Monday, May 4, 2015

बिखरा फूल



                   डॉ. हरदीप कौर सन्धु
                        छोटी -छोटी सी बूँदों की बारिश थी  ....... मगर तेज़ हवा चलने के कारण वृक्ष तेज़ी से झूल रहे थे। तभी अचानक 'कड़क' से कुछ टूटने की आवाज़ सुनाई दी। हाथ में पकड़ी किताब मेज़ पर रखकर मैं बाहर देखने गई। बगीचे में लगा एक सुंदर से पत्तों वाला  सदा- बहार पौधा  तने से ही टूट गया था। कलम द्वारा लगने वाले इस पौधे  को गहरा गड्ढा खोदकर दोबारा लगाया तथा फिर मैं घर के दूसरे काम निपटाने में व्यस्त हो गई।  फुर्सत मिलते ही अधूरी छोड़ी कहानी पढ़ने का ख्याल आया। मगर कैसे पढ़ती ……चश्मे वाली डिब्बी में से चश्मा गायब था। मेज़ पर सरसरी नज़र डाली परन्तु चश्मा दिखाई नहीं दिया। दूसरे कमरों में ढूँढा, मगर ना-कामयाब ! फिर क्या था.........घर का कोना -कोना देख लिया मगर चश्मा लापता था। पता नहीं इसे ज़मीन खा गई थी या आसमान निगल गया था।

                   चश्मा गुम होने के कारण मेरे कामों  में रुकावट आ रही थी ………बार -बार ध्यान जो उखड़ रहा था कि चश्मा आखिर गया तो कहाँ गया ? दिन अपनी आखरी डगर पर चल रहा था कि अचानक एक धुपीले से ख्याल ने मेरे मन के द्वार पर दस्तक दी। मेरे चश्मे वाली डिब्बी के पास पड़ी मेरे पती के चश्मे वाली डिब्बी को खोलना मुझे आश्चर्य में डाल गया। अरे .......... ये क्या ? एक ही डिब्बी में दो चश्मे ? बहुत देर संस्मरण को पुकारने पर भी कुछ याद नहीं आया। मेरी चेतना के पन्नों से अभी भी वो पल मनफ़ी था जिस पल में मैंने अपना चश्मा दूसरी डिब्बी में डाल दिया था।

          आज मेरी हालत भी इस सदा -बहार पौधे जैसी थी जिस पर चाहे पतझड़ तो नहीं आती, मगर इसकी समय पर काँछाँट तथा किसी अस्थायी सहारे की  कमी  के कारण अनगिनत पत्तों तथा टहनियों के बोझ को न सहारता इसका तना झुकते  -झुकते टूट ही गया। कभी खत्म न होने वाली दिनचर्या  की उलझनों से राहत पाने के लिए किसी संदली फ़िज़ा में उड़ान भरकर अपनी थकी चेतना के पन्नों का नवीनीकरण अब बहुत ज़रूरी लगने लगा था।

              ते हवाएँ -

                   झुकती टहनियाँ

                   बिखरा फूल।

                                      -डॉ. हरदीप कौर सन्धु

13 comments:

Amit Agarwal said...

Very beautiful haiban, Dr. Sandhu!
Best wishes..

jyotsana pardeep said...

sundar srajan...bahut -bahut shubhkaamnaye hardeep ji.

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

सचमुच! हमारा मन भी धुलाई-मँजाई माँगता है। हमारी चेतना के थकते, मद्धिम पड़ते तन्तु निश्चित ही नवीनीकरण चाहते हैं।
सुंदर! दिल को छू गया हाइबन... हरदीप जी !
हार्दिक बधाई आपको !

~सादर
अनिता ललित

Pushpa Mehra said...

dainik kartavyon ke bojh se thaka tan man ko bhi thaka deta hai.hamara avachetan man vishranti chahata hai, aisa na hone se hi ye bhul hona svabhavik hai.apka likha
haiban sandesh de raha hai ki hame chetan man kisi bhi prakar ke tanav se mukti deni hi chahiye. manoranjan ki kriyaen hi isamen sahayak hongi badhati umr aur karyadhiky se pare man ko tarotaja rakhane ka ek yahi upay apane kitani sunderta se nirupit kiya hai!bahan hardeep ji apako badhai.
b pushpa mehra.

मेरा साहित्य said...

bahan aesa hi haal mera bhi hai kitni baat aesa ho chuaa ka
shayad man kamjor hone laga hai
bahut khoob likha aapne
badhai
rachana

Shashi Padha said...

कितनी बार ऐसा हमारेसाथ भी होता है | मन एक मस्तिष्क एक लेकिन काम अनेक और उन्हें सहेजते सहेजते सब उल्टा पुल्टा हो जाता है | कितनी सहज बात आपने सुन्दर शब्दों में कही | बधाई |

( मैं तो कई बार मसालेदानी फ्रिज में रखने चली जाती हूँ या माक्रोवेव में | हैं ना मन की अजब उड़ान)

सहज साहित्य said...

