Tuesday, April 28, 2015

नाक का सवाल



1-नाक का  सवाल
सपना मांगलिक
        ई- शादी होकर आगरा आई ।जिस रिश्तेदार ने मेरा सम्बन्ध कराया था ,उन्होंने एक दिन अपने घर खाने पर बुलाया ।अचानक उन्होंने बताया कि आज वह अपने एक मित्र के साथ मुर्गेवाजी देखने जाएँगे ।मैं चौंक उठी ;क्योंकि यह शब्द पहले मेरे संज्ञान में नहीं आया था ।मेरी उत्सुकता भाँकर  उन्होंने मुझे भी अपने साथ ले लिया हम आगरा के मुस्लिम बहुल इलाके में पहुँचे ।ये बहुत भीभाड़- भरा पुराना बाज़ार नजर आ रहा था ।जगह- जगह जालियों में बंद मुर्गे ऐसे लग रहे थे ,जैसे किसी ने उन्हें जबरन बेतरतीब  ठूँस दिया हो ।ऊपर कुछ सींखचों में त्वचा विहीन जीव लटके हुए थे और खासी दुर्गन्ध छोड़ रहे थे ।खैर हम पैदल चलते चलते एक अखाड़ेनुमा जगह में पहुँचे जहाँ गोलाई में भीड़ जमा थी और अत्यधिक  चीख चिल्लाहट हो रही थी ।हमने भी अपनी जगह सँभाल ली और मुर्गेवाजी देखने लगे ।दो मोटे -मोटे मुर्गे एक दूसरे पर अपनी चोंच से कभी प्रहार करते ,तो कभी एक दूसरे पर चढ़ने की कोशिश करते ।इस कोशिश में उन दोनों के पंख यहाँ- वहाँ बिखरने लगे थे ।मुर्गों के मालिक झुम्मन और नौशाब उत्तेजित होकर अपने- अपने मुर्गे को और आक्रामक होने के लिए तेज आवा में उकसा रहे थे और भद्दी -भद्दी गालियों का प्रयोग भी जमकर कर रहे थे ।मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुर्गे लवाकर किसको फायदा होने वाला है ?तभी एक सज्जन ने बताया कि मुर्गों पर दाव लगे हुए हैं ;जो मुर्गा जीतेगा उसके मालिक का हफ्ते भर दारू का इंतजाम हो जाएगा ।मैं यही सोच रही थी कि एक तेज़ जश्ननुमा शोर सुनाई दिया- झुम्मन का मुर्गा जीत गया झुम्मन को साथियों ने कंधे पर उठा लिया था ।उधर नौशाब ने एक करारी लात अपने निढाल हारे हुए मुर्गे पर मारी ,मुर्गा किंकियाने लगा ।और नौशाब मुर्गे को गालिया देते हुए- आज तेरा कीमा बनाकर खाऊँगा अहसान फरामोश ,नाक कटा के रख दी मियाँ के आगे  और निरीह मुर्गा दाएँ से बाएँ और बाएँ से दाएँ अपनी गर्दन जल्दी जल्दी हिलाते हुए मानो कह रहा हो  
       बेजुबाँ पर

