Wednesday, June 24, 2015

जागीर तुम्हारी !



ताँका :
डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
1
घटाएँ छँटीं
सज गया धनक
मन बावरे !
तेरे हिस्से आई है
फिर भी क्यों कसक ।
2
दिल पे मेरा
बस ही नहीं जब
कैसी लाचारी ?
कहने को मेरा ये,
है जागीर तुम्हारी !
3
नज़रें उठीं
ज्यों चमके सितारे!
झुक ही गईं
लो मेरी निगाहें भी
सजदे में तुम्हारे ।
4
मन-अम्बर
मुहब्बत का चाँद
छुपे न कभी
यूँ ही रूठें , मनाएँ
उन्हें सौ-सौ दुआएँ ।
-0-
सेदोका
डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
1
चाहा अमृत
बदले में उसके
विष ही पीते गए
उनकी ख़ुशी
जीने का मक़सद
यूँ हम जीते गए ।
2
जी चाहे मेरा
बस तेरी ख़ातिर
अम्बर धरा पर
उतार लाऊँ
नभ-गंगा से तेरा
मैं दामन सजाऊँ ।
-0-
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
1
तुझसे अपना नाता
थोड़ा प्यार  हमें
देने में क्या जाता।
2
जिन हाथों तंत्र रहा
शोषण करने का
जेबों में मन्त्र रहा ।
3
सिंहासन डँसते हैं
इसके कोनों में
विषधर ही बसते हैं ।
4
कुर्सी का खेल किया
भूखों को रौंदा
शासन को फेल किया।
-0-

13 comments:

Kamla Ghataaura said...

ज्योत्सना जी ,आज के आपके ताँका और सेदोका नई कल्पनाओं से ओत प्रोत बहुत अच्छे लगे।
जैसे। … दिल पे मेरा बस नही … कहने को मेरा /है जागीर तुम्हारी। दिल में बस गया।
… मुहब्बत का चाँद। … यूँ ही रूठे मनाएं। क्या सुंदर कल्पना की। वधाई हो और सेदोका भी अति भाया ,
जी चाहे मेरा बस। … नभ गंगा से तेरा मैं दमन सजाऊँ। बढ़िया लिखा।
और हिमांशु जी आपके माहिया भी बहुत अच्छे लगे कुर्सी चाहने वालों की असलियत कहते। सुंदर कथन। …
कुर्सी का खेल /भूखों को रौंदा /शासन को फ़ैल किया। … वाह… जिन हाथों तंत्र रहा /शोषण करने का /जेबों में मंत्र रहा /
बहुत बहुत अच्छे लगे। वधाई।
हाइकु ,ताँका ,सेदोका की जैसे परिभाषा त्रिवेणी में सिखाई है। माहिया बारे भी कभी समझाएं। धन्यवाद।

Kashmiri lal said...

Beautiful

Dr.Bhawna said...

tanka sedoka mahiya sabhi bahut pasand aaye meri shubhkamanye..

Savita Aggarwal said...

डॉ ज्योत्स्ना जी और श्री कम्बोज जी आप दोनों के तांका, सदोका और माहिया बहुत मनभावन और प्रेरना देने वाले हैं|हार्दिक बधाई
सविता अग्रवाल "सवि"

anita manda said...

बहुत सुंदर और अर्थपूर्ण रचनाएँ।हार्दिक बधाई।

Pushpa Mehra said...

kuchh bhi pane ke liye sva ko khona , apasi pyar - sauhard kushhal jeevan ki kala hai ise sadaivhar hal mein banaye inhin bhavon ko liye tanka aur sedoka bahut hi achhe likhe hain. sinhasan Dasate hain,isake konon mein vishhdhar hi baste hain.,kursi ka khel,bhukhon ko raunda, shasan ko phel kiya. shasantantra ki nakami par tikhi pratikriya. bahut sunder. bhai kamboj ji va jyotsna ji badhai.
b
pushpa mehra.




Amit Agarwal said...

1. दिल पे मेरा
बस ही नहीं जब...
2. तुझसे अपना नाता
थोड़ा प्यार हमें...
bahut-bahut sundar!
Aap dono ka abhinandan!!

मेरा साहित्य said...

tanka sdoka aur mahiya kya kamal likhiye hain aapdono ki lekhni ko naman
rachana

jyotsana pardeep said...

सिंहासन डँसते हैं
इसके कोनों में
विषधर ही बसते हैं ।
khoobsurat rachnaayen!bahut sateek v arthpurn panktiyaan ....aadarniya himanshuji ko naman!...badhai bhi sundar rachnao ke liye .

jyotsana pardeep said...

दिल पे मेरा
बस ही नहीं जब
कैसी लाचारी ?
कहने को मेरा ये,
है जागीर तुम्हारी !jyotsna ji !sabhi rachnaye pyaari lagi..kitna sahi kaha aapne....dil pe mera bas nahin" ..... badi khoobsurtee se bhi.....naman ke saath badhai bhi sweekare.

ज्योति-कलश said...


यथार्थ कहते सुन्दर माहिया ...
माहिया के माध्यम से सुन्दर कटाक्ष किया गया है !हार्दिक बधाई !
आदरणीय काम्बोज जी के प्रति नमन वंदन !

यहाँ मेरी रचनाओं को स्थान देने के लिए संपादक द्वय की बहुत आभारी हूँ |
सुन्दर प्रतिक्रियाओं से मेरा उत्साहवर्धन करने के लिए आप सभी सहृदयों का भी बहुत-बहुत आभार !


Ramesh Gautam said...

बहुत सुंदर और अर्थपूर्ण रचनाएँ।हार्दिक बधाई।

प्रियंका गुप्ता said...

सुन्दर तांका और सेदोका के लिए बहुत बधाई...|
आदरणीय काम्बोज अंकल ने आज की राजनीति को अपने माहिया के माध्यम से बहुत अच्छे से बेनकाब किया है...हार्दिक बधाई...|