Tuesday, March 3, 2015

प्यारा सा रिश्ता



डॉ हरदीप सन्धु
ढलती शाम सुहाना सा मौसम। मैं उसके संग चाय पीने के हार्दिक बुलावे को न चाहते हुए भी अनचाही मसरूफियत के कारण एक लम्बे समय से नकारती आ रही थी। मगर आज वह अपने मोहित बुलावे की कशिश का  सदका जीत गई थी। मीठी सी ख़ुशी की चमक उसकी आँखों में थी। खुद -ब- खुद खुश हुए बोल लबों पर थिरक रहे थे। उसने किसी अलौकिक ख़ुशी में झूमते हुए सबसे पहले मुझे अपने घर का कोना-कोना दिखाया। उसके घर का नवीनीकरण होने की वजह से घर का सामान एक और समेटा पड़ा था।
           बरामदे में वक्ती तौर   पर बनाया गया ड्रॉइंग रूम चाहे छोटा -सा था ; मगर जब मन का आँगन बड़ा हो तो जगह की कमी नहीं खटकती।बाहर बैठकर चाय पीने का अपना ही लुत्फ़ था। अदरक वाली चाय की चुस्कियाँ लेते मुझे वह पल याद आया जब मैंने उसे पहली बार देखा था। अपनी छवि तथा पहनावे से वह भारतीय नहीं लग रही थी। बात भी अनजान- सी विदेशी भाषा में ही हुई थी। या तो उसका रब ही जनता था कि वह अपना भारतीय होना दिखाना ही नहीं चाहती थी या फिर देखने वालों की नज़रों का कोई भ्रम था। मगर मेरा दिल उसके पंजाबी होने की गवाही देता था। …… और फिर एक दिन बातें करते हुए आदतन उसकी किसी बात का जवाब पंजाबी में दे दिया था……उस पल के बाद ये विदेशी भाषा हम से कोसों दूर दिखाई दी।
   मेवे  वाली पंजीरी की कटोरी मेरे आगे करते हुए उसने मेरी ध्यान भंग किया। बातों ही बातों में उसकी यादों के तार हिले, " याद है ……एक दिन हम सैर करते हुए मिले थे पंजाबी सूट में बहुत जँच रही थीं आप उस दिन घर आकर अलमारी के  किसी अँधेरे कोने में से निकालर कर जब पंजाबी सूट पहना था, तो अचंभित पतिदेव कहने लगे कि इस परदेस में भूली-भुलाई  हुई इस अनमोल सौगात को याद दिलाने वाला आखिर है कौन?"
    मैं मूक बैठी उसकी न खत्म होने वाली बातें सुनती सोच रही थी कि बाहरी छवि में अन्तर  होने के बावजूद कोई तो समानता है ,जिसने हमें एक डोरी में पिरोया हुआ है। क्या सादगी में अभी भी इतना आकर्षण है ?
 प्यारा सा रिश्ता -
हरे वृक्ष लिपटी
मधुमालती
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4 comments:

ऋता शेखर मधु said...

बहुत प्यारी याद...स्नेह की अनदेखी डोर कभी न कभी दो दिलों को जोड़ ही देती है|

ज्योति-कलश said...

कितनी सहज , सरल , सुन्दर प्रस्तुति !
बेहद आकर्षक ...हार्दिक बधाई !!!

satishrajpushkarana said...

नई विधाओं का अपना महत्त्व है । हरदीप जी का यह अभिनव प्रयोग निश्चित रूप से एक दिन साहिय में अपना स्थान बनाएगा । रिश्तों के कितने प्रकार हो सकते हैं? उन रिश्तों का मूलमन्त्र हमारा कोई भी साम्य बन सकता है ।
हार्दिक बधाई !

jyotsana pardeep said...

aapne badi hi sundarta v sahajta se is rachna ko prastut kiya hai ...hardik badhai hardeep jee.