     तरस तुम खाओ

  मत सताओ
   -0-                                                             
0-
2-किसकी हार
सपना मांगलिक
        मेरे तीन वर्षीय पुत्र का दाखिला मैं मिशनरी स्कूल में करवाने को पाप बेल रही थी ।बच्चे को चार चार घंटे सुबह शाम पढ़ाना ।मगर मेरा पुत्र जो कि अत्यधिक सक्रियता की परेशानी से ग्रस्त है और  अपना एक जगह ध्यान स्थिर करने में असमर्थ भी उसे एडमिशन की समस्याओं का रत्तीभर इल्म नहीं था ।वह तो हमेशा की तरह दौभाग ,तोड़ा- फोड़ी आदि की  शरारतों में अपना ध्यान ज्यादा केन्द्रित करता ।बड़ी मेहनत से उसको संभावित प्रश्नों के उत्तर रटवाए और नियत तिथि को  इंटरव्यू के लिए स्कूल गए टीचर के पूछे प्रश्नों का जवाब देने के स्थान पर उसने वहाँ रखी चीजें लेकर भागना और हर सवाल जिसके उसे जवाब मैंने अच्छी तरह से रटा रखे थे ,उनके जवाब में स्वभाव के अनुसार नहीं ,नहीं कहना शुरू कर दिया ।इंटरव्यू बहुत बुरा गया ।बाकी बच्चों के माता पिता और शिक्षकों के सामने में अपमानित-सा महसूस कर रही थीमुझे लगा जैसे मैं बुरी तरह से हरा दी ग हूँ।मैंने घर लौटते ही उस मासूम बुरी तरह झल्लाने लगी और उसको तीन- चार थप्पड़ भी जड़ दिए । वह सहम गया और मुझे खुश करने के लिए मुझे छूने की और प्यार करने की कोशिश करने लगा ।मगर जैसे ही वो मुझे  छूता,मैं उसका हाथ झटक देती और उससे कहती आप मेरे बेटे नहीं हो ।जाओ यहाँ से ,अब तुम्हे कुछ नहीं मिलेगा ,मम्मा कभी तुमसे बात नहीं करेगी ।उसदिन वह धम कम कर रहा था और करते वक्त कनखियों से मुझे नोटिस कर रहा था कि कहीं मैं उसे पीट तो नहीं दूँगी ।उस दिन उसके चेहरे पर बिलकुल भी हँसी नहीं दिखी ।शाम को जब मैंने उसे खाने की प्लेट दी, तो वह मुझे परेशान करने के लिए भागा नहीं ।और प्लेट से रोटी तोड़ने की असफल कोशिश करने लगा ।इतने घंटों बाद मैंने उसे ध्यान से देखा ,वह चुपके चुपके मेरी भाव भंगिमा नोट कर रहा था और उसकी आँखों में  आँसू तैर रहे थे । मानो कहना चाहता हो
                  मत झल्लाओ

               बस प्यार ही जानूँ

                   गले लगाओ  ॥                               
-एफ-659 कमला नगर आगरा 282005

  ईमेल sapna8manglik@gmail
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Saturday, April 25, 2015

-दोष किसका



1-चोका
    
रचना श्रीवास्तव

नदी सिमटी
बन गयी नाला वो
दोष किसका ?
पूछती है हमसे
जल के बिना
धरा जल जाएगी
सूखेंगे बीज
फूटेगा न अंकुर
प्यासे कुएँ भी
फैला अपने हाथ
माँगेंगे भीख
एक -एक साँस की
रोएँगे पंछी
चिटकेंगे तालाब
पानी की बूँद
ढूँढेगा सावन भी
फटेंगे होंठ
माँगेगी  चैपस्टिक
वो खुश्क  हवा
क्या कहोगे उससे ?
चेतो मानव
लालच का खप्पर
तोड़ दो अभी
इससे पहले के
घरती पूछे -
मै तो सुहागन थी
भरी थी माँ
क्यों तुमने विधवा
मुझको कर दिया?
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 2-सेदोका  
कमला घाटाऔरा
1
पृथ्वी दिवस
कैसे करें पूजन
रक्तरंगे हाथों से ,
बेखौफ़  हम
देते दर्द जिसको 
काट वन -पर्वत।
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Friday, April 24, 2015

