Thursday, April 2, 2015

खिलती सृष्टि



1-हाइबन
डॉ.हरदीप कौर सन्धु

धुआँ- धुआँ-सा ………अनमना-सा  मौसम ……… उस के मन की यही हालत थी उस दिन। वह बहुत कमज़ोर दिखाई दे रहा था। किसी शारीरिक पीड़ा ने उसको निचोड़-सा दिया था। हर तरफ़ से नाता तोड़कर उसने जीवन को एक अँधेरी गुफ़ा जैसा बना लिया था। किसी ओर से रौशनी की लौ नज़र नहीं आ रही थी।
              उसके पास बैठते ही मेरी यादों का वेग अचानक बहने लगा …… बचपन में किसी छोटी-मोटी चोट की तो वह परवाह ही न करता था  .......... अगर कभी कुछ ज्यादा ही लग जाती ,तो मिट्टी लगाकर ठीक कर लेता था। बहुत ही शरारती था वह कद्दू -सा। कद्दूआ ओए या टोएँ टोएँ टोएँ टोएँ टोएँ की आवाज़ सुनते ही दौड़ते हुए आते की एड़ी की धमक आज भी कहीं सुनाई दे रही है आँगन में से। कहीं खुद फोटो खींचने की मनाही से रूठा हुआ ओटे के पास खड़ा दिखाई दिया  .......... और आम को चूसकर, उसमें फिर से हवा भर फुलाकर चुपके से रख देने वाली मीठी -सी शरारतों से आज भी रूह रससिक्त तथा सुगन्धित हो गई।
          किसी का दर्द तो आज भी उससे देखा नहीं जाता ....... मोह के रिश्तों की वफ़ा निभाता अपनी जेब से खर्च कर आता है अनजान राहगीरों पर भी । अनोखी जानकारी इकट्ठा करने के सुहाने रास्ते पर चलने की आदत लाजवाब बना देती है उसको ………कहता है कि दुनिया के सभी महान् व्यक्ति आजानुबाहु (जिनकी बाहों की लम्बाई उनके घुटनों तक होती है) होते हैं ………और फिर दुनिया के भूगोल, किसानी तथा राजनीति के बारे में उसकी कभी खत्म न होने वाली बातें सुनते हुए ऐसा लगता है- जैसे ताज़ा पानी प्यासी फसलों की सिंचाई कर रहा हो।
        मौत जैसे क्रूर हादसों को बहुत निकट से देखते हुए……कभी कभी निराशा का पल्लू भारी हो जाता है, " ......वो बेचारा तो ऐसे ही इस जहाँ से चला गया……… और मैं बच गया ?"
           ओ पगले तुझे कैसे समझाऊँ कि तुझे दिल दरिया और गैरतमंद फिज़ा ने पाला-पोसा है.…… तुझे चाहने वालों की दुआओं में तेरा नाम सबसे ऊपर आता है .......... दवा से दुआएँ ज्यादा असरदार होती हैं ……तेरी हर ख़ुशी के लिए किए सजदे व्यर्थ कैसे जा सकते थे …… रब से की दुआएँ जब कई -कई गुना होकर तुझे लगीं तो तू ठीक कैसे न होता .......... तुझे तो  स्वस्थ होना ही था।
         उसकी आँखें में अब नमी थी और चमक भी ……… जैसे ओस पर सूरज चमक रहा हो।  उदासी का धुआँ-सा अब छँट चुका था।मन के मौसम का खिलना स्वाभाविक था और लाज़िमी भी। माँ ने मोह का मीठा डालकर बनाया केक जो सामने ला रखा था।
बदली दृष्टि
पुलकित कोपलें
खिलती  सृष्टि ।
-0-

2-माहिया


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1
जब ध्यान लगाया है,
सपनों तक में भी
केवल तू  आया है ।
2
हर रोज़ सज़ा देना,
मेरे अपनों को
मत दर्द खुदा देना ।
3
अँधियारे छलते हैं,
दीपक यादों के
बुझते कब, जलते हैं।
4
जिस दर पे जाएँगे,
तुमको खोकरके
हम चैन न पाएँगे ।
5
जब शीश झुकाया है,
दिल के शीशे में
तुमको ही पाया है ।
6
पाहन का दौर चला,
पूजा था जिसको,
उसने हर बार छला ।
7
क्यों इतनी दूर गए?
मिलने की आशा
कर चकनाचूर गए ।
8
हमको हर बार मिली,
घर के आँगन में
ऊँची दीवार मिली ।
9
कब प्यार उसे भाया,
जिसके  बागों में
नफ़रत का हो साया ।
10
चिट्ठी जब खोली थी;
आखर की  चुप्पी
रह -रहकर बोली थी।
11
बाज़ार तुम्हारा है,
सब कुछ बेच रहे,
क्या काम हमारा है ।
12
दिन-रात हमें काटा
दर्द हमें देकर
सुख गैरों को बाँटा ।
-0-

12 comments:

Amit Agarwal said...

