Wednesday, July 16, 2014

खनके बाजूबंद




सेदोका
कृष्णा वर्मा

1
बरसे मेंह 
धुले छत-आनन
स्नान करें  दीवारें,
गंदे जल से
मुख भर करते
हैं कुल्ले परनाले
2
छनकी बूँदें
सरसे धरती भी
ज्यों कविता में छंद
मंद समीर
सरगम गाए ज्यों
खनके बाजूबंद
3
बरसी घटा
मचली हैं लहरें
जा -जा छुएँ  किनारे
तट के काँधे
चढ़कर लहरें
झाँकें देखें नज़ारे।
-0-
ताँका
घनश्याम नाथ कच्छावा
1
गर्म तवे -सी
तपती धरा पर
वर्षा की बूँद
छम-छम सी बोली
नभ से गिर कर ।
 2
प्यार कीजिए
तभी जान पाओगे
जीने का सच
वरना जो जन्मा है
उसको मरना है।
-0-
 

3 comments:

Subhash Chandra Lakhera said...

कृष्णा वर्मा जी के बेहतरीन सेदोका और घनश्याम नाथ कच्छावा जी के सुन्दर ताँका - सावन में सुंदर / सरस सृजन। हार्दिक बधाई !

ज्योति-कलश said...

बहुत सुन्दर बिम्ब ....
बरसें मेंह , खनके बाजूबंद और देखें नज़ारे ...तीनों लाजवाब.. बहुत बधाई कृष्णा जी

जीने का सच ...सुन्दर तांका कच्छावा जी बहुत बधाई ..नमन !

jyotsana pardeep said...

krishna ji v ghanshyam ji ko savan ke khanakte sedoka aur jeevan ke sach ko ubhaarte taanka...utkrisht rachnao ke liye karbadh badhai.