Tuesday, December 15, 2015

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मंजूषा मन

सारी उमर
माँगी थी तुमसे
माँगे हमने
बस कुछ ही पल
मन की बातें
कहने की खातिर
घर न द्वार
न ही कोई तोहफा
दिल चाहिए
बस खुश रहने
पर नाहक
तपन हमें मिली
जलते रहे
जलन ही तो मिली
कह जो पाते
घुट न मर जाते
रत्ती भर जो
शीतलता पा जाते
उमर भर
फिर जी पाते हम
टूट न जाते हम।

13 comments:

anita manda said...

वाह मंजूषा जी। बहुत खूब।

Amit Agarwal said...

bahut sundar!

Sudershan Ratnakar said...

बहुत सुंदर चोका।

Krishna said...

बहुत सुन्दर चोका मंजूषा जी.... बधाई!

Dr.Bhawna said...

kah na pane ka dukh hamesha salta rahta hai par ham kahi ruk jate hain apne sanskaron ke karan or khud men hi jalte rahte hain bahut achha choka likha aapne hardik badhai aapko...

मेरा साहित्य said...

शीतलता पा जाते
उमर भर
फिर जी पाते हम
टूट न जाते हम।
bahut khoob sunder abhivyakti
badhai
rachana

Sarita Sinha said...

kya kahna mann ki abhiyakti prakat karna koi appse sikhe

jyotsana pardeep said...

शीतलता पा जाते
उमर भर
फिर जी पाते हम
टूट न जाते हम।
वाह मंजूषा जी। बहुत खूब।
बहुत सुन्दर चोका ... बधाई!

Dr Purnima Rai said...

Congrates!!बहुत खूब!!

Dr Purnima Rai said...

Congrates!!बहुत खूब!!

मंजूषा 'मन' said...

आप सभी का हार्दिक आभार इस प्रयास को पसन्द करने हेतु।

आभार

प्रियंका गुप्ता said...

बहुत मर्मस्पर्शी चोका...बहुत बधाई...|

ज्योति-कलश said...

marmsparshii prastuti ...bahut badhaii !!