Friday, June 6, 2014

लुप्त न होने देना



ऋता शेखर 'मधु'
1
स्वच्छ ही भाते
तरु नीर समीर
न छेड़ो उसे
रुष्ट जब हो जाते
प्रलय मचा देते।
2
वन्य जीवन
लुप्त न होने देना
दो संरक्षण
खाद्य- कड़ी इनसे
इनसे है ज़माना।
3
मंथर नदी
रो -रो कर बेहाल
सही न जाती
मानव की गंदगी
बोझिल है जिन्दगी।
4
नभ विरोध
धुआँ नहीं है पीना
टूट जाएगी
ओजोन की छतरी
गिरेगा अल्ट्रा रेज़।
5
प्यासे को पानी
राही को छाया मिली
मन बावरा
प्रेम प्याऊ की आस
जग-माया में डूबा।
6
थाम अँगुली
वट की छाया तले
तन के चली
ज्यूँ ही लड़खड़ाई
पिता को पास पाई।
7
पावस मन
प्रदूषण से मुक्त
गाए ग़ज़ल
हर पत्ता है हाइकु
बूटों पर है छंद।
-0-

5 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन मिलिए १६ वीं लोकसभा की नई अध्यक्षा से - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

आशा जोगळेकर said...

सुंदर।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (07-06-2014) को ""लेखक बेचारा क्या करे?" (चर्चा मंच-1636) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

ज्योति-कलश said...

सुन्दर सन्देश लिए बहुत सुन्दर तांका ...हार्दिक बधाई आपको !!

Savita Mishra said...

बहुत सुन्दर