Monday, February 23, 2015

गंध उतर आई



कृष्णा वर्मा
1
छंदोबद्ध- सी
गंध उतर आई
शहनाई- सी
फागुन पुरवाई
घूमती पगलाई ।
2
फूली चमेली
सीमान्त महक ने
बाँटा ख़ुमार
सहज समर्पित
हुआ पहला प्यार।
3
छाई बहार
इंद्रधनुषी रंगों से
भीगा जो प्यार
बिम्बांकित हो गया
आंतरिक संसार।
4
सुरभि- मास
पुष्प-पात यौवन
उन्माद छाए
वन उपवन भी
खुशबू में नहा
5
उमंग- अंध
फागुनी हवाओं में
जादुई नशा
सठियाए वृक्षों को
बासंती भुजबंध।
6
ऋतु शैतान
कली की हथेली पे
लिखे शृंगार
भृंग टोलियाँ करें
, न्योछावर प्यार।
7
आया वैशाख
तरुणाई दिशाएँ
राधा अधीर
कन्हा की बाँसुरी पे
छलक उठी पीर

Monday, February 16, 2015

अमिट कथा


 



किरचों की ज़मीन



सुनीता अग्रवाल
1
रखना पग
मेरे मन -प्रांगण
थोड़ा सम्हल
किरचों की ज़मीन
कर दे न घायल .

Thursday, February 12, 2015

महकी मिट्टी (हाइबन)

डॉ. हरदीप कौर सन्धु 

शाम का समय।  टिमटिमाती बत्तियों में टिमटिमाता हुआ सिडनी का एयर पोर्ट। सगे संबंधियों तथा दोस्त -मित्रों का स्वागत करने आए लोगों की भीड़। जहाज़ के सही सलामत पहुँच जाने की सूचना पढ़ते ही हम मुख्य द्वार पर खड़े हो गए और माँ का बेसब्री से इंतज़ार करने लगे।

          कुछ देर में सामान से लदी बड़ी -बड़ी ट्रालियाँ धकेलते हुए लोग बाहर आने लगे। नर्गिस के फूलों जैसी हँसी बिखेरतेबाहें फैलाए मिल रहे अपनों को। हम भी दहलीज़ पर खड़े एड़ियाँ उठा -उठाकर देख रहे थे। लगता था कि ऐसा करने से शायद माँ जल्दी बाहर आ जाएगी। धीरे -धीरे भीड़ कम होने लगी। देखते ही देखते करीबन दो घंटे बीत गए लेकिन माँ हमें कहीं दिखाई नहीं दे रही थी।  उसको मिलने की तीब्र इच्छा का उतावलापन हमारी साँसों को रोक रहा मालूम होता था। आस -पास की हवा भी गंभीर हुई लगती थी।

       मोह की परछाईं भय  सागर में अलोप हो रही थी। माँ पहली बार सात समुन्दर पारअनजान रास्तों के सफ़र से आ रही थी। मन में बिखरी सोच की पोटली स्वयं बाँधते -खोलतेचिंता का कुआँ चलाती मैं दलीलों के रस्ते पे चली जा रही थी, "कहीं वीज़े के कागज़ी काम में कोई कठिनाई न आ गई हो .......... अनसुनी ज़ुबाँ तथा नई भाषा की समझ ने कोई रुकावट न डाल दी हो ……… रास्ते में ज़हाज बदलते हुए कहीं अगली उड़ान ही न निकल गई हो। "

         दूसरे ही पल अपने अंदर गहरे  उतरकर इस उलझन का हल ढूँढ़ते -ढूँढ़ते मन बीते पलों की सीमाओं के उस पार जा पहुँचा, ".......... नहीं -नहीं ऐसा हरगिज़ नहीं हो सकता हर उलझन का सहजता से हल ढूँढना सिखाने वाली………तथा पूरी दुनिया  का भूलोग हमें मुँह ज़ुबानी याद करवाने वाली मेरी माँ के लिए ऐसी दिक्क्त तो कुछ भी नहीं है। "

        …………… और अचानक फ़िज़ा में संदली महक घुल गई। माँ का मुबारक प्रवेश हमारे मुरझाए चेहरों पर खिलती गुलाबी हँसी बिखेर गया। ख़ुशी में झूमते हुए हम माँ से देर से बाहर निकलने का कारण पूछना भी भूल गए। चहकते चाव शरबती रंग हो गए जब माँ की मोह झफ़्फ़ी की खुशबू मन- आँगन में बिखर गई।

महकी मिट्टी -
तीखी धूप के बाद
वर्षा फुहार।



Monday, February 9, 2015

नीड़ वीरान

डॉसुधा गुप्ता
1
गोधूलि बेला
घी का दीपक जला
वे हासोज्ज्वला
कन्याएँ आ घिरतीं
गातीं संझा आरती
2
लुढ़के पड़े
आकाश के बिछौने
तारों के छौने
रातमाँ दुलराती
लोरी दे के सुलाती ।
3
रात बिताती
अलाव के सहारे
मजूरों बीच
शीतकन्या बेघर
सिर नहीं छप्पर ।
4
रिश्तों की डोर
लिपट जाए मन
खुल न पाए
पशुपक्षीमानव
सब को ही लुभाए ।
5
बड़ी भीड़ है
आँसुओं के गाँव में
यादों का काँटा
अनायास आ चुभा
छालों भरे पाँव में ।
6
आज भी शून्य
जि़न्दगी का गणित
खाते हैं  ख़ाली
जाने किस झोंक में
डगर नाप डाली !
7
फूलों की बस्ती
लगी ये  कैसी आग
फुँफकारा नाग
झपटे बूढ़े गीध
कौवों की काँवकाँव !
8
उगे जो पंख
उड़ गए चोंगले
नीड़ वीरान
बूढ़ी सूजी पलकें
ताकतीं आसमान ।
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