Thursday, July 24, 2014

करीब तो आइए



सुभाष लखेड़ा  
1

बेवकूफ़ था

प्रेम माँगता रहा

मैं यहाँ- वहाँ

अब मालूम हुआ

मेरे पास है

प्रेम का वो खजाना

लुटाता रहूँ

जिसे  खुले दिल से

ख़त्म न होगा

ये मेरे जाने तक

या यूँ कहिए

आपके जीने तक

आज से आप

खुशियाँ मनाइए

बस थोड़ा सा

करीब तो आइए

निवेदन है-

आप मुस्कराएँगे

प्रेम गीत गाएँगे   

-0-
विभा रानी श्रीवास्तव
1

नूर की बूँदें

उदासी छीन रही

इक आसरा

तरुणी हुई धरा

अनुर्वरा ना रही ।

-0-


6 comments:

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

बहुत सुन्दर चोका आदरणीय सुभाष लखेड़ा जी !

सुन्दर ताँका विभा श्रीवास्तव जी !

~सादर
अनीता ललित

sushila said...

आप मुस्कराएँगे

प्रेम गीत गाएँगे ।

बहुत सुंदर सुभाष लखेड़ा जी !

sushila said...

विभा जी आप्का ताँका बहुत ही सुंदर है} बधाई !

ज्योति-कलश said...

बहुत सुन्दर 'प्रेम गीत' और 'नूर की बूँद' ...हृदय से बधाई आ० लखेड़ा जी एवं विभा जी !

डॉ. मोनिका शर्मा said...

Bahut Sunder

Seema Shrivastava said...

चौका और तांका दोनो ही बेजोड....,