Thursday, July 10, 2014

भारी बुगची


                                                                                                                                                                                 

काली स्याह अँधेरी रात ........... फोन की घंटी  ........... बेवक्ती अनहोनी। उसकी साँसे डूबने लगीं। कुछ ही पलों में उसका रंग धुएँ जैसा हो गया। उसकी सोच को जैसे लकवा मार गया हो। आँखों में झरना बने आँसू रोकने पर भी रुक नहीं रहे थे। कलमुँही अनहोनी ने कहर ढाह दिया था। उसकी ज़िन्दगी के रास्तों का हमसफ़र ........... लम्बे सफ़र का साथ छोड़ ........... किसी अज्ञात देस चला गया ........... जहाँ से कभी कोई लौटकर नहीं आया। दिनों के महीने .......और ........महीनों के साल बनते गए मगर उसके लौटने की इन्तज़ार कभी ख़त्म न हुई।
             उसको ज़िंदगी एक खला लगने लगी। सूली टँगे पल पीछा करते हुए  लगते। ज़िंदगी सूखी शाखा जैसे तिड़क गई। दुखों की आँधियों को झेलती ......रब से शिकवे करती वह टूट जाती," उसका साथ तो अब एक सपना ही बन गया। रब ने पता नहीं किन कर्मों का बदला लिया मुझसे। बिलकुल भी रहम नहीं आया .... बूढ़े माँ -बाप की लाठी का सहारा न रहा। कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ये ज़िंदगी इतनी मुश्किल भी हो सकती है। जब कभी किसी बूढ़े -जोड़े को एक साथ देखती हूँ.... लगता है यह लकीर तो मेरे हाथों पर रब शायद डालनी ही भूल गया। न जाने कैसे निकलेगी यह पहाड़ जैसी जिंदगी अकेले ?
  बहुत मुश्किल होता है पाँव में शूलों का पनपना और इसकी पीड़ा को अपने दिल में समाना। उसको प्रतिदिन भीतर ही भीतर पिघलते देखती हूँ। मुझे कभी कुछ नहीं मिला उसके आश्वासन की सूनी झोली में डालने के लिए ..... मोह तथा अपनेपन की दिलासा के सिवाय ।शायद यही उसकी अँधेरी राहों में कभी रौशनी की लौ बन जाएँ।
भारी बुगची
कँकरीले ये रास्ते
ख्मी है पैर।   
डॉ हरदीप कौर सन्धु 

4 comments:

ज्योति-कलश said...

बहुत मर्म स्पर्शी प्रस्तुति है हरदीप जी ..अकेले मन के दर्द को जैसे साकार कर दिया आपने ..वाचन भी बेहद प्रभावी है ..आवाज़ ..एक अलग अनुभूति जगा गई !!
नमन आपकी लेखनी को !!

satishrajpushkarana said...

हरदीप सन्धु जी , जापानी विधाएँ आप सबके स्पर्श से विस्तार पा रही हैं। भारी बुगची हाइबन यथार्थ की कठोर अनुभूति का आँसुओं में किया हुआ अनुवाद है। आपकी सधी हुई आवाज़ का एक -एक शब्द कलात्मक पेशकारी बन गया है । आशा करता हूँ , इसे और विस्तार मिलेगा ।

jyotsana pardeep said...

hardeep ji ,aapke bhavuk mann se nikli yeh murmsparshi rachna....kisi peeda ki anokhi hi duniya me le gayi jisne yatharth me lipte satya ko ujagar kar diya...us par aapki awaaz ne isme chaar chaand laga diye...anokhi v prabhavi rachna...aapke bhaavon ko mera maanas-naman hai ....

प्रियंका गुप्ता said...

बहुत मर्मस्पर्शी हाइबन...मन की गहराई तक जैसे इसकी पीड़ा उतरती जाती है...|
हार्दिक बधाई...|