Sunday, June 7, 2015

अदृश्य पीड़ा



डॉ हरदीप कौर सन्धु

उसका बदन आज टूट रहा था ..........तन  का दर्द आँखों में से बह रहा था। ऐसा लगता था, जैसे उन आँखों में सूरज डूब चुका  हो। पर वह खामोश पड़ी गहन प्रसव -पीड़ा झेल रही थी। सहनशक्ति  जवाब दे चुकी थी, पर न जाने क्यों फिर भी कैसे वह बिन आवाज़ किए इस पीड़ा को सहन किए जा  रही थी। पास बैठी उसकी माँ ने डॉक्टर को बुलाकर एक बार उसका चेकअप करने के लिए आवेदन किया। दिलासा दे रही डॉक्टर बोली, " अभी बहुत समय है बच्चे के जन्म में …… यहाँ तो चीखें सुनाई देंगी आपको  ……… ये दर्द-पीड़ा  तो अभी कुछ भी नहीं है।"
                   ………मगर दर्द से वह तो हाल- बेहाल हुए जा रही थी। उसकी तो जैसे जान ही निकल रही थी। मगर जब भी दर्द तेज़ होता ,वह अपने होंठों को काटती, अँगड़ाई लेती भीतर ही भीतर दर्द को दबा जाती थी। बदन की पीड़ा की उलझी जुल्फों को कंघी करते वह इस कठिन वक्त के खत्म होने का व्याकुलता से  इंतज़ार कर रही थी। माँ से उसका यह दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहा था। माँ ने फिर डॉक्टर से कहा, " मैं आप जैसी डॉक्टर तो नहीं हूँ ;जो जाँच कर देख लूँ  ………मगर इसकी माँ ज़रूर हूँ  ………मेरी बिटिया की यह असह्य तथा अनकही पीड़ा मुझे दिखाई दे रही है  ………उसके चहरे पर फैली अदृश्य  पीड़ा मुझे अपने पोर -पोर में महसूस हो रही है  ………मेरी लाडो बहुत कष्ट में है  ………इसे भीतर ले जाओ। "
 अनमनी सी डॉक्टर उसको लेबर रूम में ले गई  ………और अगले कुछ ही पलों के बाद बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी। सुंदर लड़का पैदा हुआ था  ………सभी एक -दूजे को बधाई दे रहे थे। माँ डॉक्टर से अपनी बिटिया का हाल पूछती उसके नीरोग होने की दुआ कर रही थी।
लेबर रूम
पीड़ा में तड़पती,
आँखे  पोंछे माँ।
-0-


8 comments:

Amit Agarwal said...

Poignancy of mother's love wonderfully described! Very beautiful haiban, Dr. Sandhu! Felicitations!!

सीमा स्‍मृति said...

उसी माँ ने ही उस प्रवस पीड़ा को इस बच्‍ची के लिए जीया है। मॉं ही बच्‍चों के कहे अनकहे दर्द को इस प्रकार समझ सकती है। फिर एक स्‍त्री से ज्‍यादा इस दर्द को कौन समझ सकता है। आप के हाइबन में हमेशा
ऐसे विष्‍ाय होते हैं जो मन को छू जाते हैं। बहुत सुन्‍दर और भावपूर्ण एहसास ।

Savita Aggarwal said...

बहुत सुन्दर तरीके से प्रसव पीड़ा का वर्णन किया है हार्दिक बधाई |
सविता अग्रवाल"सवि"

Kashmiri lal said...

औरत की पीङ औरत ही जान सकती है । बधाई!

मेरा साहित्य said...

bahan bahut hi sunder likha hai ma se jyda koi nahi samajh sakta aur dekho bahan ek stri hi samajh sakti hai bahan bahut sunderlikha hai
badhai
Rachana

सहज साहित्य said...

हरदीप जी , बेटी की व्याकुल व्यथा माँ से अधिक कोई नहीं जानता , क्योंकि माँ उस असह्य पीड़ा को पीकर ही बेटी को इस दुनिया में लाई है। बेटी की पीड़ा माँ को किस कदर विचलित करती है, यह पाठक माँ के हर संवाद से महसूस करता है । हाइबन के क्षेत्र में संवेदनात्मक साहित्य की यह उपस्थिति भारत के हिन्दी साहित्य की आने वाले समय में उपलब्धि बनने वाली है। बहन सन्धु जी हमें आपकी लेखनी पर फ़क्र है। इसी रौ में लिखती रहिए।
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

ज्योति-कलश said...

बहुत भावपूर्ण ..मर्मस्पर्शी हाइबन ! सच है माँ ..बंद आँखों से भी ..कोसों दूर से भी संतान के कष्ट को जान लेती है ..फिर ..स्वयं अनुभूत पीड़ा को झेलती बेटी की पीड़ा कैसे न समझ आती ...अनुपम अभिव्यक्ति !
साधुवाद ....बहुत शुभ कामनाएँ !!

सादर
ज्योत्स्ना शर्मा

प्रियंका गुप्ता said...

बहुत मर्मस्पर्शी...| हरदीप जी...आपके इस हाइबन ने मेरी स्मृतियों के तार झंकृत कर दिए...| हर वह स्त्री जो इस सर्जनात्मक स्थिति से गुज़र चुकी है और इन पलों में उसे अपनी माँ का सानिध्य मिला है, वह इसमें अपनी झलक अवश्य देखेगी | माँ ही शायद दुनिया की पहली वह इंसान होती है हरेक के जीवन में, जो अपनी संतान के मुस्कराते चेहरे से भी दर्द का सच जान ही लेती है...अनकहा हो तब भी...|

बहुत सुन्दर लिखती हैं आप...| हर बार...बार बार आपकी लेखनी मुग्ध कर जाती है...|
मेरी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ...यूं ही खूबसूरती से रचने के लिए...|