Friday, January 30, 2015

अँगना आया कौन !



सुदर्शन रत्नाकर
1
बहाती रही
निरन्तर रजनी
ओस के आँसू
पर मिल न पाई
प्रियतम सूर्य से ।
2
कुहासा हटा
 बही  फागुनी हवा
खिले हैं फूल
पिक ने तोड़ा मौन
अँगना आया कौन !
3
झंकृत हुए
मन-वीणा के तार
बही जो हवा
मुस्कुराई वीथिका
खिले फूल पलाश ।
-0-

10 comments:

Manju Gupta said...

बहाती रही
निरन्तर रजनी
ओस के आँसू
पर मिल न पाई
प्रियतम सूर्य से ।
yh vishesh , sbhi utkrisht
badhaai

Upasna Siag said...

bahut sundar ..

Pushpa Mehra said...

sabhi tanka sunder likhe hain badhai.
pushpa mehra.

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सार्थक प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (31-01-2015) को "नये बहाने लिखने के..." (चर्चा-1875) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

मेरा साहित्य said...

कुहासा हटा
बही फागुनी हवा
खिले हैं फूल
पिक ने तोड़ा मौन
अँगना आया कौन !
aapki lekhni ko naman bahut sunder likha hai
badhai
aapko
rachana

Krishna said...

बहुत सुन्दर ताँका....बधाई आपको!

ज्योति-कलश said...

bahut sundar ..saras !!

haardik badhaaii

Shashi Padha said...

कुहासा हटा
बही फागुनी हवा
खिले हैं फूल
पिक ने तोड़ा मौन
अँगना आया कौन !
वसंतागमन की आहट है इस तांका में | सभी मनभावन | बधाई आदरणीय सुदर्शन जी |

शशि पाधा

jyotsana pardeep said...

sunder srajan ke liye aapko badhai hai.

प्रियंका गुप्ता said...

सुन्दर बिम्बों से सजा तांका बहुत मनभावन लगा...| हार्दिक बधाई...|