Friday, March 27, 2015

पहला पाठ (हाइबन)

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु’ 
छोटी सी जगह.……  छोटा सा स्कूल .... जहाँ सबको सबके बारे में छोटी-मोटी जानकारी रहती ।उस स्कूल में एक अध्यापक के रूप में मेरी नई न्युक्ति हुई थी। पढ़ाने के साथ -साथ मेरी एम. ए. की पढ़ाई भी जारी थी।जब भी कोई खाली कालांश होता, मैं अपने अध्ययन में जुट जाता । मेरे छात्र भी मेरी पढ़ाई के बारे में अवगत थे ।सभी छात्रों को कुछ समझ में न आए ,तो कक्षा से बाहर भी पूछने की छूट थी। सबसे युवा शिक्षक होने के कारण और हर समय छात्रों की समस्याओं का निवारण करने के कारण छात्रों को उल्लू गधा आदि विशेषण देने वाले अपने साथियों की आँखों में खटकता था।सीधा-सपाट बोलने की आदत भी इसका कारण थी।छात्रों में मेरी लोकप्रियता ने इस ईर्ष्या को और बढ़ावा दिया था । अपनी ईर्ष्या के कारण एक -दो साथी कुछ न कुछ खुराफ़ात करते रहते, जिसके कारण मैं आहत होता रहता था । इसी कारण स्कूल के खाली समय में मेरी पढ़ाई बाधित होने लगी।कई दिन तक ऐसा हुआ कि मैं पढ़ाई न करके चुपचाप बैठा रहता।मुझे नहीं पता था कि मेरे छात्रों की नज़र मेरी इस उदासीनता पर है । 
        कक्षा आठ की एक छात्रा ने एक दिन हिचकचाते हुए कहा, गुरु जी, आपसे एक बात कहना चाहती हूँ । आप मेरी बात का बुरा तो नहीं मानेंगे।’ कहिए, मैं बुरा नहीं मानूँगा।उसकी हिचक को दूर करने के लिए मैं बोला।  मैं कई दिन से देख रही हूँ कि आप खाली पीरियड में चुपचाप बैठे रहते हैं ।अपनी एम० ए०की तैयारी नहीं करते हैं।शायद इसका कारण हमारे कुछ शिक्षकों द्वारा आपके खिलाफ़ दुष्प्रचार करना है। थोड़ा साँस लेकर वह फिर बोली, आपके इस तरह पढ़ाई छोड़ देने से किसका नुकसान है? सिर्फ़ आपका ! आप  नर हो न निराश करो मन को कविता हमको पढ़ाते रहे हैं और सबकी हिम्मत बढ़ाते रहे हैं ; लेकिन आप खुद क्या कर रहे हैं- कहकर उसने सिर झुका लिया ।
    मेरा चेहरा तमतमा गया । किसी विद्यार्थी की इतनी हिम्मत ! मैंने अपने आवेश को सँभाला और कहा-आज के बाद तुम मुझे खाली समय में चुपचाप बैठा नहीं देखोगी।’ इसके बाद कुछ ऐसा ही हुआ, जिसका परिणाम एम. ए. की परीक्षा में 70 % अंक या प्रथम श्रेणी के रूप में मिला। केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षक और प्राचार्य के रूप में इस उपलब्धि ने मेरा मार्ग सरल किया। नन्हीं छात्रा के इस योगदान को मेरा रोमरोम  आज भी महसूस करता है । मैं उस गुरु के दिए इस पहले  पाठ को कभी नहीं भूला ।
पहला पाठ -
माँ का हाथ पकड़ 
चलना सीखे। 

15 comments:

sunita agarwal said...

प्रणाम भैया ... सच है कब कहा कैसे कौन प्रेरणा बन जाता है कोई नही समझ सकता | आपका ये संस्मरण और हाइकू पढ़ रोम रोम रोमांचित हो गया |

Manju Gupta said...

gharaai lie haiban . chatra ki prenaatmak kathan ne lakshy ko ni unchaai mili .

anmol haibn ke lie badhai .sadr nmn

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

वाह! दिल को छू गया भैया जी!
शिक्षक हो तो आप जैसा! विद्यार्थी हो तो भी आप ही जैसा, जो जीवन-कक्षा में मिले हर पाठ को हृदय से ग्रहण करता हो !
आपको नमन !

