Wednesday, November 18, 2015

657



1-डॉ हरदीप  कौर सन्धु
  नम्बर  प्लेट
घुलते हुए बादलों से आसमान मटमैला हो गया था। तेज़ अँधेरी के संग बारिश  होने लगी थी। आम दिनों से थोड़ा ज्यादा ट्रैफिक घीमी रफ़्तार से चल रहा था। अचानक तेज़ी से एक सुनहरी कार मेरे पास से निकली। मेरी सरसरी नज़र उस कार की छह अक्षरों नंबर प्लेट पर गई। एक अनूठे से क्रम में सजे अक्षर LUVSON’ मेरा अवचेतन मन अपनी आदत के  मुताबिक इन अक्षरों में छुपे शब्द जोड़ ढूँढने लगा। समझ आते ही रूह सरशार हो गई। चाहे माँ -बाप के अमूल्य मोह को दर्शाने के लिए किसी प्रमाणित तख्ती की ज़रूरत  नहीं होती, मगर फिर भी पुत्र प्यार को प्रकट करने का यह अनोखा अंदाज़ मेरे मन सागर में रस घोल गया।

       यह सुनहरी कार अब मेरे सामने जा रही थी। मेरी नज़र अब उस कार के पिछले काँच वाली लिखाई पर अटकी हुई थी। मनमोहक फूलों के संग एक नाम, जन्म तथा मृत्यु की तारीख के साथ उकरा हुआ था। "जो उपजै सो बिनसि है "-अभी तो कली ने फूल बन खिलना था। कोई डेढ़ दशक पहले किसी की नन्ही जान अपनी ज़िन्दगी की केवल दस बहार देखकर इस रँगीले जग से रुखसत हो गई थी। ऐसे हुए अनर्थ में असमय चली अँधेरियों की शाँ -शाँ अब मुझे साफ़ सुनाई दे रही थी।
              कुछ पल बाद सुनहरी कार मेरी कार से थोड़ी दूरी पर आ रुकी थी। एक अधेड़ आयु की कमज़ोर- सी दिखती महिला उस कार में से उतरी। वह तो तेज़ कदमों चलती भीड़ में कहीं गुम हो गई थी; मगर उसके जीवन के  पलों की अनदेखी दास्ताँ मेरी आँखों के सम्मुख चित्रित होने लगी थी। कभी वह मुझे ज़िन्दगी के पिघलते किनारों पर खड़ी नज़र आई ,तो कभी उदासी की परतें पलटती। पुत्र की मृत्यु की क्रूर परछाईं ने उसके मन को टुकड़े -टुकड़े कर दिया होगा। उदास तथा पीड़ा भरे रास्तों पर चलती अपने नन्हे को वह अपने अंग -संग महसूस करती होगी। कभी छोटी -छोटी सी शरारतें करते हुए ,तो कभी जवान हुए पुत्र को अपना सहारा बने। 'नानक दुखिया सब संसार' -धन्य है उस माँ का हृदय जिसने यह सब कुछ अपनी रूह पर झेला तथा फिर कैसे यह सब लिखने का हौसला भी किया होगा। यह सच भी तो है कि दुःख बाँटने से कम होता है। उसने तो अपने दुःख की साँझ पूरी दुनिया से पाई थी; ताकि वह अपनी जिन्दा लाश के बोझ को उठाती जीने लायक हो जाए। अश्रु भीगे दिन कुछ आसान हो जाएँ।
         मुझे लगा कि कुदरत भी आज उसके संग मातम मना रही थी। अब बारिश बंद हो गई थी तथा ऊँचा उठा आसमाँ तरो-ताज़ा दिखाई दे रहा था। लगता था कि वह भी रो कर थोड़ा उसके जैसे दुःख के बोझ से हल्का हो गया होगा।
तेज़ हवाएँ
निखरा आसमान
वर्षा के बाद।
-डॉ हरदीप  कौर सन्धु
-0-
2-शशि पाधा
1
बहुत सोचा
अब नहीं छेड़ूँगी
मन का तल
रहने दूँगी
वहाँ रखी निधियाँ
तेरी यादों की
बीते पलों का सुख
साँसों की खुश्बू
गीत -गुंजन
बरसों तक सहेजी
हमारी प्रीत
क्यों डरता है मन
कहीं सेंध न लगे।
 -0-
 

11 comments:

Sudershan Ratnakar said...

