Wednesday, November 25, 2015

660



ज्योत्स्ना प्रदीप
1
जीवन अवसाद नहीं
उसकी छाया हो
फिर कुछ भी याद नहीं ।
2
पातों  की बेबाकी
गिरती  बूँदों को
लो ! मान लिया साकी ।
3
भँवरें बदनाम हुए
गुलशन में आ
कुछ किस्से आम हुए ।
4
मंजर  शैतान हुआ
रात  यशोदा- सी
चंदा छुप ,श्याम हुआ ।
5
मंज़र कितनें प्यारे
गगन धरा छूता
नभ को निशिकर -तारे
6
गैया की नादानी
बैठी चौराहे
भोली- सी मनमानी
7

खोने से  सहमे हो
उतरेगी इक दिन
काया जो पहने हो ।
8
सब कुछ न कभी खोता
भोर उसे प्यारी,
जो नींद गहन सोता ।
9
चंदा सौगात तभी,
कौन तके उसको
होती जो रात नहीं ।
10
जीवन क्षण -भंगुर है
झरते  फूलों से
सहमा कुछ अंकुर है ।
11
सच का अपराध यही
पथ है कठिन बड़ा
जीवन   की साध यही ।
12
ईश्वर को पाना है
उसके अंश सभी
उसमें मिल जाना है ।
13
जीवन की बात यही-
इसको  चैन नहीं
साँसें सौगात रहीं ।
14
बस समय बदलता है 
पूर्ण विराम नहीं,
यह जीवन चलता है ।
-0-

Sunday, November 22, 2015

569

1-मंजूषा मन
1
आँखों भीतर
एक ही सपना था
वो भी न अपना था
टूटा पल में
उस सपने संग
जीना या मरना था .
-0-
2-अनिता मंडा

सिन्दूर, बिंदी
चूड़ी और मेंहंदी,
लाल चुनरी
किये सब शृंगार
चौक सजाओ
मंगल गीत गाओ
वधू तुलसी
वर हैं शालिग्राम
ब्याह कराओ
देने शुभ आशीष
देव हैं उठे
वर-वधू अनूठे
लें फेरे सात
एकादशी पावन
लगे मनभावन।

-0-

Saturday, November 21, 2015

658

शशि पाधा
1
बहुत सोचा
अब नहीं छेड़ूँगी
मन का तल
बहुत गहरे में
रहने दूँगी
वहाँ रखी निधियाँ
तेरी यादों की
बीते पलों का सुख
साँसों की खुश्बू
तरल अधरों की  
गीत गुंजन
बरसों तक सहेजी
हमारी प्रीत
क्यों डरता है मन
कहीं सेंध न लगे |
2
घेरती रही
हमें परम्पराएँ
बाँधती रहीं
कुल की मर्यादाएँ
झेलती रही
दंश, अवमानना
आँचल बाँधी
सारी अवहेलना
सर झुकाए
बीन ली वर्जनाएँ
अब की बार
तुम ज़रा लिखना
नियम सूची
पुरुषों के लिए भी
समाज की तख्ती पर

-0-

Wednesday, November 18, 2015

657



1-डॉ हरदीप  कौर सन्धु
  नम्बर  प्लेट
घुलते हुए बादलों से आसमान मटमैला हो गया था। तेज़ अँधेरी के संग बारिश  होने लगी थी। आम दिनों से थोड़ा ज्यादा ट्रैफिक घीमी रफ़्तार से चल रहा था। अचानक तेज़ी से एक सुनहरी कार मेरे पास से निकली। मेरी सरसरी नज़र उस कार की छह अक्षरों नंबर प्लेट पर गई। एक अनूठे से क्रम में सजे अक्षर LUVSON’ मेरा अवचेतन मन अपनी आदत के  मुताबिक इन अक्षरों में छुपे शब्द जोड़ ढूँढने लगा। समझ आते ही रूह सरशार हो गई। चाहे माँ -बाप के अमूल्य मोह को दर्शाने के लिए किसी प्रमाणित तख्ती की ज़रूरत  नहीं होती, मगर फिर भी पुत्र प्यार को प्रकट करने का यह अनोखा अंदाज़ मेरे मन सागर में रस घोल गया।

       यह सुनहरी कार अब मेरे सामने जा रही थी। मेरी नज़र अब उस कार के पिछले काँच वाली लिखाई पर अटकी हुई थी। मनमोहक फूलों के संग एक नाम, जन्म तथा मृत्यु की तारीख के साथ उकरा हुआ था। "जो उपजै सो बिनसि है "-अभी तो कली ने फूल बन खिलना था। कोई डेढ़ दशक पहले किसी की नन्ही जान अपनी ज़िन्दगी की केवल दस बहार देखकर इस रँगीले जग से रुखसत हो गई थी। ऐसे हुए अनर्थ में असमय चली अँधेरियों की शाँ -शाँ अब मुझे साफ़ सुनाई दे रही थी।
              कुछ पल बाद सुनहरी कार मेरी कार से थोड़ी दूरी पर आ रुकी थी। एक अधेड़ आयु की कमज़ोर- सी दिखती महिला उस कार में से उतरी। वह तो तेज़ कदमों चलती भीड़ में कहीं गुम हो गई थी; मगर उसके जीवन के  पलों की अनदेखी दास्ताँ मेरी आँखों के सम्मुख चित्रित होने लगी थी। कभी वह मुझे ज़िन्दगी के पिघलते किनारों पर खड़ी नज़र आई ,तो कभी उदासी की परतें पलटती। पुत्र की मृत्यु की क्रूर परछाईं ने उसके मन को टुकड़े -टुकड़े कर दिया होगा। उदास तथा पीड़ा भरे रास्तों पर चलती अपने नन्हे को वह अपने अंग -संग महसूस करती होगी। कभी छोटी -छोटी सी शरारतें करते हुए ,तो कभी जवान हुए पुत्र को अपना सहारा बने। 'नानक दुखिया सब संसार' -धन्य है उस माँ का हृदय जिसने यह सब कुछ अपनी रूह पर झेला तथा फिर कैसे यह सब लिखने का हौसला भी किया होगा। यह सच भी तो है कि दुःख बाँटने से कम होता है। उसने तो अपने दुःख की साँझ पूरी दुनिया से पाई थी; ताकि वह अपनी जिन्दा लाश के बोझ को उठाती जीने लायक हो जाए। अश्रु भीगे दिन कुछ आसान हो जाएँ।
         मुझे लगा कि कुदरत भी आज उसके संग मातम मना रही थी। अब बारिश बंद हो गई थी तथा ऊँचा उठा आसमाँ तरो-ताज़ा दिखाई दे रहा था। लगता था कि वह भी रो कर थोड़ा उसके जैसे दुःख के बोझ से हल्का हो गया होगा।
तेज़ हवाएँ
निखरा आसमान
वर्षा के बाद।
-डॉ हरदीप  कौर सन्धु
-0-
2-शशि पाधा
1
बहुत सोचा
अब नहीं छेड़ूँगी
मन का तल
रहने दूँगी
वहाँ रखी निधियाँ
तेरी यादों की
बीते पलों का सुख
साँसों की खुश्बू
गीत -गुंजन
बरसों तक सहेजी
हमारी प्रीत
क्यों डरता है मन
कहीं सेंध न लगे।
 -0-