर अभिव्यक्ति के लिए आप दोनों को हार्दिक बधाई!

~सादर
अनिता ललित

Savita Aggarwal said...

मन पर गहेरे असर करने वाला हाइबन लिखा है रचना जी बधाई |पूर्णिमा जी आप के तांका भी उत्तम लगे हार्दिक बधाई |

Dr Purnima Rai said...

अमित जी ,अनीता जी, सविता जी ,हा्रदिक आभार।

रचना जी आपकी हाइबन रचना संबंधों के सशक्त
आधार का बाखूबी प्रस्तुतिकरण है ।
शुभकामनाएं!!

jyotsana pardeep said...

बहुत सुन्दर हाईबन और ताँका!सुंदर अभिव्यक्ति के लिए
रचना जी और पूर्णिमा जी को शुभकामनाएँ

Sudershan Ratnakar said...

रचनाजी मार्मिक हाइबन। सुंदर अभिव्यक्ति।
पूर्णिमाजी सुंदर ताँका। बधाई।

सीमा स्‍मृति said...

रचना जी जीवन के रूप लिए हाइबन।बिना नाम के रिश्‍ते मन की तहों में हमेशा जीवित रहते हैं। अपनी अभिव्‍यक्ति साँंझी करने के लिए धन्‍यवाद। पूर्णिमा सुंदर ताँका बधाई ।

Pushpa Mehra said...

rchana ji apaka haiban snskaron se juda, sambahon ki prishthbhumi ko seenchta man mein jagah bana raha hai . sunder sansmarnatmak prastuti hetu badhai.
pushpa mehra.

मेरा साहित्य said...

jeevan me kabhi kabhi kuchh rishte bante hain aur jeevan bhar ke ho jate hain
to aesa hi risha mera bhi bana aap sabhi ka bahut bahut abhar
purnima ji bhav pun abhivyakti badhai aapko
punah dhnyavad sabhi ka
rachana

Dr Purnima Rai said...

मेरी तांका रचना को पसंद करने हेतु सभी साहित्यकारों का हार्दिक आभार!!

Dr Purnima Rai said...

मेरी तांका रचना को पसंद करने हेतु सभी साहित्यकारों का हार्दिक आभार!!

मंजूषा 'मन' said...

रचना जी भावपूर्ण हाइबन। मन को छू गया। बधाईं

सुन्दर तांका पूर्णिमा जी

प्रियंका गुप्ता said...

बहुत मार्मिक हाइबन है रचना जी...सच में कुछ दिल के रिश्ते ऐसे बन जाते हैं, जो खून के रिश्तों से किसी भी नज़रिये से कमतर नहीं होते...बल्कि बहुत बार उनसे बढ़ कर ही साबित होते हैं...| हार्दिक बधाई...|
पूर्णिमा जी, आपके सुन्दर तांका के लिए बहुत बधाई...|

ज्योति-कलश said...

मर्मस्पर्शी हाइबन रचना जी ..हार्दिक बधाई !

सुन्दर ताँका ..बहुत बधाई पूर्णिमा जी !