Tuesday, June 30, 2015

चकनाचूर

    अपने एक परिचित साहित्यकार पर लेख लिखना था । उनकी आठ- दस पुस्तकें पूरे मन से पढ़ डाली । पुछ बातें मन में समेट ली और कुछ के संकेत डायरी में लिख लिये । उम्मीद की थी कि लेख बहुत अच्छा बन जाएगा। लिखने बैठा था कि एक निकट के साथी आ पहुँचे। एक के बाद एक बात छौंकने लगे। मैं जितना ही उनका समाधान करना चाहता , वे कोई न कोई नकारात्मक बात फिर छेड़ देते। मैं पूरी तरह आजिज़ आ चुका था। मुझे जो लिखना था, वह मेरे मानस-पटल से पूरी तरह उड़ चुका था। अब बार -बार मुझे 40 -50 पहले की एक घटना याद आ रही थी। तब हमारे गाँव में चूड़ी बेचने वाले आते हैं ।बहुतों के पास साइकिल नहीं होती थी तो वे पोटली कन्धे पर लटकाकर आते थे। एक गाँव वाले ने पोटली पर डण्डा मारकर पूछा-इसमें क्या है? चूडी बेचने वाला बोला –पहले तो कुछ था , अब नहीं कह सकता  कि क्या है? आज मेरी हालत उस चूड़ी बेचने वाले के फेन्चे जैसी थी। 
चकनाचूर -
सतरंगी चूड़ियाँ 
ज़ख्मी है सोच। 
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु 

11 comments:

ज्योति-कलश said...

बहुत रोचक प्रस्तुति ! ईश्वर करे ..किसी प्रकार ..आपके वह साथी और इस प्रवृत्ति के सभी लोग इसे ध्यान से पढ़ें और गुने :)
सुन्दर ,सार्थक हाइबन हेतु बहुत बधाई ,नमन !
सादर
ज्योत्स्ना शर्मा

Kavita Bhatt said...

sundar rachana
badhai, shubhkamna, pranam

kavita bhatt

Krishna said...

बेहद सुन्दर हाइबन.....हार्दिक बधाई!

Pushpa Mehra said...

man ki vedana ko vyakt karata haiban bahut hi achha likha hai.aisi sthiti to harek ke
jeevan mein kabhi-kabhi utpanna ho jati hai. mujhe to yah pankti bahut achhi aursach lagi-

"pahale to kuchh tha,ab nahin kah sakata ki kya hai".
bhai ji apako badhai. pushpa mehra.

Kamla Ghataaura said...

रामेश्वर जी बड़ा रोचक हाइबन है। चूड़ी बेचने वाले की इन पंक्तियाँ ने तो इसे और भी रोचक बना दिया। …
“पहले तो कुछ था अब नही कह सकता कि क्या है।” बहुत बहुत वधाई।

त्रिवेणी said...

ई मेल से आई आदरणीय डॉ भगवतशरण अग्रवाल
बन्धुवर , हाइबन पढ़ा , अच्छा लगा। बधाई !
डॉ भगवतशरण अग्रवाल

Dr.Bhawna said...

bahut rochka laga haiban bahut bahut badhai..aisa kai bar hua mere saath kuchh soch raHE HOTE HAIN OR LOG BAT KAR KAR PAGAL BANA DETE HAIN SAB UD JATA HAI...

Jitendra tayal said...

बडी विकट स्थिती हो काती है कई बार

Kamla Nikhurpa said...


भगवान ही बचाए ऐसे लोगों से ...



चकनाचूर -
सतरंगी चूड़ियाँ
ज़ख्मी है सोच। सुन्दर हाईबन |

Kashmiri lal said...

बिंब और यादों से भरपूर हाईबन

प्रियंका गुप्ता said...

बहुत सटीक वर्णन है...| ज़िंदगी में अक्सर ऐसे लोगों से दो-चार होना पड़ता है जिनका साथ एक अजीब सी ऊब और वितृष्णा पैदा कर देता है...|
खूबसूरत हाइबन...हार्दिक बधाई...|