'बिखरा फूल' कठिन विषय पर लिखा व्यावहारिक हाइबन है । व्यस्तता , तनाव, किसी एक वस्तु/ घटना पर ध्यान केन्द्रित होने के कारण ये परिस्थितियाँ आ जाती हैं। सुख और दु:ख की अतिरेक स्थिति भी ऐसा कर देती है। चश्मा , पेन और रूमाल इसके बहुत शिकार होते हैं। मैं तो कान पर रखी पेन्सिल को ढूँढ़ने या माथे पर चढ़ाए चश्मे को तलाशने में कई बार समय बर्बाद कर चुका हूँ। डॉ सुधा गुप्ता जी और बहन डॉ हरदीप सन्धु ने इस विधा को भी प्राणवन्त कर दिया है। नवीनतम विषय की प्रस्तुति आपकी पहचान बन गई है । हार्दिक बधाई !!
रामेश्वर काम्बोज

Kamla Nikhurpa said...

मन को छू गई डॉक्टर संधूजी की रचना ।। हम सब की एक जैसी स्थितियां एक नाव में बैठे मुसाफिरों की तरह ।। यहां भी तेज रफ़्तार की उड़ान कभी सब्जी जला देती है तो कभी दूध उफन जाता है तब याद आतें है बचपन की वो बेफिक्र सुबह और मस्ती भरी साँझ तब दिन कितने बड़े हुआ करते थे कितने सरे खेल खिलौने और नटखट नन्हे मित्र .....अब पूरा हफ्ता गुजर जाता है और हम पैरों में पहिए बांधे भागते ही रहते है......पर जिंदगी दो पल सुस्ताने का मौका ही नहीं देती

सीमा स्‍मृति said...

आज मेरी हालत भी इस सदा -बहार पौधे जैसी थी जिस पर चाहे पतझड़ तो नहीं आती, मगर इसकी समय पर काँट –छाँट तथा------------हरदीप जी
कहीं ना कहीं हम सभी एक ऐसा ही हिस्‍सा जी रहे हैं।आप की सुन्‍दर चित्रात्‍मक शैली ने इसे मन मेें उतार दिया। सुन्‍दर प्रस्‍तुति के लिए हार्दिक बधाई।

Krishna said...


बहुत बढ़िया हाइबन.....बधाई हरदीप जी!
अभी कुछ दिन पहले मैंने भी ऐसी ही स्थिति को झेला। रसोई में काम करते-करते ख़्याल आया कि आज तो बैंक के ज़रूरी काम निपटाने जाना था। रसोई का काम छोड़ जल्दी से ज़रूरी कागज़-पत्रों को एक बैग में रखा और बैग कांधे पे टाँग लिया। चलने लगी तो याद आया अलमारी का ताला और रसोई की गैस चैक कर लूँ सब ठीक से बंद तो है। अंत में घर का दरवाज़ा बंद करते हुए हाथ खाली दिखे तो लगा बैग तो लिया ही नहीं। भीतर जा एक से दूसरे कमरे में बैग तब तक ढूँढती रही जब तक ख़ुद ही झूल कर आगे आए बैग ने यह नहीं बताया कि मैं तो तुम्हारे कांधे पर ही हूँ। ख़ुद पर बहुत खीझ आई। और यह सोच कर हँसी भी आई कि मस्तिष्क भी क्या सोचता होगा किस पगली के कांधों पर खड़ा हूँ।

haiku lok said...

सभी दोस्तों का बहुत -बहुत धन्यवाद हाइबन को पसंद करने के लिए।
एक साधारण सी बात पर लिखे इस हाइबन में एक -एक करके सभी शामिल हो गए। सभी को ऐसा बहुत कुछ याद आ गया जो वे साँझा चाहते तो थे मगर कर नहीं पाए। इस हाइबन ने सभी के छुपे भावों को हमारे तक पहुँचाया है। अपनी -अपनी बात कहने के लिए फिर से आभार।

हरदीप

ज्योति-कलश said...

जीवन की उधेड़बुन में खुद को खो बैठी चेतना को संजीवनी देता हाइबन....कमोबेश यही हाल है किन्तु मनोभावों की ऐसी अभिव्यक्ति भी सरल नहीं है |मन को छू लेने वाली प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई डॉ. सन्धु !!

प्रियंका गुप्ता said...

अपने ही आसपास बिखरी किसी छोटी लगने वाली बात पर भी आप कितना सटीक और सुन्दर लिख लेती हैं हरदीप जी...| सौ कामों में एकसाथ उलझा यह मन अक्सर ऐसा कुछ करता ही रहता है जिस पर कभी तो खीझ होती है तो कभी चेहरे पर एक मुस्कराहट भी आ जाती है, लेकिन कितनी बार इन पर विचार करना भी बेहद ज़रूरी होता है...|
बहुत अच्छा हाइबन है...हार्दिक बधाई...|