सादर
अनिता ललित

Dr. Hardeep Kaur Sandhu said...

किसी नेक तथा संवेदनशील व्यक्ति के बड़प्पन की एक खूबसूरत सी झलक दिखलाता ये हाइबन दिल की गहराइयों को छू गया। अंत में लिखा हाइकु इसको और विशालता प्रदान कर गया। ऐसा इंसान किसी की दी शिक्षा को अनदेखा तथा अनसुना नहीं करता चाहे शिक्षा देने वाला छोटा ही क्यों न हो। यह गुण रामेश्वर जी में कूट -कूट कर भरा हुआ है जो हम जैसे अनजानों को रास्ता दिखलाता है। बेशुमार कीमती हाइबन साँझा करने के लिए आप बधाई के पात्र हैं।

ज्योति-कलश said...

जीवन की पाठशाला में सीखे सबक को हम सब के साथ साझा करता आपका हाइबन अनुपम है !एक शाश्वत सीख हमारे लिए भी कि सीखने और सिखाने के लिए उम्र का कोई बंधन नहीं ..नमन आपकी लेखनी और उन (तब) नन्हीं गुरु को !
सादर
ज्योत्स्ना शर्मा

Amit Agarwal said...

मर्मस्पर्शी संस्मरण और सुन्दर हाइकु के मेल से बना यादगार हाइबन, काम्बोज सर, सिर्फ़ आप ही के लिए नहीं हमारे लिए भी!
अनेक धन्यवाद!

Shashi Padha said...

पहला पाठ
जीवन भर साथ
माँ की आशीष ---
है ना भैया ? शिक्षाप्रद संदेश |
बधाई आपको |

Pushpa Mehra said...

sansmaraN ko jeeta haiku sath liye haiban sixaprad hai.jeevan -pathpar kab-kaun, chota-bada hamara prerak ban guru sam ho jaye kaha nahin ja sakata mhatvkeval di gayi seekh grahan karana hai.jise apane svkara yah apaka badappan hai.
pushpa mehra.

Dr. Surendra Verma said...

एक नन्हीं छात्रा भी गुरु और माँ हो सकती है.लेकिन उसमें गुरु और माँ की छवि देखने वाला ग्राहक भी ज़रूरी है. आप उस छवि के ग्राहक बने. आपको इस पहले पाठ (हाइबन) के लिए बधाई और साधुवाद, सुरेन्द्र वर्मा

Rachana said...

bhaiya isse aapka badappan samne ata hai aap jaesa mahan vyakti hi is baat ko itni sunderta se svkar kar sakta hai
bhaiya ham ko aap se sikhna chahiye ki jyan kahin se mile le lena chachiye
badhai
rachana

Dr.Bhawna said...

bahut hrdysparshi man kuchh pal ke liye shant sa ho gaya....

jyotsana pardeep said...

paak ,pavitr tatha nirmal hridy hi ye sab likh sakta hai ... saty ko sweekaar karne ka jazba har kisi mein nahin hota ...sach mein bhaiya ji ..aap pujniy tatha anukarniy hai...naman hai aapke mataji evam pitaji ko jinki aap santaan hai ...naman hai aapkee lekhni ko....

प्रियंका गुप्ता said...
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प्रियंका गुप्ता said...

कई बार हम जान भी नहीं पाते और कोई नन्हा सा दिया भी हमारे रास्ते को इस तरह रौशन किए रहता है कि हम बिना रुकावट अपनी मंजिल तक पहुँच जाते हैं...| बहुत ही ईमानदारी से लिखा गया हाइबन है ये...| आज इतने वर्षों बाद भी आप अपनी उस छात्रा को याद कर के उसके उस गुरू रूप को महत्ता प्रदान कर रहे, ये आपके ही स्वभाव की ऊँचाई दर्शाता है...| आपके निस्वार्थ और निश्छल स्वभाव के तो हम जैसे जाने कितने गवाह हैं ही...|
आपकी लेखनी को मेरे नमन के साथ इस हाइबन के लिए मेरी हार्दिक बधाई स्वीकारें...|

Vibha Rashmi said...

namaskar bhai jee
aapka haiban dil ko choo gaya.jeevan mai achanak se ye nanhe guru bahut gahra paath padha jate hai.jinhe hum taumar nahee bhool pate.haiku bhee bahut khoobsurat laga. aapko badhai. avam shukriya bhee.




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