Tuesday, September 22, 2015

गुलामी का एक दिन

[ यह आयोजन प्रति वर्ष पश्चिमी देशों ( अमेरिका, कैनेडा, ऑस्ट्रेलिया ) में स्कूलों में मनाया जाता है। जब मैंने इसे पहली बार देखा तो मन विचलित हो गया है। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि ये क्या और क्यों हो रहा है ? बच्चों को क्या सिखाया जा रहा है ? क्या उनको ये अहसास करवाया जा रहा है कि गुलामों का जीवन कैसा होता है या गुलामों से कैसा व्यवहार करना चाहिए ? लोगों ने जब इसका विरोध किया तो कुछ स्थानों पर इसे प्रतिबन्धित कर दिया गया है । कहीं यह अब भी जारी है। मैंने अपना फ़र्ज़ जानकर इसकी जानकारी इस हाइबन के रूप में आप सबको दी है। फैसला हमें करना है कि क्या ये सही है या नहीं ?]
डॉ हरदीप कौर सन्धु

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डॉ. हरदीप कौर संधु


सर्दियों की गुनगुनी सी धूप वाली सुबह। घंटी बजते ही विद्यार्थी प्रार्थना सभा के लिए इकट्ठा होने लगे। उनके चेहरों पर सुबह की ताज़गी जैसी चमक थी। आज़ाद हवाओं में फूलों -सी महक थी। सभी इस नए ताज़े दिन को अपने ही रंग में रँगने के लिए तैयार थे। बाहरवीं कक्षा का आज स्कूल में आखिरी दिन था। उनकी आज नीलामी थी। हर विद्यार्थी ने आज का दिन किसी का गुलाम बनकर रहना था -गुलामी के एक दिन जैसे।
    कुछ ही पल के बाद नीलामी शुरू हो गई थी। बावीं कक्षा के विद्यार्थी अपनी-अपनी योगयता को प्रटा करते हुए एक -एक करके अपने -आप को पेश कर रहे थे। एक अध्यापक बोली लगा रहा था। बाकी अध्यापक तथा विद्यार्थी बोली दे कर अपना -अपना गुलाम खरीद रहे थे।एक दिन के लिए बने मालिक अपने गुलामों से मन चाहा काम करवाने की योजना बना रहे थे। 
स्कूल के साझे फंड के लिए पैसा जमा हो रहा था , परन्तु ये घटनाक्रम मेरी सोच को कचोट रहा था। कहते हैं कि अगर हज़ारों वर्ष सूर्य न भी उगे तभी लोग जी लेते हैं ;मगर किसी की गुलामी करना, अपने ज़मीर को मारकर बेगैरत ज़िंदगी का एक दिन भी गुज़ारना बहुत कठिन होता है। गुलामी के कड़वे सच को आँखों से ओझल कर आज अलबेले मनों की सोच को दूषित किया जा रहा था। अब मेरी सोच के तलवे जलने लगे थे। मानव- तिहास को कलंकित करने वाली ब्रिटिश साम्राज्य की कुलटा चाल की पैदायश 'गुलामी' को खत्म करने के लिए एक ओर ढेर कोशिशें हुईं और शायद आज भी हो रही हैं; मगर दूसरी ओर ऐसे दिन मनाकर मानवता को कुचलती विचारधारा को यहाँ आज फिर से जीवित किया जा रहा हैअचानक मुझे किसी पिंजरे में बंद तोते का रुदन सुनाई देने लगा। अब मैं सहज होकर भी सहज नहीं थी।
लम्बी उड़ारी -
पिंजरे वाला तोता
देखे अम्बर।



14 comments:

Amit Agarwal said...

Bahut sundar haiban!

anita manda said...

बहुत अच्छा हाइबन।

ज्योति-कलश said...

सुन्दर किन्तु चकित करने वाला हाइबन !

बहन क्या आज भी इस तरह की परम्पराएँ जीवित हैं ? मार्मिक !!

त्रिवेणी said...

