Thursday, July 3, 2014

जाए ताँ किथ्थे जाए ?



रामेश्वर काम्बोज हिमांशु(अनुवाद-डॉ हरदीप सन्धु)
 1
अकाश खुला
विहड़े दीआँ कँधां
ज़ंजीर किते
कोई नहीं दिखदी
फिर वी बंधन है।
2
रात ढली है
चन्द लवे उबासी
ऊँघण तारे
मोह थपक्की दे के
लोरी सुणावे हवा।
3.
निक्कड़ी चिड़ी
लभ्भे किथ्थे बसेरा
गुंम झरोखा
दलान वी गायब
जाए ताँ किथ्थे जाए ?
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5 comments:

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

सुन्दर ताँका , सुन्दर अनुवाद !
हार्दिक बधाई हरदीप जी, भैया जी !

~सादर
अनिता ललित

Pushpa Mehra said...

sabhi haiku va unaka anuvad bhi sunder hai . kamboj bhai ji ,bahan hardeep ji apako badhai.
pushpa mehra.

jyotsana pardeep said...

khoobsurat taanka...saath hi anuvaad bhi ...himanshu ji ,hardeep ji ko badhai.

ज्योति-कलश said...

mohak taankaa ..aur ...sundar anuvaad ....bahut bahut badhaaii aap dono saahitykaaron ko ..naman !

प्रियंका गुप्ता said...

अनूदित तांका में भी उतनी ही मिठास है, जितनी कि असल में...| भाषांतर के बावजूद बहुत आराम से उसका आनंद उठाया...| हार्दिक बधाई...|