जिसे आप 'गुस्ताखी' कह रहे हैं वह असल में 'सोने पे सुहागा' है!
Icing on the cake, indeed!
सम्मोहक सम्मिश्रण!
मज़ा आ गया!

ज्योति-कलश said...

भाषा ,भाव और शैली हर दृष्टि से दोनों रचनाएँ अनुपम हैं ....
आत्मा तक को तृप्त करता हाइबन ...सुन्दर ,सार्थक हाइकु !

मौन आखरों की मन को छू लेती सदाएँ , बेदर्द बाज़ार ..फिर भी ...

हर रोज़ सज़ा देना,
मेरे अपनों को
मत दर्द खुदा देना .....ऐसी प्रार्थनाएँ !!

...जी चाहता है ..ऐसी गुस्ताखियाँ ..बार बार सामने आएँ :)

सादर
ज्योत्स्ना शर्मा

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

सुंदर भावपूर्ण हाइबन हरदीप जी!
माहिया...एक से बढ़कर एक! बहुत-बहुत-बहुत बढ़िया! दिल को छूते हुए बहुत गहरे उतर गए... भैया जी !
आप दोनों को हार्दिक बधाई! सादर नमन !

(यदि ये गुस्ताखियाँ हैं तो ऐसी गुस्ताखियाँ जल्दी-जल्दी हों!--इन्हीं शुभकामनाओं सहित !)

~सादर
अनिता ललित

Kashmiri lal said...

Both articles keep some hidden meanings
Chawla

Kavita Bhatt said...

दोनों ही रचनाकारों ने मन के भावो को शब्द-श्रृंखला में गूंथकर भाव-विभोर कर दिया
सुन्दर............
पाहन का दौर चला,
पूजा था जिसको,
उसने हर बार छला ।
सबसे अच्छी पंक्तियाँ
डॉ. कविता भट्ट

सुरेन्द्र वर्मा said...

सुरेन्द्र वर्मा. सुन्दर भावपूर्ण माहिया. उतना ही सशक्त हाइबन .आप दोनों को बधाई.सुरेन्द्र वर्मा

Pushpa Mehra said...

mahiya aur haiban donon bahut hi bhavpurn hain .bahan hardeep ji va bhai kamboj ji ko hardik badhai.
pushpa mehra. b

Dr.Bhawna said...

चिट्ठी जब खोली थी;
आखर की चुप्पी
रह -रहकर बोली थी।

Kamboj ji aapke mahiya man men bas gaye bahut gahan utarkar aapne ye mahiya likhe mujhe ye mahiya bahut hi chu par sabkuchh bolta laga..itne gahan chinatan manan or fir lekhn ke liye aapko hardik badhai...
kai din se mobile se try kar rahi thi tipanni karne ka par har bar atak jaati thi na jane kayon tirveni par hi ye problem aati hai haiku par nahi hoti ye problem..deri se aane ke liye sorry...yun hi likhte rahiye...

सहज साहित्य said...

आत्मीयतापूर्ण इस प्रोत्साहन के लिए आप सबका हृदय से आभारी हूँ।
-रामेश्वर काम्बोज

jyotsana pardeep said...

sundar v bhaavpurn haiban hardeep ji ..sadar naman.

jyotsana pardeep said...

पाहन का दौर चला,
पूजा था जिसको,
उसने हर बार छला ।
चिट्ठी जब खोली थी;
आखर की चुप्पी
रह -रहकर बोली थी।anupam rachna ..har tarah se lubhane wali..sadar naman bhaiya ji .

प्रियंका गुप्ता said...

अगर इसे आप लोग गुस्ताखी कहते हैं तो फिर तो मेरा एक विनम्र निवेदन- ऐसी प्यारी गुस्ताखियाँ हमेशा होती रहे...|
हरदीप जी का हाइबन एक तरफ मन भिगो गया, दूसरी और आदरणीय काम्बोज जी के अप्रतिम माहिया के विषय में मैं तारीफ़ के उपयुक्त शब्द ढूँढने की कोशिश कर रही...|
बस एक शब्द शायद मेरी भावनाएँ प्रकट कर दे...वाह !