Thursday, March 13, 2014

मन से मन जोड़े

2-डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
1
फागुन क्या बोल रहा
एक नशामस्ती
कण-कण में घोल रहा ।
2
रजनी को भोर बना
मन से मन जोड़े
होली को डोर बना ।
3
क्या भाँग चढ़ाई है
बहकी आज हवा
ये रुत बौराई है ।
4
कैसे हालात हुए
काबू में रखने
मुश्किल जज़्बात हुए ।
5
हैं दिन वैरी रतियाँ
चैन न लेने दें
वो नेह भरी बतियाँ ।
6
क्या खूब खुमारी है
याद भरा हर पल
विरहिन पर भारी है ।
7
है कठिन भुला पाना 
बासंती सरगम
वो केसरिया बाना ।
8
यूँ खेल रहा होली
सरहद पर वीरा
सुन झेल रहा गोली ।
9
गुँझिया गुलनार हुई
भल्लों पर कांजी
सौ बार निसार हुई ।

9 comments:

Tushar Raj Rastogi said...

आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी इस विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज के ब्लॉग बुलेटिन - दोगला समाज पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

Mukesh Kumar Sinha said...

सुंदर बेहतरीन .........

प्रियंका गुप्ता said...

यूँ खेल रहा होली
सरहद पर वीरा
सुन झेल रहा गोली ।
बहुत भावपूर्ण...दिल को छू गया...| बधाई...|

jyotsana pardeep said...

jyotsnaji aapki meethi meethi gunghiya bahut swadisht lagi.....manmohak..mahiya likhne ke liye saath hi holi ki bahut bahut badhai

sunita agarwal said...

atisundar mahiya sabhi :)

ज्योति-कलश said...

ह्रुदर से आभार आप सभी का ...होली की हार्दिक शुभ कामनाएँ !!

सादर
ज्योत्स्ना शर्मा

Pushpa Mehra said...

jyotsana ji apaki lekhani ki har vidha kamal karati hai. bhalon ki kanji ki panktiyan door door ma ki ghani yad dilane ke sath is rangeeli khushi ke mauke par bhi ankhen nam kar gayin unake banaye pakvano va kanji ki yadon ke rangon ne mujhe to pura hi rang diya.sunder mahiya ke liye apako badhai va holi ki anek shubh kamanaen. pushpamehra.

Amit Harsh said...

बहुत सुंदर

ज्योति-कलश said...

आदरणीया पुष्पा जी मेरी भावनाओं और अभिव्यक्ति को आपका स्नेह और आशिष मिला मैं हृदय से आभारी हूँ ....लगा कि शायद सभी बेटियाँ ऐसे अवसरों पर एक बार तो मायके की यादों में खो जाती ही हैं .....सदा स्नेह बनाए रखियेगा !
सादर
ज्योत्स्ना शर्मा