हाइबन -चोका



 1- हाइबन

डा सुरेन्द्र वर्मा 
1- महिष गाए,

मंदसौर मध्य प्रदेश का एक छोटा सा नगर है। उन दिनों मैं वहाँ महाविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में पदस्थ था। एक नए, अधूरे बने, किराए के मकान में वहाँ टेकरी पर रहता था। सामने वाली सड़क से सब्जी-मंडी में सब्जी पहुँचाने के लिए भैसों पर सब्जी लादकर किसान भाई सुबह सुबह निकलते थे। उनके बगल में ट्रांजिस्टर दबा रहता था और वे गाने सुनते जाते थे। बड़ा मजेदार दृश्य होता था। एक दिन सुबह पानी बरस रहा था। क्या देखता हूँ कि भैंस के ऊपर छाता लगा है और ट्रांजिस्टर बदस्तूर गाने उगल रहा है। सरसरी नज़र से बस यही प्रतीत हुआ।  वस्तुत: भैस पर लदी सब्जी के ऊपर किसान छाता लगाकर बैठ गया था जिससे उसका पूरा शरीर ढक गया था। लगता था भैस ने ही छतरी लगा रखी है और वही गाना सुन रही है। कहावत तो यह है, भैंस के आगे बीन बजाए, भैस खडी पगुराए! लेकिन यहाँ तो
महिष गाए,
वर्षा में पीठ पर
छाता लगाए।
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2- जूते गायब
मंदसौर और उसके आसपास जैनियों की अच्छी-खासी संख्या है। वहाँ जैन धर्म पर प्राय: प्रवचन आदि आयोजित होते रहते थे। मैं क्योंकि दर्शनशास्त्र का प्राध्यापक था , मुझे भी ऐसे समारोहों में शिरकत करने का अक्सर मौका मिल जाता था। एक बार जैन दर्शन के व्रतों पर धारावाहिक आयोजन किया गया। प्रतिदिन किसी एक व्रत पर चर्चा के लिए किसी विद्वान् को आमंत्रित किया जाता था। मुझसे कहा गया कि मैं अस्तेय पर बोलूँ। ऐसे समारोहों में खूब भीड़ इकट्ठी हुआ करती थी। मैं जब पहुँचा हॉल खचाखच भरा हुआ था। प्रसन्नता भी हुई कि आज भी नैतिक सद्गुणों में रुचि लेने वाले लोग मौजूद हैं और इतनी संख्या में उपस्थित हैं। बहरहाल भाषण हुआ, तालियाँ पिटीं और वापस जाने के लिए जब स्टेज की नीचे जहाँ मैंने अपने जूते उतारे थे ,उन्हें ढूँढ़ने लगा तो वे सिरे से गायब थे। बेचारे आयोजक बहुत दु:खी हुए। जूतों की काफी तलाश की गई; लेकिन वे मिल न सके। मैंने कहा आप परेशान न हों। भीड़-भाड़ में ऐसी वारदात हो ही जाती हैं। कार में नंगे पाँव भी बैठ जाऊँगा तो भी किसी को क्या पता चलेगा!   बहरहाल
भाषण हुआ
अचौर्य पे,लौटा तो
जूते गायब ।
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2-चोका
सपना मांगलिक



पथ दुर्गम

कितना हो बेशक

प्राण दीपक

मैं जलाती  जाऊँगी

तनिक भी न

अब घबराऊँगी

तोड़ डालूँगी

मुश्किलों के पत्थर

सोख लूँगी मैं

नाकामी का समुद्र

जली आग है

सीने में जूनून की

पलट रुख

तूफानों का रखूँगी

नहीं डरूँगी

पथ से इतर मैं

नहीं हटूँगी

बनाके रस्सी

हौसलों के जूट से

चढूँगी फिर

ख्वाबों की ऊँचाई पे

थोडा । हँसूँगी

रो लूँगी फिर थोड़ा

थाम रखूँगी

भावनाओं का ज्वर

चढ़ने दूँगी

न सर पे अपने

नहीं गिरूँगी

वहीं रुकी रहूँगी

विजय की चोटी पे ।

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एफ-659 कमला नगर आगरा 282005

ईमेल sapna8manglik@gmail.