Friday, July 31, 2015

606-अपनों की परिभाषा



डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
1

क्या आज हवाएँ हैं

क़ातिल हैं , कितनी

मासूम अदाएँ हैं ।

2

वो साथ हमारे हैं

अम्बर फूल खिले

धरती पर तारे हैं।

3

ख़ुशियाँ तो गाया कर

ज़ख़्मों की टीसें

दिल खूब छुपाया कर ।

4

सब राम हवाले है,

आँखों में पानी

दिल पर क्यों छाले हैं।

5

अब क्या रखते आशा

गैरों से समझी

अपनों की परिभाषा ।

6

मैंने तो मान दिया

क्यों बाबुल तुमने

फिर मेरा दान किया ।

7

मन चैन कहाँ पाए?

इतना बतलाना-

क्यों हम थे बिसराए।

8

ये भी तो सच है ना

चाहा हरजाई

यूँ हार गई मैना ।

9

पीछे कब मुड़ना है

अब परचम अपना

ऊँचे ही उड़ना है ।

10

छोड़ो भी जाने दो

मन की खिड़की से

झोंका इक आने दो ।

11

हाँ ! घोर अँधेरा है

सपनों में मेरे

नज़दीक सवेरा है।

12

सपना जो तोड़ दिया

ज़िद ने हर टुकड़ा

मंज़िल से जोड़ दिया ।

13

मानी है हार नहीं

तेरा साथ मिला

जीवन अब भार नहीं ।

14

ख़ुद को पहचान मिली

बंद - खुली पलकें

तेरी मुस्कान खिली ।

15

कुछ खबर है राहत की

ख़्वाबों में मिलकर

बातें कीं चाहत की ।

-0-

Wednesday, July 29, 2015

भूला गान मिला



डॉभावना कुँअर
1
है मुश्किल राह बड़ी
पर सच की सीढ़ी
सबने कब  यार चढ़ी ।
2
रिश्तों को मान मिला
जैसे कोयल को
फिर भूला गान मिला ।
3
कुछ नीड़ बनाए थे
जिनमें यादों के
पंछी  उड़ आए थे ।
4
खुद से ही कह लेंगे
हम तो मोती हैं
सागर में  रह लेंगे
5
सच की राह न छोड़ें
तूफ़ानों से डरकर
नौका न कभी मोड़े ।
6
रोकर क्या पाओगे
कुछ शुभ कर्म करो
जीवन तर जाओगे
7
विषधर पहचाने हैं-
अच्छा  , कौन बुरा
वो सब ही जाने हैं।
8
अपनों से बच रहना
खोलो  ना पलकें
सपने क्या, मत कहना।
9
यादें मधुर  सजाना
कड़वाहट पीकर
सुख का साज बजाना ।
10
हैं मीठे बोल कहाँ
महक उठे  जीवन
वे पल अनमोल कहाँ ।
11
सब सच्चे मीत गए
सपनों के जैसे
भोर हुई रीत गए ।
-0-

Monday, July 27, 2015

604



1-ज्योत्स्ना प्रदीप
1
पहले- सा ताल नहीं
वो युग बीत गया
सोनी -महिवाल नहीं।
2
अब सब कुछ बदल गया
फूलों -से दिल को
वो पल में मसल गया।
3
ये प्यार शर्ते हैं
जीवन का कर्ज़ा
हम अब तक भरते हैं।
4
अब दिल पर घाव बनें
बाहें ढीली हैं
इनमें न कसाव बनें।
5
टेका मुख बाँहों पर
नम न हुआ वो दिल
बिखरा कुछ राहों पर।
6
मन को अब होश नहीं
रस घन से बहता
मौसम पर रोष नहीं।
7
लो आया जब सावन
आँसू  ले भागा
वो छोटा -सा इक घन।
8
फिर भी कुछ बाकी है
अलकों में उलझी
बूँदें एकाकी हैं
-0-
2-शशि पाधा
1
सावन की बूँद झरी
नैनों की नदिया
कोरों से उमड़ पड़ी।
2
सागर कुछ जाने ना
नदिया के मन की
बूझे, पहचाने ना।
3
कलकल में कहने दो
बहती नदिया को
रोको ना बहने दो।
4
सागर भी मौन खड़ा
स्वागत की घड़ियाँ
प्रिय पथ पर नयन जड़ा।
5
सब लाज शर्म छोड़ी
बहती नदिया ने
निज धार इधर मोड़ी।
6
किरणें मुस्काती हैं
लहरों के धुन में
मल्हारें गाती हैं।
7
चिरबंधन की वेला
नीले अम्बर में
निशि तारों का मेला।
8
मोती अनमोल हुआ
प्रीत पिटारी का
धन से ना मोल हुआ।
-0-

Sunday, July 26, 2015

सुख-दुख साथ जिएँ



प्रियंका गुप्ता
1
रुत बहुत सुहानी है
तुमसे मिलते ही
कलियाँ खिल जानी है ।
2
कितनी सूनी रातें
थोड़ा चैन मिला
पी लीं तेरी बातें ।
3
मुश्किल तो जीना है
तेरा साथ रहे
हर ग़म को पीना है ।
4
सुनसान डगर मेरी
चलते जाना है
तूने अँखियाँ फेरी ।
5
छोटा -सा बच्चा है
बातें समझ -भरी
न अकल का कच्चा है ।
6
काटे जो पेड़ यहाँ
इक दिन होगा वो
ढूँढोगे साँस कहाँ ।
7
जो प्रीत निभाई है
सुख-दुख साथ जिएँ
अब कसम उठाई है ।
8
कब ऐसा था जाना
तुझसे प्रीत हुई
जग लगता बेगाना ।
-0-