Wednesday, June 25, 2014

टूटते सपने



रचना श्रीवास्तव
          पिछले महीने की बात है।  बेटे को उसकी क्लास तक छोड़ के जब मै स्कूल के बाहर आई तो तो देखा भीड़ लगी है ।बहुत से अभिवावक जमा हैं  ।मुझे लगा क्या हुआ! देखा तो सामने एक घर को गिराया जा रहा था। लोहे के बड़े बड़े दाँत उस घर में  धँसते और घर का एक बड़ा हिस्सा उसके मुँह में समा जाता।
          अजीब- सी आवाज के साथ वो घर टूटने लगा। पता नहीं क्यों मुझे लगा कि वो घर दर्द से चीख रहा है। आज कितनी बेरहमी से इसको नोचा जा रहा था ! कभी बहुत प्यार से इसको बनाया गया होगा। इस घर की दीवारों पर कभी  हँसी  चिपकी होगी तो कहीं आँसुओं से नम तकिया होगा। इसके कमरों में जिंदगी पली होगी। यदि घ्यान से देखें तो इसकी ज़मीन पर नन्हे क़दमों के निशान आज भी दिखेंगें। एक  कमरे में हैंगर पर कोई ड्रेस  टँगी थी। सुरसा की तरह  मुँह खोलती क्रेन जब उस  बढ़ी ,मन किया की उसको रोक दूँ पर कहाँ मेरे कहने से कोई रुकता और क्यों रुकता। हैंगर सहित वो ड्रेस उसके लोहे के दाँतों पर झूलने लगी। कितने  प्यार से इसको ख़रीदा गया होगा! कितनी पार्टियों में लोगों ने इसको तारीफ भी की होगी, पर आज ये धूल में पड़ा  है।
           घर टूटता जा रहा था।लोग फोटो ले रहे थे वीडिओ बना रहे थे; पर मेरा मन न जाने क्यों  खुश नहीं था। वो घर नहीं टूट रहा था, किसी के सपने बिखर रहे थे। थोड़ी देर में पूरा घर अपना वजूद खो चुका था। मुझे लगा- मलवे के नीचे दबे बहुत से सपने मेरी ओर हाथ बढ़ाकर मदद के लिए गुहार लगा रहे हैं। और मै कुछ नहीं कर  पा रही थी। उस दिन मुझे लगा  कि घर बनाने में कितना समय लगता है, लेकिन उसको तोड़ने में बस कुछ घंटे। .......
        लोहे के दाँत
        चबा गए सपने
        टूटा वो  घर 
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7 comments:

haiku lok said...

घर का टूटना ……… जिस रूप में शब्दों में बाँध कर रचना जी ने पेश किया है काबिले तारीफ़ है ! पुराने घरों को तोड़ने का दृश्य हम सब ने कहीं न कहीं देखा होगा …… मगर आज रचना जी की लेखनी ने हमें वहाँ रुक कर देखने तथा सोचने के लिए मजबूर कर दिया। यही इस लेखनी की खूबसूरती है।
हरदीप

ज्योति-कलश said...

बेहद संवेदन शील अभिव्यक्ति है ...घर और मकान के फर्क का अहसास कराया आपने | "मुझे लगा- मलवे के नीचे दबे बहुत से सपने मेरी ओर हाथ बढ़ाकर मदद के लिए गुहार लगा रहे हैं। और मै कुछ नहीं कर पा रही ......" बहुत मार्मिक रचना जी ...आपकी संवेदनशीलता को मेरा नमन !!!

मीनाक्षी said...

सजीव लेखनी ने वर्णन को जीवंत कर दिया...महसूस हुआ कि घटना आँखों के सामने घट रही है और मन बेचैन हो उठा... संवेदनशील हाइबन.....

Renu Yadav said...

घर बनाने में कितना समय लगता है, लेकिन उसको तोड़ने में बस कुछ घंटे। .......

बिल्कुल सत्य...

Pushpa Mehra said...

bahut sunder haiban drishya ka bhavpurn varnan bhi achha kiya gaya.
rachna ji apko badhai.
pushpa mehra.

jyotsana pardeep said...

rachna ji sunder ,marmik v samvedansheel haiban ...nirjeev mein jeevan ka eak adbhud udahran diya hai rachna ji aapne ...salaam hai aise sooch jo tootte makaan mein ghar ka dard mahsoos kare....badhai.

प्रियंका गुप्ता said...

बहुत मर्मस्पर्शी...रचना जी की कलम हमेशा कुछ सोचने पर मजबूर करती है...बहुत बधाई...|