Wednesday, December 30, 2015

669


रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

1


हे मन धीर धरो
कौन यहाँ बाँटे
खुद अपनी पीर हरो ।
2
मन की मन कह लेना
सुख-दुख साथी हैं
जो मिलता सह लेना।
3
आँसू बह जाएँगे
कितना भी रोकें
पीड़ा कह जाएँगे।
4
पर्वत चढ़ने वाले
ये कब गिनते हैं
पाँवों के जो छाले।
-0-

9 comments:

ज्योति-कलश said...

bahut bhaavpravan ,prerak maahiyaa aaapake !
hruday se badhaii ..naman bhaaii ji !!

Kamla Ghataaura said...

संगर्ष करने की प्रेरणा देते माहिया । पर्वत चढ़ने वाले / कब गिनते हैं/ पावों के जो छाले ।सफलता का यही गुर है ।वाधायों की परवाह किये बिना आगे बढ़ने वाला ही शिखर तक पहुंचता है ।बधाई ।

Dr.Bhawna said...

Javab nahi aapka meri hardik shubhkamnayen...

Dr. Surendra Verma said...

सुन्दर माहिया।काम्बोज जी को प्णाम।

Dr. Surendra Verma said...

सुन्दर माहिया।काम्बोज जी को प्णाम।

Savita Aggarwal said...

काम्बोज जी नमन .सुन्दर भावपूर्ण माहिया रचे हैं .बधाई .

सरिता भाटिया said...

आदरणीय कम्बोज जी प्रणाम
सुंदर माहिया रचने के लिए हार्दिक बधाई
आदरणीय मुझे लगता है पहला माहिया थोडा सा गलत है यह ऐसे होना चाहिए
हे मनवा धीर धरो ..
अब मात्रा ठीक है ,कृपया अन्यथा ना लें

सरिता भाटिया said...

आदरणीय कम्बोज जी प्रणाम
सुंदर माहिया रचने के लिए हार्दिक बधाई
आदरणीय मुझे लगता है पहला माहिया थोडा सा गलत है यह ऐसे होना चाहिए
हे मनवा धीर धरो ..
अब मात्रा ठीक है ,कृपया अन्यथा ना लें

jyotsana pardeep said...


sadar naman bhaaii ji!
bahut bhaavpravan maahiyaa !
hruday se badhaii evam shubhkaamnayen aapko !