[ यह आयोजन प्रति वर्ष पश्चिमी देशों ( अमेरिका, कैनेडा, ऑस्ट्रेलिया ) में स्कूलों में मनाया जाता है। जब मैंने इसे पहली बार देखा तो मन विचलित हो गया है। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि ये क्या और क्यों हो रहा है ? बच्चों को क्या सिखाया जा रहा है ? क्या उनको ये अहसास करवाया जा रहा है कि गुलामों का जीवन कैसा होता है या गुलामों से कैसा व्यवहार करना चाहिए ? लोगों ने जब इसका विरोध किया तो कुछ स्थानों पर इसे प्रतिबन्धित कर दिया गया है । कहीं यह अब भी जारी है। मैंने अपना फ़र्ज़ जानकर इसकी जानकारी इस हाइबन के रूप में आप सबको दी है। फैसला हमें करना है कि क्या ये सही है या नहीं ?]
डॉ हरदीप कौर सन्धु

Manju Gupta said...

एक पल की गुलामी भी अच्छी नहीं है .
हाइबन में मार्मिक शब्द चित्रण .
बधाई

Pushpa Mehra said...

dasata pratha ka virodh karane ki bhawna se likha gaya haiban vyatha ki katha batata
sandeshprad hai.kuchh panktiyan is prakar hain:
manav-jeevan
bahati ik dhara hai,
bahana hai, bahana hai ise,
ise to bahana hai.

gati hai, tal hai-laya hai
hai laxya bhi;
bandho na ise ,naso na ise
doho na isaki takat ko
nirmal ise rahane do
khul kar ise bahne do.
bandhan- vishhad na do.
pushpa mehra.

kalkal ninad do.

Krishna said...

जानकारी भरा मार्मिक हाइबन...हार्दिक बधाई हरदीप जी।
हाइबन पढ़ कर गुलाम भारत की तस्वीर ताज़ा हो आई।
ऐसी परम्पराओं का विरोध अवश्य होना चाहिए।

Savita Aggarwal said...

हरदीप जी आपने इस हाईबन के द्वारा गुलामी के अहसास का बहुत सुन्दर चित्र खींचा है |इस परम्परा के पीछे क्या सोच रही होगी कहना मुश्किल है |परन्तु कहीं से भी इसे पचाना संभव नहीं है | हाईबन के लिए हार्दिक बधाई |

Dr.Bhawna said...

sundar chitran..badhai..

Madan Mohan Saxena said...

भावपूर्ण प्रस्तुति.बहुत शानदार
कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

jyotsana pardeep said...

hardeep ji badi hi bhaavpurn prastuti ! ...pehle to aap yahin badhai ki paatr ho jaati hain ki humen chaukane wali parampara se avgat karaya ...dasta to pal bhar ki bhi buri hai ....sundar v sandeshprad haiban likhne ke liye bahut -bahut badhai aapko !

Kamla Ghataaura said...


बेमानी परम्पराएँ को निभाते जाना पीड़ाजनक है। उन्ही का नाटक करवा कर विद्यार्थिओं के मन मस्तिष्क को दूषित करने वाला यह कार्य बंद होना चाहिए। गुलामी की पीड़ा को उजागर करने वाला हाइबन बहुत प्रभाव पूर्ण है। हरदीप जी बधाई इस जानकारी भरा हाइबन लिखने के लिए।

सीमा स्‍मृति said...

हरदीप जी आप ने एक नई जानकारी दी, साथ ही साथ इन देशों की मानसिकता का भी चित्रण किया जो विकसित देश हैं। हाइबन की सार्थक एवं अपने आप को उन्‍नत कहने वाले देशों के लिए एक प्रश्‍नचिन्‍ह भी है।

प्रियंका गुप्ता said...

इस हाइबन के माध्यम से आपने एक पीडादायक प्रथा के इस रूप में भी मौजूदगी की यह अनोखी जानकारी दी है...| बहुत सार्थक प्रयास...| इस प्रयास और एक सुन्दर सार्थक रचना के लिए मेरी हार्दिक बधाई...|