हरदीपजी का हाइबन मन को छू गया। शशि जी का चोका बहुत सुंदर भावपूर्ण

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

बहुत ही मार्मिक हाइबन।
सुंदर अभिव्यक्ति के के लिए आपको हार्दिक बधाई हरदीप जी !
सुंदर चोका शशि जी !
हार्दिक बधाई आपको!

~सादर
अनिता ललित

Kamla Ghataaura said...

नम्बर प्लेट को देख कर हरदीप जी का सूक्ष्म अवलोकन अनूठे क्रम में लिखे नंबरों के पीछे की कहानी पढ़कर जो उद्धघाटन करता हैं बहुत ही करुणापूर्ण है अंतर्मन को भिगोने वाला। ‘जो उपजै सो बिनसि है’ इस कटु सत्य से इंकार नही किया जा सकता। अकाल मृत्यु को प्राप्त करने वाले का बिछौड़ा सहन करना सरल नहीं। तभी शायद उस घड़ी कुदरत भी बरस कर अपना अफ़सोस जता रही थी। बहुत ही मार्मिक है । बधाई हरदीप जी और शशि जी आपका चोका भी सुंदर लगा।

Pushpa Mehra said...

दुःख से कातर मन को सदैव ढाढस बंधाती रहने वाली ये पंक्तियाँ 'जो उपजै सो बिनसि है' ही तो उस दुखियारी की सच्ची
सखी हैं वे ही तो गाड़ी से उतरते - चढ़ते उसे समझाती रहती हैं , मन से उपजी ये लाइनें दुनियाँ की औपचारिकता से दूर हैं | ये पंक्तियाँ उस भुक्त भोगी के साथ - साथ इनको पढ़ने वाले हर सम्वेदनशील मन को, जीवन का कटु सत्य जानने के बाद भी द्रवित किये बिना नहीं रह सकतीं| जीवन और प्रकृति का तो चोली -दमन का साथ है, मन की भावनाओं से जुड़ा है, इस प्रभाव से आपका अछूता ना रहना स्वाभाविक ही था जो हाईबान बहन आपने लिखा उसे जो भी पढ़ेगा वही उसके दुःख को महसूस करेगा, किन्तु फिर भी आखिर कब तक .... अंत में- साथ तो वर्षा रुपी आंसुओं से नम और साफ़ आसमान ही देगा जो आपके द्वारा लिखा हाइकु अभिव्यक्त कर रहा है| बधाई
पुष्पा मेहरा

anita manda said...

हरदीप जी बहुत मार्मिक प्रस्तुति मन का कोना कोना भिगो गई। ईश्वर ये पीड़ा किसी को न दे ।

शशि जी उम्दा चोका। बधाई

Pushpa Mehra said...

shashi ji apake likhe choka ko main pratikriya dena bhuul gyi thi atah punah likh rahi hun ,bahut sunder choka hai. shashi ji badhai.
pushpa mehra .

ज्योति-कलश said...

दोनों रचनाएँ बेहद मार्मिक ..मन को आर्द्र करती भावप्रवण सृजन शीलता को नमन !

बहन हरदीप जी एवं शशि दीदी को बहुत बधाई !!

सादर
ज्योत्स्ना शर्मा

Kashmiri lal said...

सुंदर रचना

jyotsana pardeep said...

man ko chune wala bada hi marmik haiban hardeep ji !

bahut sundar srajan shashi ji

aap donon rachnakaaron ko bahut -bahut badhai !

Dr.Bhawna said...

bahut marmik..

प्रियंका गुप्ता said...

बहुत हृदयविदारक...आँख भर आई...|